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08 Dec 2017 06:18:35 AM IST
Last Updated : 08 Dec 2017 06:24:08 AM IST

गुजरात : पैमाइशों में रुझान

संदीप शास्त्री
गुजरात : पैमाइशों में रुझान
गुजरात : पैमाइशों में रुझान

विगत लोक सभा चुनाव में जीत के बाद भाजपा गुजरात में सत्ता पर काबिज बने रहने के लिए कड़े चुनावी मुकाबले के दरपेश है.

सीएसडीएस-लोकनीति द्वारा किए गए हालिया चुनाव-पूर्व आकलन से पता चलता है कि संघर्ष रोचक हो गया है. मत प्रतिशत के लिहाज से कांग्रेस अपनी कड़ी प्रतिद्धंद्धी भाजपा की बराबरी पर जा पहुंची है. तीन महीने पहले सीएसडीएस-लोकनीति के पहले आकलन में संकेत मिला था कि भाजपा 30% के मत प्रतिशत के साथ कांग्रेस के मुकाबले बेहतर स्थिति में थी. जैसे-जैसे चुनाव अभियान ने रफ्तार पकड़ी वैसे-वैसे भाजपा की बेहतर स्थिति नाटकीय तरीके से कमजोर पड़ी. अभी जो खबरें मिल रही हैं, उनसे भी पता चलता है कि चुनाव संघर्ष बेहद कड़ा हो गया है. दोनों पार्टियों के बीच नजदीकी मुकाबला है. दो दशकों से ज्यादा समय से राज्य की सत्ता पर काबिज भाजपा के समर्थन में यह गिरावट किन कारणों के चलते आई है? तमाम कारण और ताकतें हैं, जिनके आधार पर गुजरात में चुनावी परिदृश्य को समझा जा सकता है.

2014 के लोक सभा चुनाव के बाद देश में करीब पंद्रह राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए हैं. इन राज्यों में से आठ में भाजपा ने अपनी सरकार बनाने में सफलता अर्जित की और एक राज्य (जम्मू-कश्मीर) में उसने गठबंधन करके सरकार बनाई. यह ध्यान देने की बात यह है कि जिन राज्यों (गोवा को छोड़कर) में भाजपा ने सरकार बनाई वहां वह विपक्ष में थी, और प्रतिद्वंद्वी को पराजित करके उसने सरकार बनाई. पंजाब में वह सरकार में सहयोगी थी, जहां उसके गठबंधन को चुनाव हार कर सत्ता से बाहर होना पड़ा. गुजरात में घटनाक्रमों का विश्लेषण करने से पूर्व इस रुझान पर ध्यान केंद्रित करना जरूरी है. 2014 के बाद गुजरात पहला प्रमुख राज्य है, जहां भाजपा को देश और राज्य, दोनों जगहों पर अपना विजयी अभियान जारी रखने के लिए जूझना पड़ रहा है. इसलिए वे तमाम मुद्दे उभर आए हैं, जिन्हें अन्यथा ‘परे रखा’ जा सकता था.

2014 के बाद हुए अन्य चुनावों, जहां पार्टी का प्रदर्शन बेहतरीन रहा, में इन पर कदाचित ही ध्यान दिया गया. भाजपा के समर्थन में कमी के आने की बात पर एक आम तर्क दिया जा रहा है कि भाजपा को सत्ता-जनित कारकों से जूझना पड़ रहा है. सही है कि पार्टी  दो दशक से भी ज्यादा समय से राज्य की सत्ता पर काबिज है, और लगातार पांच विधान सभा चुनाव जीती है. लेकिन हमें सत्ता-जनित आक्रोश की इस व्याख्या से इतर भी ध्यान देना होगा. सीएसडीएस-लोकनीति के अगस्त में किए गए आकलन में जिनसे भी बात की गई उनमें से आधे से ज्यादा भाजपा को एक और अवसर देने के पक्ष में थे. नवम्बर के अंतिम दिनों में चुनाव आकलन से संकेत मिला कि ऐसे लोगों की संख्या मात्र एक तिहाई रह गई है. हर दस में से करीब-करीब चार ऐसे थे, जो भाजपा को और मौका दिए जाने के खिलाफ थे.

तो प्रमुख कारण क्या हैं, जिनके चलते सत्ता की राह भाजपा के लिए इतनी मुश्किल भरी हो गई है. पहले तो यही है कि सत्ताधारी भाजपा के भीतर संतोष का भाव, खासकर उत्तर प्रदेश में जीत के बाद, व्याप गया है. सीएसडीएस-लोकनीति के मुताबिक, भाजपा ग्रामीण गुजरात में अपना जन समर्थन खोती दिख रही है. जहां शहरी इलाकों (दक्षिण गुजरात को छोड़कर) में इसे बढ़त है, वहीं ग्रामीण इलाकों में समर्थन उसके हाथों से फिसलता दिख रहा है. लोगों से पूछे जाने पर कि चुनाव में मतदान करते समय उनके दिलोदिमाग में क्या बातें होंगी तो आधों ने कहा-महंगाई, विकास, बेरोजगारी और गरीबी. जब उनसे पूछा गया कि विकास का लाभ किसे हुआ तो उनमें से एक तिहाई का कहना था कि विकास के लाभ को अमीर ले उड़े जबकि पांचवें हिस्से का मानना था कि विकास हुआ ही कहां है. सर्वाधिक चिंतनीय तो यह था कि आधे लोगों ने अपनी आर्थिक परेशानियों का जिक्र करते हुए कहा कि वे अपनी रोजमर्रा की जरूरतें तक पूरी नहीं कर पा रहे हैं. स्पष्ट है कि  अपनी इस स्थिति के लिए वे सत्ताधारी पार्टी की सरकार को ही दोषी मानते हैं.

दूसरे यह जानना महत्त्वपूर्ण है कि लोग केंद्र और राज्य में भाजपा की सरकारों को किस तरह से आंकते हैं. केंद्र सरकार की तमाम पहल के मामले में लोग ज्यादा उत्साहित नहीं दिखे. भले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सर्वाधिक लोकप्रिय चेहरा हैं, लेकिन उनकी सरकार के कुछेक फैसलों को लेकर लोगों में नाराजगी है. हर दस में से छह व्यक्ति मानते हैं कि मोदी सरकार ‘अच्छे दिन’ के अपने वादे को पूरा करने में विफल रही है. भाजपा के समर्थकों में भी काफी ऐसे हैं, जो इस बात को लेकर चिंतित हैं कि भाजपा सरकार इस संबंध में जनाकांक्षाओं को पूरा करने में नाकाम रही. कांग्रेस समर्थकों में तीन-चौथाई ऐसे हैं, जो मानते हैं कि ‘अच्छे दिन’ अभी भी दिवास्वप्न ही है. हो सकता है कि गुजरात वह पहला राज्य हो जो विमुद्रीकरण और जीएसटी पर अपनी नाराजगी खुलकर जताए. दस में से चार लोग विमुद्रीकरण और जीएसटी को खराब उपाय करार दे रहे हैं. अधिकांश इनसे संतुष्ट नहीं हैं. सरकार द्वारा हाल में घोषित जीएसटी में रियायतों से भी वे खुश नहीं हो सके हैं.

तीसरी बात यह कि ‘त्रिमूर्ति’ (हार्दिक, जिग्नेश और अल्पेश) ने भाजपा के खिलाफ ताकतों को एकजुट कर दिया है. आकलन से पता चलता है कि इन तीनों ने अपने-अपने समुदायों में खासा समर्थन जुटा लिया है, जिससे भाजपा की राह कठिन हो गई है. उस पर दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों के बीच कांग्रेस ने अपने तई खासा समर्थन जुटा लिया है. इसके चलते पटेल समुदाय में कोई बिखराव होने पर भी कांग्रेस की स्थिति मजबूत बनी रहनी है. इस प्रकार भाजपा को पटेलों में बिखराव का कोई फायदा नहीं होने जा रहा. बहरहाल, यह तो 18 दिसम्बर (चुनावी नतीजों का दिन) को ही पता चल पाएगा कि कांग्रेस चुनाव अभियान में अपनी मजबूत स्थिति को बनाए रख सकी या फिर भाजपा ने रुझानों को धता बताते हुए वापसी की और सत्ता पर काबिज हो गई. राजनीति में एक सप्ताह का समय वास्तव में काफी लंबा समय होता है, और तस्वीर को किसी भी तरफ मोड़ देने की गरज से भी इतना  समय काफी होता है. देखा जाना है कि इस दौरान कांग्रेस अपने उत्साह को कामय रखे रह सकेगी और भाजपा से बढ़त लेने के अपने हौंसले को बनाए रख पाएगी.


 
 

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