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12 Oct 2017 05:58:23 AM IST
Last Updated : 12 Oct 2017 06:02:47 AM IST

कॉलेजियम : खुलेपन की बाध्यता

फैजान मुस्तफा
कॉलेजियम : खुलेपन की बाध्यता
कॉलेजियम : खुलेपन की बाध्यता

भाजपा सरकार के कार्यकाल में जहां तक सीबीआई का प्रश्न है, तो कुछ खास नहीं बदला है.

चूंकि सीबीआई गृह मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करती है, और इसलिए ही अगर यह अपने राजनीतिक आकाओं के लिए ‘पिंजरे में कैद तोता’ सरीखी है, तो ताज्जुब की कोई बात नहीं है. लेकिन न्यायाधीशों का क्या जो पूरी तरह से स्वतंत्र हैं?

क्या एक के बाद एक सरकारों ने अपने प्रतिबद्ध न्यायाधीशों से न्यायपालिका को पाट देने के भरसक प्रयास नहीं किए हैं, या साहसी और स्वतंत्र न्यायाधीशों के तबादले संबंधी अपने अधिकारों का इस्तेमाल नहीं किया है? अंतर सिर्फ इतना है कि पहले जहां कार्यपालिका अपने स्तर पर मनमर्जी करती थी, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम जब-तब इसे अंजाम देती है, जिसके फैसलों के बरक्स कोई उपाय मौजूद नहीं है. इसलिए सुप्रीम कोर्ट की पीठ द्वारा पांच अक्टूबर की इस व्यवस्था से आश्वस्ति मिलती है कि ‘न्यायाधीश सरकारोन्मुख नहीं होते.’ अवधारणाएं हमेशा सही नहीं होतीं.

अगर न्यायाधीशों को ‘पिंजरे के तोते’ बनाने के वास्तव में प्रयास हुए हैं, तो यह निश्चित ही चिंता का विषय है. जस्टिस जयंत पटेल के कर्नाटक उच्च न्यायालय से बंबई उच्च न्यायालय तबादले और फिर वहां से इलाहाबाद उच्च न्यायालय भेजे जाने, वह भी उस स्थिति में जब उनके सेवानिवृत्त होने में  मात्र दस महीने शेष बचे थे, के विरोध में उनके इस्तीफे की खबर से विधिक क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई. लोगों को दाल में कुछ काला लगा. जस्टिस पटेल ही थे, जिन्होंने गुजरात के चर्चित इशरत जहां मुठभेड़ मामले की सीबीआई जांच का आदेश दिया था. उन्होंने निकाय चुनाव में विलंब का कारण बनने वाले  गुजरात अध्यादेश को भी खारिज कर दिया था.

स्थानीय निकायों के चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन निराशाजनक रहा था. उल्लेखनीय है कि अभी कर्नाटक उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के आधे से ज्यादा पद रिक्त हैं. ऐसे में एक वरिष्ठ न्यायाधीश को अन्यत्र भेजे जाने और वह भी उस स्थिति में जब वह कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के तौर पर कार्यभार संभालने वाले हों तो निश्चित ही तबादले के पीछे की मंशा पर शंका होती है. मोदी सरकार के प्रिय रहे अनेक न्यायाधीशों को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ा है, इसलिए विवाद अनदेखा नहीं किया जा सकता. भाजपा सरकार ने पूर्व सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम के नाम को 2014 में खारिज कर दिया था, जो सुप्रीम कोर्ट के बेहतरीन न्यायाधीश होते. सरकार उत्तराखंड उच्च न्यायालय के जस्टिस केएम जोसेफ के हैदराबाद तबादले पर सहमत नहीं हुई जबकि कॉलेजियम अठारह महीने पहले इस बाबत सिफारिश कर चुका था. समझा जाता है कि सरकार उनके 2016 में दिए उस फैसले से नाखुश थी, जिसमें उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन को अमान्य करार दिया गया था. कर्नाटक के मौजूदा मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एसके मुखर्जी के मामले को ही देखें. मई, 2016 में उनका तबादला उत्तराखंड किया जाना था लेकिन सरकार इसके लिए इच्छुक नहीं थी.

सरकार ने जस्टिस मुखर्जी के तबादले पर सहमति दी होती तो आज जस्टिस जोसेफ और जस्टिस पटेल, दोनों को ही वह सब मिला होता जिसके वे हकदार थे. जस्टिस राजीव शंखधर का मामला भी ऐसा ही है, जिनके 2016 में दिल्ली से मद्रास उच्च न्यायालय तबादले पर भी भौंहें तनी थीं. जस्टिस शंखधर ने अपने फैसले में केंद्र के उस ‘लुकआउट’ नोटिस को अमान्य करार दिया था जो ग्रीनपीस एक्टिविस्ट प्रिया पिल्लई के खिलाफ जारी किया गया था. अनेक विवादास्पद फैसलों के चलते कॉलेजियम के औचित्य पर संकट मंडराने लगा है. दशकों पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने अपने से ही तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा किए जाने वाले ऐसे तबादलों पर कड़ा रुख अपनाया था. कहा था कि ‘सरकार जजों के मनमाने’ तबादले नहीं कर सकती और तबादलों में प्रधान न्यायाधीश से मशविरा जरूरी है. किसी न्यायाधीश का तबादला उसे ‘झुकाने’ का जरिया न बने.

कहना यह कि कार्यपालिका का किया जो गलत है, तो वैसा ही कुछ कॉलेजियम द्वारा किए गए को भी अनुचित मानना ही होगा. तमाम सरकारें ‘घुटने टेकी’ न्यायपालिका चाहती हैं. गणतंत्र के अस्तित्व में आने से पूर्व जवाहरलाल नेहरू जैसे कद के राजनेता तक ने संविधान सभा में 10 सितम्बर, 1949 को इस विषय सरकार के विचार पर प्रकाश डाला था : ‘सीमाओं के भीतर कोई न्यायाधीश और सर्वोच्च अदालत अपने तई तीसरा चेंबर नहीं बना सकते. कोई सर्वोच्च न्यायालय और न्यायपालिका संसद की संप्रभुता का अतिक्रमण करते हुए फैसला नहीं दे सकती. भटकन महसूस हो तो ध्यान अवश्य दिला सकती है, लेकिन संबद्ध समुदाय के भविष्य के मद्देनजर निर्णायक विश्लेषण के आड़े कोई न्यायपालिका नहीं आ सकती. अगर ऐसा करती है, तो स्मरण रहे कि समूचा संविधान ही संसद की निर्मिति है.’ उन्होंने सरकार-मुखापेक्षी जज नियुक्त करने की संभावनाओं का उल्लेख करते हुए कहा : ‘यदि अदालत अड़चनकारी साबित हों, तो इससे पार पाने का एक तरीका है..जजों को  नियुक्त करने वाली कार्यपालिका अपनी पसंद के जज नियुक्त करना शुरू कर दे ताकि अपने पक्ष में फैसले करा सके.’ जरूरी है कि न्यायपालिका को जवाबदेह बनाया जाए क्योंकि यह तीन मूल्यों को प्रोत्साहित करती है : कानून का शासन, न्यायपालिका में आमजन का विश्वास, और सांस्थानिक दावित्व.

दुख होता है कि कॉलेजियम ने फैसला कर लिया है कि सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर जजों की नियुक्ति, स्थानांतरण और पदोन्नयन संबंधी सिफारिशें डालेगी बल्कि उनके कारणों का भी खुलासा करेगी. जस्टिस पटेल के इस्तीफे से छिड़े विवाद का ही नतीजा है कि कॉलेजियम को ऐतिहासिक फैसला करना पड़ा है. लेकिन पूछा जा सकता है कि ऐसे सभी मामलों के कारणों को सार्वजनिक किया जाना क्या बुद्धिमत्तापूर्ण होगा क्योंकि इससे तमाम विरोधाभासी संकटों का पिटारा ही खुल जाएगा. तो क्यों न कॉलेजियम को ही ऐसी नीति बनाने दी जाए. शीर्ष जजों के विवेक पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए.


 
 

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