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27 Jan 2021 03:31:30 AM IST
Last Updated : 27 Jan 2021 03:33:16 AM IST

विश्लेषण : हठ त्यागें आंदोलनकारी

विश्लेषण : हठ त्यागें आंदोलनकारी
विश्लेषण : हठ त्यागें आंदोलनकारी

कृषि कानूनों के विरोध में जारी आंदोलन ऐसे मोड़ पर आकर खड़ा हो गया है, जहां से भविष्य का आकलन कठिन है।

11वें दौर की वार्ता में सरकार ने बिल्कुल स्पष्ट रुख लिया कि कानूनों को रद्द करना छोड़कर अगर आंदोलनकारी अन्य विकल्पों पर बात करना चाहते हैं, तभी स्वागत है। कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने स्पष्ट कह दिया कि हमने किसानों का सम्मान करते हुए उनसे बातचीत की, प्रस्ताव भी दिए लेकिन चूंकि वे कानून वापसी की मांग पर अड़े हैं, इसलिए बातचीत नहीं हो सकती।
हमने पहले भी कहा कि रद्द करने का कोई दूसरा विकल्प उनके पास है, तो लेकर आएं सरकार विचार करेगी। विज्ञान भवन की बातचीत में तोमर ने कह दिया कि हम बातचीत बंद कर रहे हैं क्योंकि आप कानून रद्द करने पर अड़े हैं और देश में भारी संख्या इसके समर्थकों की है। किसान नेताओं का सम्मान रहे, इसके लिए हम इतने समय तक चर्चा करते रहे। जो लोग आंदोलन के समर्थन में हैं, वे कृषि मंत्री के वक्तव्य का समर्थन नहीं करेंगे, लेकिन जो  कृषि कानूनों के समर्थन में हैं आंदोलन को उचित नहीं मानते, वे कहेंगे कि कृषि मंत्री ने बिल्कुल सही बोला है। आप देख सकते हैं सोशल मीडिया और क्षेत्रीय अखबारों के पन्नों पर  सरकार द्वारा वार्ता से अलग होने के कदम का समर्थन किया जा रहा है।

जिन लोगों ने अध्यादेश और संसद में पारित होने के बाद इन कानूनों पर हो रही प्रतिक्रियाओं तथा दिल्ली तक पहुंचे आंदोलन पर निष्पक्षता और गहराई से नजर रखी है, उन्हें यह स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं है कि आंदोलनकारी संगठनों ने इतना कड़ा रुख अपनाया, जिसमें बीच का रास्ता निकाले जाने की गुंजाइश खत्म हो गई। पहले जिद थी और धीरे-धीरे यह हठ में बदल गई। लोकतंत्र में हर विषय पर आर या पार नहीं होता। सत्ता को लचीला और नरम चरित्र अपनाना चाहिए।  इसके समानांतर आंदोलनकारियों को भी इस तरह हठधर्मिंता नहीं बरतनी चाहिए कि बातचीत  निर्थक हो जाए। क्या यह सच नहीं है कि आंदोलन मुख्यत: पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ भाग के किसान संगठनों का ही आंदोलन है? दूसरे भागों का भी प्रतिनिधित्व आंदोलन में है। मगर उनकी संख्या न के बराबर है। जहां-जहां आप प्रदर्शन देख रहे हैं, उनका मूल चरित्र राजनीतिक है। देश भर के ऐसे संगठनों, एक्टिविस्टों का समूह आंदोलन में शामिल होता रहा है, जो मोदी सरकार के विरोधी हैं या कुछ मुद्दों या कृषि कानूनों पर उनके अलग विचार हैं। कोई सरकार कुल किसानों की आबादी की इतनी छोटी संख्या की मांग पर  अपना कदम वापस नहीं ले सकती। हमने देखा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कई कार्यक्रमों में किसानों से कृषि कानूनों पर बातचीत की, जिनमें किसानों को इनका समर्थन करते देखा-सुना गया। भाजपा ने आंदोलन के समानांतर कृषि कानूनों के समर्थन में देश भर में सभाएं और पत्रकार वार्ताएं आयोजित कीं। पंजाब और हरियाणा की कुछ जगहों को छोड़कर उन्हें कहीं विरोध का सामना नहीं करना पड़ा।
कोई सरकार समर्थन और विरोध का आकलन किस आधार पर करती है? सरकारी ढांचे में खुफिया रिपोर्ट  मुख्य आधार होती है, मीडिया की रिपोर्ट खंगाली जाती है, पार्टी से फीडबैक लेती है..। मोदी सरकार ने इन सबके साथ जनता के बीच जाने, किसानों से बातचीत करने का कदम उठाया। उसमें तीनों कृषि कानूनों का समर्थन दिखा तो वह कुछ संगठनों द्वारा  संख्या बल जुटाकर राजधानी में धमाल मचाने के दबाव में कैसे आ सकती है? सर्वोच्च न्यायालय भी आगे आया। कानून के समर्थकों और विरोधियों से न्यायालय ने अपेक्षा की कि वे उसके द्वारा गठित समिति के समक्ष अपनी बात रखेंगे। आंदोलनकारियों का ध्यान रखते हुए न्यायालय ने कानून के अमल पर अगले आदेश तक के लिए रोक भी लगा दी। नौवें दौर की बातचीत के बाद कृषि मंत्री तोमर ने यही तो कहा था कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अमल पर रोक के बाद कानून है नहीं, इसलिए किसानों को आंदोलन खत्म कर देना चाहिए। न्यायालय द्वारा गठित समिति जब भी सरकार को बुलाएगी हम अपना पक्ष वहां रखेंगे। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि किसान संगठन चाहें तो सरकार भी समिति बना सकती है जिसमें उनके भी प्रतिनिधि हों। नौवें दौर की बातचीत के बाद तोमर ने स्पष्ट कहा था कि अगले दौर की बातचीत में हम चाहेंगे कि कानूनों पर बिंदुवार चर्चा हो।
इसके समानांतर आंदोलनरत संगठनों का क्या रवैया रहा? पहले उन्होंने कहा कि हम तो न्यायालय गए नहीं थे, हमको न्यायालय से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने समिति के सदस्यों के इरादे पर प्रश्न उठाते हुए उनके समक्ष जाने से भी इनकार कर दिया। माहौल ऐसा बना कि समिति के एक सदस्य ने अपने को इससे अलग भी कर लिया। इसे देखते हुए  सरकार ने फिर बयान दिया कि किसान संगठन इस बार तैयारी करके आएं क्योंकि हम बिंदुवार चर्चा करना चाहेंगे। दूसरी ओर आंदोलनकारी नेता यही कहते रहे कि हमको केवल तीनों कानून वापस चाहिए। सरकार बार-बार स्पष्ट कर चुकी थी कि कृषि कानून वापस नहीं होंगे। नौ दिसम्बर को सरकार द्वारा दिए गए 20 पृष्ठों के प्रस्तावों दिया गया था, उसमें उन बिंदुओं पर स्पष्टीकरण था, जिन्हें आंदोलनरत नेताओं ने उठाया था। इनमें कुछ मांगों में कानून में संशोधन व बदलाव का वायदा भी था। इसे भी नकार दिया गया। आंदोलनरत नेता 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के अवसर पर ट्रैक्टर परेड  निकालने पर अड़े रहे। ट्रैक्टर परेड में जो हुआ उसे भी देश ने देखा। इस तरह का व्यवहार समझ से परे है।
बिना प्रावधानों पर बात किए कोई सरकार कैसे निर्णय करेगी? दूसरे, जब न्यायालय सामने आ गया तो इस तरह का कड़ा रु ख अपनाए रखने का क्या कारण हो सकता है? न्यायालय ने भी अपने आदेश में इतना तो कहा ही कि हम आंदोलन, धरना और प्रदर्शन के अधिकार पर कोई प्रश्न नहीं उठाना चाहते, लेकिन इस अभूतपूर्व आदेश के बाद अनिश्चितकालीन धरना का आधार नहीं रह गया है। किसानों को वापस चले जाना चाहिए। आंदोलनकारी संगठनों की ओर से आए वक्तव्यों में न्यायालय के इरादे पर भी आशंकाएं उठाई गई। क्या यह शीर्ष अदालत की अवमानना नहीं है? अच्छा होगा कि वास्तविक किसान संगठन और उनके नेता व्यावहारिक रवैया अपनाएं। वे समझें कि कानून तत्काल लागू नहीं है। वे उन शक्तियों से स्वयं को अलग करें जो समझौता नहीं होने देना चाहती हैं। कृषि कानूनों को खत्म करने का अड़ियल रवैया छोड़ें। सरकार के साथ समिति बनाकर वार्ता की नई शुरु आत करें।


अवधेश कुमार
 

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