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08 Dec 2019 12:36:17 AM IST
Last Updated : 08 Dec 2019 12:37:26 AM IST

मीडिया : फासिज्म से खेलते हुए

सुधीश पचौरी
मीडिया : फासिज्म से खेलते हुए
मीडिया : फासिज्म से खेलते हुए

इनको लिंच कर दो! उनको सरेआम फांसी पर लटका दो! अदालत से न्याय नहीं मिलता। निर्भया को न्याय अब तक न मिला।

कुछ दिन पहले हैदराबाद के बर्बर गैंगरेप व हत्या पर हुई संसदीय बहस के दौरान कई नेताओं ने अपने वक्तव्यों से समकालीन ‘लिंच मानसिकता’ को मानो एक तरह की मान्यता सी दे दी।  लोग सोचते हैं कि नेता कह रहे हैं तो सही कह रहे होंगे। इस तरह संसद से सड़क तक एक ‘उन्माद’ वातावरण बनता रहा बनता रहा।
‘लिंच करो..मार..दो काट दो’ की ‘उन्माद भावना’ को ‘पब्लिक सेंटीमेंट’ बताया गया। देखते-देखते उन्माद का वातावरण घना होता रहा। बिना किसी मीडिया-रिसर्च के इस ‘लिंच मानसिकता’ को ‘पब्लिक के मूड’ के नाम पर परवान चढ़ाया जाता रहा। बहुत से कानून बनाने वालों और मीडिया की भाषा इस मसले पर एक सी रही। सभी इस बर्बर रेप-हत्याकांड और ‘तुरंता न्याय’ की मांग के मामले में लगभग ‘लिपसिंक’ में रहे। दस दिन बाद शुक्रवार की सुबह के तीन से चार बजे के बीच जब हैदराबाद पुलिस ने रेप और हत्या के चारों आरोपितों को घटना स्थल पर ले जाकर एनकांउटर कर दिया तब इसकी खबर ब्रेक हुई तो मीडिया में हैदराबाद की पुलिस की जै-जैकार होती नजर आई। हजारों लोग पुलिस पर फूल बरसाते नजर आए। पुलिस को कंधों पर उठाकर ले जाते नजर आए। ‘तुरंता न्याय’ की खबर पर कई एंकर व रिपोर्टर मुग्ध नजर आए। कइयों ने आनन-फानन में कुछ बेरोजगार फिल्मी हस्तियों की बाइटें देनी शुरू कर दीं। वे कहते : पुलिस ने जो किया सही किया। पुलिस को सलाम। पुलिस तफ्तीश कर प्रमाण जुटाती है। आरोपितों के खिलाफ केस तैयार कर अदालत में पेश करती है। अदालत आरोपितों की भी सुनती है क्योंकि न्यायशास्त्र कहता है कि गुनहगार को सजा मिले-न-मिले लेकिन किसी बेगुनाह को हरगिज न मिले। दोपहर तक न किसी एंकर, न किसी रिपोर्टर ने इस ‘एनकांउटर’ पर सवाल उठाए। न किसी ने पुलिस से पूछा कि आरोपित पुलिस कस्टडी में थे तो भागे कैसे? उनको हथकड़ी क्यों नहीं पहनाई गई? रात के तीन बजे अंधेरे में कौन-सा ऐसा क्राइम सीन रचा जा सकता था, जिसे दिन में नहीं रचा जा सकता था?

दोपहर के बाद की खबरों में कुछ एंकरों व रिपोर्टरों को कुछ सवाल तब सूझे जब कुछ वकीलों ने उनसे सवाल किए कि यह तो पता करो कि क्या यह एनकाउंटर सचमुच का एनकाउंटर था? तब भी शाम से रात तक एंकर और रिपोर्टर ‘पब्लिक सेटीमेंट’ को सर्वोपरि बताते रहे। शाम तक मीडिया ने दो पक्ष पैदा कर दिए। एक जो पुलिस एनकाउंटर को एकदम उचित और अनिवार्य ठहराता था, दूसरा जो एनकाउंटर में ‘गैर कानूनी हत्याएं’ मानता था। फिर भी सारी बाइटों-बहसों का निचोड़ यही बताता था कि पुलिस ने एक ‘नजीर’ पेश की। सोशल मीडिया में तो उनको भी लिंच कर देने की मांग होने लगी जो इस पर जरा भी ‘किंतु परंतु’ करते नजर आते। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष (सीपीएम को छोड़ कर) सबकी नजर में ‘एनकाउंटर’ न्याय का पर्याय था। एक नेता कहता कि ‘जैसे को तैसा हुआ’ तो दूसरा कहता कि ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ हुई। ऐसी उन्मादी व्याख्याएं बताती रहीं कि बहुतों के लिए यह एनकांउटर न होकर जरूरी ‘किंलिग’ थी और ‘उचित’ थी। एनकांउटर की ऐसी पूजा ‘दबंग’, ‘सिंघम’ और ‘राउडी राठौर’ टाइप  फिल्मों में ही दिखी थी। आज यही फिल्मी न्याय घर-घर में था। लोग उल्लसित थे। मीडिया उनके उल्लास व उन्माद को सही ठहरा रहा था।
आरोपितों के इस तरह के कथित एनकाउंटर को मीडिया ने जिस तरह से महिमा मंडित किया, अगर उस तरह से न करता तो इस तरह का एनकांउटर आदर्श न बनता। अगर मीडिया ने इस कांड की खबर को ‘खबर की तरह’ दिया होता और अपनी उन्मादभरी भाषा में उसका ‘हाइप’ न किया होता तो कानून व्यवस्था का सार्वजनिक मखौल न उड़ता  और पुलिस का ‘एनकाउंटर’ नजीर या आदर्श न बनता। इस वातावरण को मीडिया ने बनाया। इसे आपराधिक मानसिकता वाले चार युवाओं ने बनाया। फिर इसे  ‘अपराध का बदला अपराध’ या कहें कि ‘हत्या का बदला प्रतिहत्या’ कहने वाले नेताओं ने बढ़ाया और अंतत: हैदराबाद की पुलिस ने अपनी ‘दबंग’ छवि से घनीभूत किया। देखते-देखते न्याय ‘लिंचिग’ और ‘किलिंग’ में बदल गया। देश के जनतंत्र और कानूनतंत्र की जगह ‘बनाना-रिपब्लिक’ ने ले ली। कानून को हाथ में लेना आदर्श हो गया। नागरिक जीवन मूल्य व्यर्थ हो गए। इस पर कुर्बान होने वाले शायद नहीं जानते कि ‘पुलिसराज’ और ‘फासिज्म’ इसी तरह अपनी जगह बनाते हैं।


 
 

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