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04 Feb 2018 03:04:26 AM IST
Last Updated : 04 Feb 2018 03:16:09 AM IST

परत-दर-परत : अच्छे विचार की समस्याएं

राजकिशोर
परत-दर-परत : अच्छे विचार की समस्याएं
परत-दर-परत : अच्छे विचार की समस्याएं

अच्छे राष्ट्रपति का कर्तव्य है कि वह प्रधानमंत्री जो कहता है, उसे दुहरा दे. प्रधानमंत्री अरसे से कहते रहे हैं कि संसद और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ होने चाहिए.

वास्तव में प्रधानमंत्री जी जो कह रहे हैं, उसमें कुछ नया नहीं है. जब संविधान लागू हुआ, तब ऐसा ही होता था. मुझे कई ऐसे चुनावों की याद है जब मतदाता के हाथ में दो तरह की पर्चियाँ होती थीं, एक लोक सभा के उम्मीदवार को वोट देने के लिए और दूसरी विधान सभा के उम्मीदवार को वोट देने के लिए. इससे थोड़ी मुश्किल भी होती थी, क्योंकि अधिकांश मतदाताओं को पता ही नहीं था कि संसद और विधान सभा अलग-अलग चीजें हैं. उनके मन में सवाल उठता था कि एक देश में दो सरकारें कहां से आ गई. बहरहाल, संविधान लागू होने के बाद उम्मीद की जाती थी कि हर पांच साल पर संसद और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ होते रहेंगे. लेकिन 1957 के चुनाव के बाद इस उम्मीद पर पानी फिर गया. केरल की पहली निर्वाचित सरकार ने 1957 में शपथ ली और 1959 में उसे बर्खास्त कर दिया गया. यह लोकतांत्रिक अपराध तब हुआ जब जवाहरलाल प्रधानमंत्री थे और इंदिरा गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष थीं. इससे केरल विधान सभा और संसद के चुनावों की लय टूट ही गयी. बाद में संविधान के अनुच्छेद 356 का प्रयोग बढ़ता गया, जिसमें कहा गया है कि जब किसी राज्य में संविधान के अनुसार काम करना संभव न रह जाये, तब केंद्र सरकार उस राज्य की सरकार को बरखास्त कर या विधान सभा को भंग कर वहां राष्ट्रपति शासन लगा सकती है. संविधान में ही व्यवस्था है कि किसी भी राज्य की विधान सभा भंग हो जाने के बाद छह महीने के भीतर वहां चुनाव हो जाना चाहिए, लेकिन इस मर्यादा का पालन कम ही किया गया है. यहां तक कि संविधान को लांघ कर नया कानून बना दिया गया, जिससे छह महीने में मध्यावधि चुनाव कराना अनिवार्य न रह जाये.
संसद और विधान सभा के और पंचायतों के भी क्यों नहीं  चुनाव एक साथ हों, प्रधानमंत्री जी की इस चाह के पीछे निश्चय ही उनकी सदिच्छा है. उनका यह कहना ठीक ही है कि इससे चुनाव खर्च में भारी कमी आ जायेगी. प्रत्येक चुनाव पर होने वाला खर्च कितनी तेज गति से बढ़ रहा है, इसका अनुभव हम सभी करते हैं और अफसोस जताते हैं. लोगों में यह मुहावरा आम है कि इतना रुपया खर्च कर जो संसद या विधान सभा में जाता है, वह सब से पहले उतना कमाने की चिंता करेगा या नहीं? वित्त मंत्री मंत्रियों और सांसदों  का वेतन चाहे जितना बढ़ा दें, वह उस सीमा तक नहीं जा सकता जिस सीमा तक चुनाव खर्च चला जाता है. इसलिए भ्रष्टाचार मिटाना है और लोकतंत्र को स्वस्थ बनाना है, तो चुनाव लड़ने की लागत को तो कम करना ही होगा.

लेकिन इसके लिए क्या जरूरी है कि तब तक इंतजार किया जाये जब तक पूरा देश इसके लिए तैयार न हो जाये कि सभी लोकतांत्रिक निकायों का चुनाव एक साथ किया जाये?  मेरा खयाल है, अगर चुनाव खर्च की सीमा बांधनी है, तो यह आज और अभी किया जा सकता है. स्वयं प्रधानमंत्री जी का विचार रहा है कि चुनाव का सारा खर्च सरकार को वहन करना चाहिए और राजनैतिक दलों तथा उम्मीदवारों को चुनाव में एक रु पया भी खर्च करने की छूट नहीं होनी चाहिए. सरकार चाहे तो वह आज इस निर्णय की घोषणा कर सकती है. इससे सरकार का खर्च थोड़ा बढ़ जायेगा, लेकिन चुनाव में काले धन का आगम लगभग बंद हो जायेगा. तब सब से बड़ी बात यह होगी कि साधारण से साधारण आदमी भी चुनाव लड़ने मे सक्षम हो सकेगा. आज तो वही चुनाव लड़ सकता है जिसके घर में रु पयों के पेड़ लगे हुए हैं. सरकार इस बात को अच्छी तरह जानती है, फिर भी इस व्यापक विकृति से मुंह चुराये रहती है. बेशक, अगर यह तुरंत नहीं किया जा सकता, तो यह तो हो ही सकता है कि किसी भी चुनाव में कोई पार्टी जितना खर्च करती है, उस राशि को उसके सभी उम्मीदवारों में बांट दिया जाये और औसत रकम को उम्मीदवारों के चुनाव खर्च में जोड़ दिया जाये. अभी तो स्थिति यह है कि उम्मीदवार अपने चुनाव पर एक निश्चित सीमा तक ही  खर्च कर सकता है, पर उसकी पार्टी के लिए ऐसी कोई सीमा नहीं है. परिणामस्वरूप सभी पार्टयिों का चुनाव खर्च बढ़ता ही जा रहा है. चुनाव में पैसे का यह खेल हमारे लोकतंत्र का सब से बड़ा अभिशाप है.
प्रधानमंत्री जी का यह विचार फिर भी एक अच्छा विचार है, लेकिन इसमें एक बहुत बड़ा खतरा भी निहित है. प्रधानमंत्री जी जानते हैं कि व्यक्तित्व की दृष्टि से इस समय उनका कोई मुकाबला नहीं. उनके भक्त उनकी गलतियों को भी उनकी विशेषता मानने के लिए तैयार रहते हैं. इतने अंधभक्त तो नेहरू और इंदिरा गांधी के भी नहीं थे. विपक्ष में इतना लोकप्रिय व्यक्त्वि कोई और नहीं है. वस्तुत: लोक सभा का पिछला चुनाव जनाब के व्यक्तित्व के बल पर ही लड़ा गया था. भविष्य में कभी सभी संसदीय निकायों के चुनाव एक साथ हों, तो वह राष्ट्रपति प्रणाली का चुनाव हो जायेगा, जैसा कि अमेरिका में होता है. तब पार्टयिां नहीं, व्यक्तित्व चुनाव लड़ेंगे. यह इसलिए खतरनाक है कि अभी ही हमारे प्राय: सभी दल व्यक्ति-प्रधान हैं. तब जो नेता राष्ट्रीय स्तर पर सब से अधिक तमाशगीर जुटा सकेगा, वही भारत का भाग्य विधाता बन जायेगा. यह भारत जैसे बहुभाषी, बहुसमुदायी और बहुजातीय समाज के लिए खतरे की आखिरी घंटी होगी.


 
 

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