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 धर्म

 
नैतिकता

प्रकृति की मर्यादाओं-नियत नियमों की अनुकूल दिशा में चलकर ही सुखी, शांत और संपन्न रहा जा सकता है। ....

परमानंद

आज तो भ्रमित करने वाले नशे की दवाएं भी ब्लिस (परमानंद) के नाम से बेची जाती हैं। ....

जागरण-चरण

जागरण की तीन सीढ़ियां हैं। पहली सीढ़ी-प्राथमिक जागरण। बुरे का अंत हो जाता है और शुभ की बढ़ती होती है। अशुभ विदा होता होता है। शुभ घना होता है। ....

वसीयत व विरासत

बच्चे बड़ों से कुछ चाहते हैं, सो ठीक है, पर बड़े बदले में कुछ न चाहते हों ऐसी बात भी नहीं। नियत स्थान पर मल-मूत्र त्यागने, शिष्टाचार समझने, हंसने-हंसाने, वस्तुएं न बिखरने देने, पढ़ने जाने जैसी अपेक्षाएं वे भी करते ह ....

जागरूकता

अगर आप जागरूकता के साथ सोना चाहते हैं तो आप को अपने शरीर का कोई भाव नहीं होना चाहिए। ....

परमात्मा से पुकार

आत्मा ने परमात्मा से याचना की ‘असतो मा समय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतंगमय’। यह तीनों ही पुकारें ऐसी हैं, जिन्हें द्रौपदी और गज की पुकार के समतुल्य समझा जा सकता है। ....

प्रयोग

मैं एक जगह गया था जहां योग और योगियों पर सभी प्रकार के प्रयोग किये जा रहे थे। ....

जो हो वही रहो

तुम जहां हो, वहीं से यात्रा शुरू करनी पड़ेगी। अब तुम बैठे मूलाधार में और सहस्रर की कल्पना करोगे, तो सब झूठ हो जाएगा। ....

ब्रह्मांड

आप अगर अपने आसपास के जीवन के प्रति संवेदनशील हैं, तो आप को पता लग सकता है कि वे क्या कह रहे हैं। ....

चार बातें ज्ञान की

एक राजा के विशाल महल में एक सुंदर वाटिका थी,जिसमें अंगूरों की एक बेल लगी थी। ....

जागरूकता

अधिकतर लोग अपना सारा जीवन बस शरीर की मजबूरियां को पूरा करने में ही गुजार देते हैं- क्या खाना है, कहां सोना है, किसके साथ सोना है..ये सब सिर्फ शरीर की बाध्यताओं के बारे में सोचने की बात है। ....

हाथों में प्रकाश हो

मैं अंधा हूं, मुझे रात और दिन बराबर है। मुझे दिन का सूरज भी वैसा है, रात की अमावस भी वैसी है। मेरे हाथ में प्रकाश का कोई अर्थ नहीं है। ....

आभास

एक बार एक व्यक्ति की उसके बचपन के टीचर से मुलाकात होती है, वह उनके चरण स्पर्श कर अपना परिचय देता है। ....

किस्मत

बहुत सारे लोगों ने अपने जीवन को इस तरह व्यवस्थित किया हुआ है कि उन्हें जीवन में जो चाहिए, उनके पास वो है। ....

आलस्य

दरिद्रता भयानक अभिशाप है। इससे मनुष्य के शारीरिक, पारिवारिक, सामाजिक, मानसिक एवं आत्मिक स्तर का पतन हो जाता है। ....

शरीर

शायद आप नहीं चाहेंगे कि मैं ऐसे शब्द कहूं, लेकिन अपने जीवन के हर क्षण में, आप अपनी मृत्यु के थोड़ा पास पहुंच रहे हैं। ....

अहंकार

यह असंभव है। अहंकार का त्याग नहीं किया जा सकता क्योंकि अहंकार का कोई अस्तित्व नहीं है। अहंकार केवल एक विचार है: उसमें कोई सार नहीं है। ....

एकता-समता

राष्ट्रीय एकता का वास्तविक तात्पर्य है-मानवीय एकता। मनुष्य की एक जाति है। ....

प्रभाव

मनुष्य होने के कारण हम बहुत सारी अलग-अलग गतिविधियां कर सकते हैं। ....

अहंकार

साधन सम्पन्न का पतन होते ही समाज में उसकी असहनीय अप्रतिष्ठा होने लगती है। ....

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