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23 May 2020 12:12:00 AM IST
Last Updated : 23 May 2020 12:14:52 AM IST

आत्मनिर्भर अभियान से बढ़ेगा मजदूर का सम्मान

उपेन्द्र राय
सीईओ एवं एडिटर इन चीफ
आत्मनिर्भर अभियान से बढ़ेगा मजदूर का सम्मान
आत्मनिर्भर अभियान से बढ़ेगा मजदूर का सम्मान

एक चुनौती यह भी है कि घर लौट रहे ज्यादातर मजदूर अकुशल श्रमिक हैं, लेकिन खस्ताहाल अर्थव्यवस्था के बीच ऐसे सभी श्रमिकों के लिए कृषि या मनरेगा में अवसर निकालना संभव नहीं होगा। ऐसे में राज्यों को परंपरागत सोच से ऊपर उठकर प्रयोगधर्मी होना पड़ेगा। कहीं मजदूरों के लिए उनके अनुभव के हिसाब से नया रोजगार सृजित करना होगा, तो कहीं सरकारी योजनाओं के तहत कर्ज देकर उन्हें दोबारा अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर मुहैया करवाना होगा। प्रधानमंत्री मोदी का आत्मनिर्भर भारत अभियान शायद इन्हीं परिस्थितियों का पूर्वानुमान है।

पिछले करीब एक महीने से देश की सड़कों पर दिखाई दे रही प्रवासी मजदूरों की तस्वीरों के बारे में जितना कहा जाए, उतना कम है। बड़े-से-बड़े इतिहास का गवाह बन चुकीं इन सड़कों पर मजदूर बेबसी की जो इबारत लिख रहे हैं, वो ऐसे दस्तावेज के रूप में दर्ज हो रही है जिसकी मिसाल आने वाले कई साल तक दी जाएगी। ठीक उसी तरह जैसे सात दशक से भी पहले हुए देश के बंटवारे की तस्वीरें आज नये संदभरे में देखी जा रही हैं। दोनों तस्वीरों में फर्क बस रंग का है, वरना तो अपने देश में ही परदेसी हो जाने की बेबसी जैसी तब थी, आज भी वैसी ही है।

इन मजदूरों के लिए जिंदगी भले ही कल भी रंगीन नहीं थी, लेकिन उसमें रंग भरने की उम्मीद ही इन्हें ‘परदेस’ में भी जिंदादिल बनाए हुए थी। घर वापसी की मजबूरी ने उनकी जिंदगी से वो रंग ही नहीं छीना, बल्कि उनकी उम्मीदों को भी बेरंग कर दिया। विडंबना देखिए कि जब कोरोना के डर से समूची दुनिया घरों में कैद है, तब हमारे मजदूर सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर हैं। दो-जून की रोटी छिन जाने की बेबसी हजारों किलोमीटर के उस सफर से कहीं बड़ी निकली जिस पर लाखों परिवार भूखे पेट ही पैदल निकल पड़े। इसमें वो सैकड़ों मजदूर भी शामिल हैं, जो अब उस सफर पर चले गए हैं, जहां से कोई लौट कर नहीं आता। इस सफर में ऐसी अनगिनत कहानियां हैं, जिसे सुनकर किसी का भी दिल भर आएगा। शायद इसीलिए मद्रास हाई कोर्ट ने भी इसे मानवीय त्रासदी का नाम दिया है।

सवाल उठता है कि क्या इस हालात को टाला नहीं जा सकता था? किसी भी फैसले को सही या गलत की कसौटी पर कसने के दो नजरिए हो सकते हैं। एक फैसला लेते वक्त की परिस्थिति और दूसरा फैसले के बाद उत्पन्न हालात। दूसरे नजरिए से देखें तो यह कहने का आधार बनता है कि 20 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था का पहिया चलाने वाले हमारे मजदूरों का इस तरह पलायन की त्रासदी से अभिशप्त होना दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन पहला नजरिया लॉकडाउन के फैसले के वक्त से जुड़ता है, जिसे दुनिया जहान में कोरोना के खिलाफ लड़ाई का सही समय पर लिया गया सबसे सटीक फैसला माना गया। इस फैसले को लेकर बड़े पैमाने पर समझ बनी है कि मानवता को बचाने के इस सबसे बड़े अभियान के कारण ही करोड़ों परिवार सलामत हैं और इनमें कई लाख परिवार हमारे मजदूरों के भी हैं।

प्रधानमंत्री की अपील
लॉकडाउन के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देशवासियों से लगातार इस बात की अपील करते दिखे कि जो जहां हैं, वो वहीं रहें। इस अपील का चौतरफा असर भी दिखा। लेकिन जैसे-जैसे प्रवासी मजदूरों की कमाई के स्त्रोत बंद होते गए, उनमें पलायन के लिए बेचैनी बढ़ती गई। प्रवासी मजदूर इतना नहीं कमा पाते कि बचत कर पाएं। शहरों में रहकर जो थोड़ी-बहुत पूंजी बचाते भी हैं, उसे होली-दीपावली-छठ के मौके पर गांव में घरवालों को सौंप आते हैं। उस पर परिवार में कोई शादी-ब्याह निकल आए, तो परिवार का आर्थिक चक्र कर्जे के कुचक्र में उलझ जाता है, जिसकी भरपाई में ही लंबा वक्त लग जाता है। कोरोना के संकट काल में ज्यादातर मजदूरों ने अपनी आखिरी कमाई मार्च की शुरु आत में की थी। उसी कमाई पर जैसे-तैसे अप्रैल का महीना गुजरा। हालांकि सरकार की ओर से राशन-पानी का इंतजाम कर दिया गया, लेकिन असुरक्षित भविष्य की आशंका से मजदूरों का सब्र जवाब दे गया। जब मजदूर सड़क को पैदल ही नापने लगे, तो सरकार ने श्रमिक स्पेशल ट्रेनें भी शुरू कर दीं, लेकिन पलायन का आंकड़ा इतना बड़ा निकला कि उसके सामने दुनिया की चौथी सबसे बड़ी रेल सेवा भी छोटी पड़ गई। सरकार ट्रेनों की सुविधा का विस्तार करती, तब तक सड़कों पर मजदूरों का सैलाब उमड़ चुका था। 

प्रवासी मजदूरों को लेकर हुई सियासत ने हालात और चुनौतीपूर्ण बना दिए। सियासत अब भी जारी है। पहले श्रमिक स्पेशल ट्रेन के किराये को लेकर विवाद हुआ। श्रमिकों से कथित तौर पर ज्यादा किराया वसूलने की खबरों के बाद विपक्ष की ओर से किराया भुगतान करने की बात कही गई। ट्रेन के किराये से शुरू हुई सियासत का एक सिरा उत्तर प्रदेश के मजदूरों के लिए बस सुविधा की पेशकश से भी जुड़ा। इस बीच कुछ राज्यों पर संक्रमण के आंकड़ों को कम रखने के लिए दूसरे राज्यों से अपने प्रवासी मजदूरों की वापसी में रोड़े अटकाने के आरोपों को लेकर भी खूब सियासत हुई। हालांकि ज्यादातर राज्य इस चुनौतीपूर्ण समय में केंद्र के साथ सहयोग के लिए तैयार दिखे हैं, लेकिन कुछ राज्य ऐसे भी हैं, जहां समन्वय की तमाम कोशिशों के बावजूद केंद्र को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई है। इसका राजनीतिक निहितार्थ क्या है, यह भले ही साफ ना हो, लेकिन इतना स्पष्ट है कि इससे मजदूरों का कोई भला नहीं हो रहा।

हालांकि राहत की बात है कि इस मुश्किल घड़ी में भारतीय समाज अपनी जिम्मेदारी पर खरा उतर रहा है। सड़कों पर लगातार चल रहे हर एक मजदूर और उनके परिवारों तक सरकारी मदद पहुंचाना संभव नहीं है। ऐसे में कई सामाजिक, धार्मिंक, सांस्कृतिक संगठनों और युवाओं के समूह अपने स्तर पर प्रवासी मजदूरों को खाना खिलाने और चप्पलें पहनाने के साथ ही चिकित्सा सहायता जैसी सराहनीय मदद कर रहे हैं। वैसे भी सुख-दुख में एक-दूसरे का साथ निभाना भारतीय समाज की पुरानी पहचान रही है। फिर सरकार की अपनी सीमाएं भी होती हैं। इसलिए ऐसी आपदाओं में समाज से अपेक्षा भी रहती है कि वो ज्यादा-से-ज्यादा संख्या में अपने घरों से बाहर निकल कर प्रभावितों की मदद करे। प्रवासी मजदूरों की बड़ी संख्या को देखते हुए अभी समाज से और भी ज्यादा व्यापक मदद की जरूरत है।

प्रवासी मजदूरों के कल्याण की उम्मीद
सरकार की ओर से घोषित 20 लाख करोड़ के ‘कोविड बजट’ से भी प्रवासी मजदूरों के कल्याण की उम्मीद बंधी है। लेकिन इसके लिए घोषित योजनाओं का लाभ उन तक तुरंत पहुंचाना होगा। हालांकि मजदूरों का भरोसा बहाल करने के लिए और भी बहुत कुछ करने की जरूरत पड़ेगी। सबसे पहले तो राज्य सरकारों को आपसी समन्वय बना कर ऐसे इंतजाम करने चाहिए जिससे परिवार के साथ पैदल धक्के खा रहे मजदूर सुविधा और सम्मानजनक तरीके से अपने-अपने घर पहुंच सकें। रेलवे इस कोशिश में पहले से ही जुटा है। गुरु वार देर शाम को रेलवे ने आंकड़ा जारी कर बताया कि वो 2,050 से ज्यादा श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाकर 30 लाख से ज्यादा कामगारों को उनके गृह राज्य तक पहुंचा चुका है। घर पहुंचकर ये मजदूर हाथ-पर-हाथ धरे बैठकर अपने परिवारों पर बोझ बनना नहीं चाहेंगे। इसके लिए उन्हें स्थानीय स्तर पर ही जल्द-से-जल्द काम देने की जरूरत पड़ेगी, जिससे उनके गुजर-बसर का इंतजाम हो सके। लेकिन यह काम आसान नहीं रहने वाला है। अनुमान है कि उत्तर प्रदेश में 15-20 लाख प्रवासी मजदूरों की वापसी होगी। बिहार में घर वापसी कर रहे मजदूरों का आंकड़ा भी इसी के आसपास रहने की उम्मीद है, जबकि झारखंड में यह संख्या 10 लाख के आसपास रह सकती है। छत्तीसगढ़ में भी करीब दो से तीन लाख मजदूर घर वापसी कर सकते हैं। मध्य प्रदेश, राजस्थान, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में भी घर लौटने वाले मजदूरों की संख्या काफी बड़ी होगी।

इतने बड़े पैमाने पर मजदूरों का पलायन कोई सोची-समझी योजना नहीं, बल्कि एक तात्कालिक प्रतिक्रिया है। लेकिन इस प्रतिक्रिया से स्थानीय स्तर पर जो समस्या पैदा होगी वह तत्काल दूर नहीं होगी, बल्कि लंबे समय तक बनी रह सकती है। मजदूरों का रिवर्स माइग्रेशन तुरंत होगा, इसकी संभावना बेहद कम है।  इसलिए आधी-अधूरी कोशिशों से उनका भला नहीं हो सकेगा। इसके लिए ठोस कार्ययोजना पर काम करना होगा जिससे मजदूरों को अपना भविष्य सुरक्षित दिख सके। इसके लिए राज्यों को किसी केंद्रीय योजना के तहत साथ मिलकर काम करने के भी तैयार रहना होगा।

राज्यों के सामने एक चुनौती यह भी है कि घर लौट रहे ज्यादातर मजदूर अकुशल श्रमिक हैं, लेकिन खस्ताहाल अर्थव्यवस्था के बीच ऐसे सभी श्रमिकों के लिए कृषि या मनरेगा में अवसर निकालना संभव नहीं होगा। ऐसे में राज्यों को परंपरागत सोच से ऊपर उठकर प्रयोगधर्मी होना पड़ेगा। कहीं मजदूरों के लिए उनके अनुभव के हिसाब से नया रोजगार सृजित करना होगा, तो कहीं सरकारी योजनाओं के तहत कर्ज देकर उन्हें दोबारा अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर मुहैया करवाना होगा। प्रधानमंत्री मोदी का आत्मनिर्भर भारत अभियान शायद इन्हीं परिस्थितियों का पूर्वानुमान है। इसीलिए सरकार का लक्ष्य अब देश के साथ-साथ मजदूरों को भी आत्मनिर्भर बनाना है ताकि भविष्य की कोई भी चुनौती उन्हें फिर अपनी जिंदगी और आत्मसम्मान दांव पर लगाने के लिए मजबूर ना कर सके।


 
 

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