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23 Nov 2019 02:39:11 AM IST
Last Updated : 23 Nov 2019 03:05:21 AM IST

फीस बढ़ोतरी पर 'उन्माद' की टीस

फीस बढ़ोतरी पर
फीस बढ़ोतरी पर 'उन्माद' की टीस

आंशिक नहीं, व्यापक प्रभाव की अभिलाषी छात्र राजनीति, जेएनयू के छात्रों की स्थिति हालांकि देश में चल रही छात्र राजनीति के हिस्सेदार की ही है, फिर भी इनमें एक अलगाव है। साम्यवादी विचारधारा का अलगाव, जो विचारधारा के तौर पर प्रासंगिक तो है, लेकिन इसका क्रियात्मक धरातल शंकाओं से घिरा है। इसलिए इसका नामकरण ‘शहरी नक्सलवाद’ के रूप में हुआ है। यह शब्द वैचारिक कट्टरता का चोला ओढ़ता है, ठीक उस नक्सलवाद की तरह जो बंदूक और गोला-बारूद के दम पर अशिक्षित लोगों को बरगलाने का काम करता है।

वेग में बहती पानी की धारा में यदि कोई रंग घोला जाए, तो एक क्षेत्र तक वह धारा रंगीन नजर आती है, लेकिन धारा का वेग जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, और पीछे का वेग सामने के पानी को धक्का देता है, तो रंग किनारे की तरफ सरक कर धारा के तीर से लगी हुई मिट्टी पर मजबूत पकड़ बनाता है, और धारा फिर से रंगहीन, पारदर्शी बन जाती है। छात्र राजनीति की धारा भी ठीक ऐसी ही है। इस धारा में वेग है। लेकिन विचारधाराओं के रंग इसमें मिलते ही ये कभी उन्मादी हो जाती है, कभी शांत, तो कभी वैचारिक भावना बढ़ाती है। कुछ समय तक यह रंग साथ चलता है, फिर किनारे पर मजबूत पकड़ बनाता है, और बीच की धारा का वेग रंगहीन हो जाता है। इस उदाहरण में बीच धारा के रूप में उन छात्रों को माना जा सकता है, जिनके जीवन में राजनीति का रंग छात्र जीवन के बाद तकरीबन खत्म हो जाता है। लेकिन किनारे की मजबूत पकड़ वे लोग हैं, जिनका भविष्य राजनीति के अस्तित्व पर निर्भर हो जाता है। वर्तमान समय में छात्र राजनीति की यही धारा है। दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में जारी विरोध-प्रदर्शन इसका जीता-जागता उदाहरण है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रदर्शन का दौर सिर्फ मुफ्त शिक्षा या बढ़ाई गई फीस का नहीं है, बल्कि यह प्रदर्शन का दौर छात्र राजनीति के अतीत से उपजी उस सफलता को हासिल करने का है, जिसमें बड़े-बड़े राजनीतिक दल और सरकारों को हिलाने का माद्दा था। संदर्भ के तौर पर अब तक के बड़े-बड़े छात्र आंदोलनों का जिक्र किया जा सकता है। वह आंदोलन जिसमें राजनीतिक बदलाव की आशा थी, स्वतंत्रता की ललक थी, भविष्य निर्माण का संकल्प था। जैसे 1905 का स्वदेशी आंदोलन जिसमें पहली बार छात्रों ने बड़े पैमाने पर हिस्सा लिया था, इसका प्रभाव भी काफी व्यापक था। 1930-31 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका छात्रों की थी, जिसमें कर्निघम सर्कुलर के विरोध में हुए शक्तिशाली आंदोलन का नेतृत्व छात्रों ने किया। आजादी के बाद 1950 के दशक का असमिया छात्र आंदोलन भी बदलाव लेकर आया था, जिसमें राज्य सरकार की नौकरियों में असमी भाषी लोगों को प्राथमिकता देने और असमी को राज्य की सरकारी भाषा बनाने के साथ स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई का माध्यम बनाने की मांग रखी गई थी। इसके अलावा, गैरकानूनी प्रवासियों के खिलाफ भी छात्रों ने इसी दशक में आंदोलन छेड़ा था।

दक्षिण भारत के तमिलनाडु में हिंदी और हिंदी भाषियों के खिलाफ 1965 का वह छात्र आंदोलन ही था, जिसने हिंदी और गैर-हिंदी का फर्क आज तक बनाए रखा है। 1974 के बिहार के छात्र आंदोलन की शुरु आत जरूर अनाज, रसोई तेल और जरूरी वस्तुओं की कीमत के खिलाफ हुई थी, लेकिन इसकी नींव में गुजरात का छात्र आंदोलन ही था, जो बाद में जेपी आंदोलन के साथ महानगरों में विस्तृत छात्र आंदोलन के रूप में उभरा। बिहार और यूपी में इस आंदोलन ने भविष्य के बड़े नेता भी तैयार किए।

कमजोर भूमि पर बड़े छात्र आंदोलन
इसके बाद भी कई बड़े छात्र आंदोलन हुए, लेकिन परिस्थिति की भूमि कमजोर थी, दायरा भी बेहद सीमित रहा, परिवर्तन का आकार भी छोटा और आंशिक नजर आया। जेएनयू का इतिहास भी इसी आंशिक दायरे में घिरा रहा। फीस बढ़ोतरी के खिलाफ शुरू हुआ जेएनयू के छात्र-छात्राओं के आंदोलन का दायरा भी सीमित और आंशिक है। सीमित इसलिए है, क्योंकि इस विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं पिछड़े इलाकों के गरीब परिवारों से संबंधित हैं। करीब 60 फीसदी ऐसे विद्यार्थी हैं, जिनकी पारिवारिक आय का स्रोत बेहद सीमित और अति गरीब की श्रेणी का है। इसलिए सतही तौर पर इस आंदोलन का मकसद सिर्फ जेएनयू में किफायती हॉस्टल फीस, मेस का खर्च और दूसरे खर्च को यथावत रखना है। वर्तमान छात्र राजनीति की धारा भी इतनी ही सिमटी हुई है, यही कारण है कि देश में मुफ्त शिक्षा व्यवस्था को लेकर छात्र कभी संगठित ही नहीं हुए, न ही शिक्षा व्यवस्था को लेकर आंदोलन खड़ा हो सका। छात्र राजनीति चुनाव कराने, दक्षिण या वाम पंथ के बड़े दलों की ताकत बनने, विरोध-प्रदर्शन के दौर में जोश दिखाने तक सीमित हो गई।

जेएनयू के छात्रों की स्थिति हालांकि देश में चल रही छात्र राजनीति के हिस्सेदार की ही है, फिर भी इनमें एक अलगाव है। साम्यवादी विचारधारा का अलगाव, जो विचारधारा के तौर पर प्रासंगिक तो है, लेकिन इसका क्रियात्मक धरातल शंकाओं से घिरा है। इसलिए इसका नामकरण ‘शहरी नक्सलवाद’ के रूप में हुआ है। यह शब्द वैचारिक कट्टरता का चोला ओढ़ता है, ठीक उस नक्सलवाद की तरह जो बंदूक और गोला-बारूद के दम पर अशिक्षित लोगों को बरगलाने का काम करता है।

लेकिन ‘शहरी नक्सलवाद’ में अंतर सिर्फ इतना है कि जिसके जहन में इसका बीज पनपता है, उसे भौतिक जगत का सबसे बड़ा विद्वान होने का भ्रम हो जाता है, वह खुद हाथों में बंदूक नहीं पकड़ता, न ही जंगलों की खाक़ छानता है, बल्कि अपने वैचारिक कट्टरपन से समाज में द्वेष फैलाता है। बंदूक-गोलियों की भाषा नहीं बोलता, बल्कि अपनी जुबान से उस रिसर्च का प्रसार करता है, जो वह बिना सैंपल-सर्वे या किसी वैज्ञानिक पद्धति के सिर्फ भावनात्मक अध्ययन से तैयार करता है। यही भावना इस वक्त जेएनयू के विरोध प्रदर्शन की आग में घी का काम कर रही है। इसलिए वैचारिक कट्टरता विरोध प्रदर्शन में लिपट कर बह रही है, और शहरी नक्सलवाद का उन्माद कानून की परवाह किए बिना सबको छोटा और शक्तिहीन बताने की कोशिश कर रहा है।

सवाल यह भी है, कि क्या जेएनयू के विद्यार्थियों का प्रदर्शन गलत है? इसका जवाब लोकतांत्रिक भावना में है, क्योंकि भारत का लोकतंत्र इतना ज्यादा लचीला है कि विभिन्न विचारधाराओं को अपनी बात रखने का मंच देता है। इसलिए विरोध-प्रदर्शन गलत नहीं है, लेकिन विरोध का तरीका गलत है। विश्वविद्यालय परिसर में तोड़फोड़, दीवारों पर स्लोगन, कुलपति को हटाने की मांग नेतृत्वविहीन आंदोलन की पृष्ठभूमि से ही उठ सकती है। ठीक ‘शहरी नक्सलवाद’ की उस हठ की तरह जो बातों पर हामी भरवाने के लिए कट्टर विचारधारा का पोषण करती है।

छात्र-शक्ति में तंत्र बदलने का माद्दा
देश की छात्र शक्ति प्रणाली किसी तंत्र को बदलने का माद्दा रखती है, लेकिन कट्टरता से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से। ठीक वह तरीका जिसे महात्मा गांधी ने अपनाया था। विरोध प्रदर्शन के जरिए उन्होंने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई, लेकिन उसमें भी संयम था, अधिकार के साथ कर्त्तव्य का बोध था। उनकी ताकत भी उस वक्त के छात्रों की युवा शक्ति थी, जिसने संयम का परिचय दिया था। लेकिन बदलते परिवेश में 1800 ईस्वीं की परिभाषाओं से गढ़ी साम्यवादी विचारधारा में खुद को रंगकर मौजूदा छात्र राजनीति संयम नहीं सीख पाई। इसलिए जिस प्रदर्शन के लिए विरोध के दूसरे तरीके अपनाए जाने थे, उस पर विचार ही नहीं हुआ। छात्र हॉस्टल से निकल कर कैम्पस में खुले आसमान के नीचे सोते, उसी आसमान के नीचे खुद अपना खाना बनाते, वहीं अपनी पढ़ाई करते, जूनियर्स की मदद करते, सीनियर्स से मदद लेते, तो शायद हंगामे के बिना भी वह अपनी बात महात्मा गांधी की तरह सरकारी तंत्र तक पहुंचा सकते थे।



जेएनयू के संदर्भ में छात्र राजनीति का प्रभाव सकारात्मक और नकारात्मक भाव की युवा शक्ति में सिमट गया है। सकारात्मक संघर्ष निष्कर्ष तक पहुंचने में सक्षम होता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। विरोध-प्रदर्शन का नकारात्मक प्रभाव गुस्से और उन्माद में लिपट गया, ठीक वामपंथ के कट्टर विचारों से जन्मे ‘शहरी नक्सलवाद’ की तरह। सच तो यही है कि अगर सही मायने में तंत्र में बदलाव चाहिए तो उसके लिए पहले खुद को बदलना होगा। अगर आप चाहते हैं कि आपकी बातें सुनी जाएं, तो सुनने की उतनी ही क्षमता को अपने अंदर विकसित करना होगा। अगर विरोध-प्रदर्शन का असर व्यापक चाहते हैं, तो विचारों में व्यापकता भी लानी होगी।


उपेन्द्र राय
सीईओ एवं एडिटर इन चीफ
 

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