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09 Dec 2019 06:08:09 AM IST
Last Updated : 09 Dec 2019 06:10:25 AM IST

दूसरा पहलू : सही और सही में द्वंद्व

विनीत नारायण
दूसरा पहलू  : सही और सही में द्वंद्व
दूसरा पहलू : सही और सही में द्वंद्व

हैदराबाद में नवयुवती पशु चिकित्सक का बलात्कार करने एवं उसे जला कर मार देने के आरोपित चारों युवाओं को पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया।

इसे लेकर सारे देश में एक उत्साह का वातावरण है। देश का बहुसंख्यक समाज इन पुलिसकर्मिंयों को बधाई दे रहा है। वहीं कुछ लोग हैं, जो इस एनकाउंटर की वैधता और न्याय के तौर-तरीकों पर ही सवाल खड़े कर रहे हैं। दरअसल, दोनों पक्ष अपनी-अपनी जगह सही हैं। कैसे, इसका हम यहां विवेचन करेंगे।
लोगों का हष्रोन्माद इसलिए है कि हमारी पुलिस की जांच-प्रक्रिया और हमारे देश की न्याय-प्रक्रिया इतनी जटिल, लंबी और थका देने वाली होती है कि आम जनता का उस पर से लगभग विश्वास खत्म हो गया है। इसलिए बलात्कार के बाद अभागी कन्या को बेदर्दी से जलाकर मारने वालों को पुलिस ने अगर मार गिराया, तो आम जनता में इस बात का संतोष है कि अपराधियों को उनके किये की सजा मिल गई। अगर ऐसा न होता, तो हो सकता है कि अगले 20 बरस भी वे कानूनी प्रक्रिया में ही खिंच रहे होते। बलात्कारी को फांसी देने की मांग भी समाज का एक वर्ग दशकों से करता रहा है। इस्लामिक देशों में प्राय: ऐसी सजा देना आम बात है। इतना ही नहीं, मार डाले गए अपराधी की लाश को शहर के बीच चौराहे में ऊंचे खंभे पर लटका दिया जाता है ताकि लोगों के मन यह डर बैठ जाए कि अगर उन्होंने ऐसा अपराध किया तो उनकी भी यही दशा होगी।

पर यह मान्यता सही नहीं है। फ्रांस के एक राजा ने देश में बढ़ती हुई जेबकतरी की समस्या को हल करने के लिए एलान करवाया कि हर जेबकतरे को चौराहे पर फांसी दी जाएगी। आश्चर्य तब हुआ जब एक जेबकतरे को चौराहे पर फांसी दी जा रही थी, तो जो सैकड़ों तमाशबीन खड़े थे, उनमें से दर्जनों की जेबें भीड़ में कट गई, यानी फांसी का खौफ भी जेबकतरे को जेब की चोरी का अंजाम देने से रोक नहीं सका। इसीलिए लोगों का मानना है कि चाहे बलात्कारियों को फांसी पर ही क्यों न लटका दिया जाए तो इससे भविष्य में बलात्कारों की तादाद में भारी कमी नहीं आएगी।
बलात्कार करने का आवेग, वह परिस्थिति, व्यक्ति के संस्कार आदि ये सब मिलकर तय करते हैं कि वह व्यक्ति किसी का बलात्कार करेगा या अपने पर संयम रख पायेगा। अत: केवल कानून से उसे संयम-सभ्यता बरतने पर बाध्य नहीं किया जा सकता। इसलिए मानवाधिकारों की वकालत करने वाले और मनुष्य को ईश्वर की कृति मानने वालों का मानना है कि किसी व्यक्ति को, चाहे वह अपराधी क्यों न हो, उसको मारने का हक किसी इंसान को नहीं है। इसलिए वे लोग फांसी का भी विरोध करते हैं। उनका एक तर्क यह भी है कि फांसी दे देने से न तो उस अपराधी को अपने किये पर पश्चाताप करने का मौका मिलता है और न ही उसके उदाहरण से किसी को सबक मिलता है। इन लोगों का मानना है कि अगर अपराधी को आजीवन कारावास दे दिया जाए, तो न सिर्फ वह पूरे जीवन अपने अपराध का प्रायश्चित करता है, बल्कि अपने परिवेश में रहने वालों को भी ऐसे अपराधों से बचने की प्रेरणा देता रहेगा।
यहां एक तर्क यह भी है कि यह आवश्यक नहीं कि पुलिस जिन्हें एनकाउंटर में मारती है, वह वास्तव में अपराधी ही हों। भारत जैसे देश में जहां पुलिस का जातिवादी होना और उसका राजनीतिकरण होना एक आम बात हो गई है, वहां इसकी पूरी संभावना होती है कि पुलिस जिन्हें अपराधी बता रही है या उनसे कबूल करवा रही है, वास्तव में वे अपराधी हों ही नहीं। अपराध करने वाला प्राय: कोई बहुत धन्ना सेठ का बेटा या किसी राजनेता या अफसर का कपूत भी हो सकता है और ऐसे हाई प्रोफाइल मुजरिम को बचाने के लिए पुलिस मनगढ़ंत कहानी बना कर उस वीआईपी सुपुत्र के सहयोगियों या कुछ निरीह लोगों को पकड़कर उनसे डंडे के जोर पर स्वीकारोक्ति करवा लेती है। फिर इन्हीं लोगों को इसलिए एनकाउंटर में मार डालती है ताकि कोई सबूत या गवाह न बचे। यहां मेरा आशय बिल्कुल नहीं है कि हैदराबाद कांड के चारों आरोपित बलात्कारी नहीं थे। मुद्दा केवल इतना-सा है कि बिना पूरी तहकीकात किये किसी को इतने जघन्य अपराध का अपराधी घोषित करना नैसर्गिक कानून  विरुद्ध है। हो सकता है कि इन आरोपित चार युवाओं से जांच में इस बलात्कार और हत्या के असली मुजरिम का पता मिल जाता और तब अपराध की सजा उसे ज्यादा मिलती, जिसने इस अपराध को अंजाम दिया। इसलिए किसी अपराधी के खिलाफ मुकदमा चलाने की वैधता लगभग सभी आधुनिक राष्ट्र मानते हैं। इसीलिए आज जहां एक तरफ बहुसंख्यक लोग इन बलात्कारियों को मौत देने की मांग करते हैं, वहीं दूसरे लोग हर एक व्यक्ति को स्वाभाविक न्याय का हकदार मानते हैं।
 जो भी हो, इतना तो तय है कि कोई भी अभिभावक यह नहीं चाहेगा कि उसकी बहू-बेटियां सड़कों पर असुरक्षित रहें। वह इस मामले में प्रशासन की ओर से कड़े कदम उठाने की मांग करेगा। अब यह संतुलन सरकार को हासिल करना है, जिससे बलात्कार के अपराधियों को सजा भी मिले और निर्दोष को झूठा फंसाया न जाए। बलात्कार को रोकना किसी भी पुलिस विभाग के लिए सरल नहीं है। शहर और गांव के किस कोने, खेत, गोदाम या घर में कौन किसके साथ बलात्कार कर रहा है, पुलिस कैसे जानेगी? जिम्मेदारी तो समाज की भी है कि बलात्कार करने की घृणित मानसिकता के खिलाफ माहौल तैयार करे।
 ऐसे में अब निर्णायक पहल महिलाओं को करनी होगी। जैसे उत्तरांचल की महिलाओं ने आज से चालीस पहले चिपको आंदोलन चला कर पेड़ों से चिपक कर अपने वनों को कटने से बचाया और माफि़या की कमर तोड़ दी थी। इसी तरह, हर शहर और गांव की महिलाओं को लगातार आंदोलन चलाकर यह तय करवाना चाहिए कि बलात्कार या महिलाओं से छेड़छाड़ के मामले में पुलिस और अदालत क्या करेंगी? कैसे जांच होगी और न्याय प्रक्रिया कैसे चलेगी । ये सब साफ़ हो जाना चाहिए। महिलाओं को अपने अपने विधायकों और सांसदों का लगातार घेराव करना चाहिए कि वे ये बदलाव लाने में  तेज़ी दिखाएं। जब तक अपेक्षित बदलाव न आ जाय, यह आंदोलन थमना नहीं चाहिए। तभी कुछ बदलेगा। इससे भी बड़ी बात यह कि पुलिस जांच और न्याय की प्रक्रिया को सुधारा जाय जिससे इनके प्रति जनता का टूटता विश्वास फिर से क़ायम हो।


 
 

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