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03 Dec 2019 06:45:11 AM IST
Last Updated : 03 Dec 2019 06:47:24 AM IST

खेती-किसानी : खुशहाली की खातिर

आनंद किशोर
खेती-किसानी : खुशहाली की खातिर
खेती-किसानी : खुशहाली की खातिर

किसान की समस्याएं दिनोंदिन विकराल होती जा रही हैं। पूरे देश में बाढ़ तथा सुखाड़ ने भारी तबाही मचाई और जान-माल की व्यापक क्षति हुई परंतु फसल क्षति की भरपाई, इनपुट सहायता तथा बीमा का लाभ सभी पीड़ित किसानों तक नहीं पहुंच सका है।

पीड़ित किसानों की आत्महत्या का सिलसिला अभी भी जारी है। हाल में ही जारी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट से भी खुलासा हुआ है कि 2016 में हर माह 948 यानी रोजाना 31 किसानों ने खुदकुशी की। यह चिंता की बात है कि सरकार आखिरकार इतनी संवेदनहीन क्यों है?
एक अनुमान है कि 2014 के बाद 35 हजार किसानों ने आत्महत्या की है। सरकारी रिपोर्ट आत्महत्या के आंकड़े छिपाती है। आंकड़े छिपाने हेतु उन्हें विभिन्न श्रेणियों में विभाजित कर दिया गया है यानी डेटा काउंटिंग का तरीका बदल दिया गया है  जैसे किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों को बटाईदार, मजदूर तथा अन्य श्रेणी में विभक्त कर दिया गया ताकि किसानों की आत्महत्या संबंधी आंकड़े कम दिखें। आत्महत्या का मूल कारण बाढ़-सुखाड़ से फसल की बर्बादी, उपज का लाभकारी दाम नहीं मिलना, ऋणजाल में फंसते जाना तथा भविष्य की खेती के संकट के साथ उत्पादन के साधनों तथा घरेलू उपयोग की सामग्री की बढ़ती लागत भी है। सरकार स्वामीनाथन आयोग की अनुशंसा के आलोक में ड्योढ़ा मूल्य देने की बात तो दूर उस पर चर्चा तक नहीं कराना चाहती।

दूसरी ओर, सरकार द्वारा तय एमएसपी पर भी कृषि उत्पादों की खरीद नहीं होती, सरकारी खरीद किसानों के साथ मजाक बनी हुई है। किसान कृषि  की जरूरतों को पूरा करने के लिए बिचौलियों के हाथों अपना उत्पाद औने-पौने भाव पर बेचने को विवश है। इन परिस्थितियों में किसान घाटे की खेती करने को मजबूर है क्योंकि उसके जीवनयापन का कोई दूसरा आधार नहीं है। नोटबंदी ने भी किसानों को बहुत परेशान किया। आज बैंक किसानों के बदले पूंजीपतियों की ओर मुखातिब हैं। किसानों के ऋणमुक्ति की बात नहीं होती, ऋणमुक्ति के विरोध में सारे अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ तथा ब्यूरोक्रेसी एकजुट खड़े हो जाते हैं, जबकि किसानों  से  छोटे ऋण की वसूली के लिए कानूनी कार्रवाई के लिए सरकार खड़ी रहती है। उद्योगपतियों के ऋण एनपीए हो रहे हैं तथा कुछ लोग बैंकों से हजारों करोड़ लेकर फरार हो चुके हैं। बावजूद उद्योगपतियों को पुन: ऋण उपलव्ध कराने के लिए सरकार बैंकों को पुनर्वित्त की सुविधा प्रदान दे रही है।
किसान संगठनों ने ‘ऋणमुक्ति तथा ड्योढ़ा दाम’, दोनों मुद्दों के साथ अन्य समस्याओं जैसे भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 पर सख्ती से अमल करने, वन कानून के तहत आदिवासियों के अधिकारों की सुरक्षा देने तथा विस्थापन  पर रोक लगाने, पुनर्वास तथा नदी जल प्रबंधन जैसे महत्त्वपूर्ण साधनों का विनाश रोकने तथा सिंचाई की व्यवस्था, सभी ग्रामीणों को दस हजार रुपये मासिक पेंशन तय करने, मुक्त  व्यापार  संधियों से खेती को मुक्त  रखने, खेतिहर मजदूर तथा बटाईदार किसानों के हक में समग्र कानून बनाने,फसल बीमा तथा आपदा मुआवजे की त्वरित भुगतान प्रकिया में सुधार, जम्मू-कश्मीर के किसानों के नुकसान  की भरपाई  करने, पराली  तथा पत्ती के उपयोग  के लिए किसानों  को सहयोग  देने तथा कॉरपोरेट  लूट के  खिलाफ तथा गन्ना को वाजिब मूल्य, गन्ना मूल्य  के बकाये के भुगतान, तटबंधों से विनाश सहित अन्य  ज्वलंत  सवालों  पर व्यापक  चर्चा कर उन्हें एजेन्डा में जोड़कर गांवों से जुड़ने तथा किसान हित में आंदोलन तेज कर सरकार पर दबाव बनाने की  रणनीति  बनाई है।
हार्टकिल्चर पर भी केसीसी  देने तथा दूध, सब्जियों तथा हार्टकिल्चर का भी एमएसपी तय किये जाने की मांग की जा रही है। किसानों को आरसीईपी की तलवार खेती पर लटकने की चिंता है। खेती अभी प्रतियोगी नही है इसे पर्याप्त  सहयोग  की जरूरत  है अगर आरसीईपी को खेती से जोडा जायगा तो खेतिहरों का विनाश तय है। उधर, ‘किसान  सम्मान  योजना’ से भी किसानों को भ्रम टूट रहा है, किसान इसे अपर्याप्त तथा ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ की तरह मान रहे है। कृषि आय दुगुनी करने की सरकारी घोषणा की दिशा में कुछ नहीं दिखता। लगता है यह घोषणा भी जुमला  बनकर रह जायेगा। अभी कुछ दिन पहले केन्द्र सरकार ने गन्ना  के  उचित एवं लाभकारी मूल्य तय करने के नाम पर एक रुपया नहीं बढ़ाया। राज्य सरकारें भी परामर्शी मूल्य नहीं बढ़ा रही है जबकि उर्वरक, कीटनाशक,मजदूरी तथा बिजली की दरों में वृद्धि  से उत्पादन  लागत बहुत बढ़ी है। समय रहते सरकार को  किसानों  की पीड़ा की समीक्षा  करनी चाहिए। केवल बातों से किसानों के मसले का हल नहीं होने वाला।


 
 

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