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31 Dec 2017 02:26:25 AM IST
Last Updated : 31 Dec 2017 02:36:48 AM IST

अपने आप को अपराधमुक्त कर देना

राजकिशोर
अपने आप को अपराधमुक्त कर देना
फेसबुक (फाइल फोटो)

इधर फेसबुक का एक नया उपयोग शुरू हुआ है. एनडीटीवी के रवीश कुमार जिसे गोदी मीडिया कहते हैं, वह दिन-प्रतिदिन गुस्ताख होता जा रहा है.

कई वर्षो से इक्का-दुक्का जगहों को छोड़ कर केंद्र सरकार या भारतीय जनता पार्टी की संगत आलोचना करने के लिए भी जगह नहीं बची है. ठीक है कि विद्वेषपूर्ण या पूर्वाग्रहयुक्त आलोचना से समाज को कोई लाभ नहीं होता बल्कि नुकसान ही होता है, लेकिन जब सामान्य या वस्तुपरक आलोचना के लिए भी जगह सिकुड़ती जाए तो सच और प्रचार के बीच की सीमा रेखा ही धूमिल होने लगती है.

डॉ. लोहिया का कहना था कि जनतंत्र का मतलब है बहस से चलने वाली सरकार. लेकिन जब स्वतंत्र तर्क-वितर्क की गुंजाइश ही न रह जाए तब बहस कैसे होगी? चूंकि परंपरागत मीडिया अखबार, रेडियो, टेलीविजन में यह गुंजाइश लगभग खत्म हो चुकी है, इसलिए लोग अपना गुबार फेसबुक पर निकाल रहे हैं. फेसबुक में सरकार के कुछ खास पहलुओं की आलोचना तीव्र होती जा रही है. बेशक, इन लिखतों में बहुत कुछ अनर्गल होता है. गाली-गलौज भी. लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में यह खतरा हमेशा बना रहता है. इस संबंध में गांधी जी की यह बात बहुत प्रासंगिक है कि जिस स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं हो सकता, वह स्वतंत्रता ही नहीं है.

फेसबुक पर ही हाल में देहरादून की राजनैतिक कार्यकर्ता कविता कृष्णपल्लवी की मजेदार टिप्पणी आई है, जिसे उन्होंने 'एक तिलस्मी यथार्थवादी भारतीय कहानी' कहा है. कहानी यह है : 'रामू ने एक दिन बहुत उत्पात मचाया. फिर रामू ने रामू को गिरफ्तार कर लिया. रामू की अदालत में रामू का मुकदमा चला. रामू ने रामू पर अभियोग लगाए और फिर रामू ने रामू का बचाव किया. जज रामू अभियुक्त रामू को दोषमुक्त करने के बारे में सोच ही रहा था कि सरकार रामू ने आदेश जारी कर दिया कि रामू पर मुकदमा चलाया ही नहीं जा सकता. इस तरह सरकार ने जनता के प्रति अपना कर्तव्य निभाया और न्याय की लंगोटी उतरते-उतरते रह गई.'

कविता जी ने इस कहानी को यथार्थवादी कहा है, और साथ ही तिलस्मी भी. कहानी की खूबी यह होती है कि उसमें यथार्थ होता है, लेकिन वह सीधे-सीधे नहीं आता. कलात्मक ढंग से आता है. लेकिन संवेदनशील पाठक तुरंत समझ जाता है कि इशारा किधर है. स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान बहुत-सी ऐसी रचनाएं लिखी गई जिनमें अंग्रेजी सरकार का कोई जिक्र नहीं था, पर उन्हें खतरनाक समझ कर उन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. इन्हीं में एक रचना थी, प्रेमचंद की 'सोजे वतन'. 'एक तिलस्मी यथार्थवादी भारतीय कहानी' भी ऐसी ही है.

कहानी में वह रामू कौन है, जिसने उत्पात किया था? वह रामू कौन है, जिसने आदेश जारी कर दिया कि रामू पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता? कहने की जरूरत नहीं कि दोनों एक ही सज्जन योगी आदित्यनाथ हैं. उत्तर प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री. लेकिन मुख्यमंत्री बनाए जाने के पहले का इनका एक राजनैतिक इतिहास भी है. मुख्यमंत्री बनने के पहले सांसद थे. उत्तर प्रदेश की पिछली सरकार ने योगी पर बहुत-से मुकदमे दायर किए थे. कुछ में आरोप थे-दंगा करना, हत्या करने का प्रयास करना, खतरनाक हथियारों से लैस होना, दूसरों की जिंदगी को खतरे में डालना और अवैध जनसमूह का सदस्य होना. इनमें से कोई भी मुकदमा सिविल नहीं है.



सभी फौजदारी यानी इंडियन पीनल कोड में वर्णित अपराधों से संबंधित हैं, जिनके लिए सजा दिलाना सरकार की जिम्मेदारी होती है, क्योंकि माना जाता है कि ये अपराध व्यक्ति नहीं, समाज के विरुद्ध हैं. योगी की सरकार आने तक इनमें से एक भी मुकदमे का निपटारा नहीं हो पाया था. कायदे से जब कोई सरकारी मुकदमा शुरू हो गया तो पुलिस की जिम्मेदारी हो जाती है कि उसे तार्किक परिणति तक पहुंचाए. अपराध की मीमांसा न्यायपालिका का विषय है. मेरा मानना है कि पुलिस भी न्यायपालिका के अधीन होनी चाहिए जिससे उम्मीद की जाती है कि कानून का पालन करेगी और कराएगी. पुलिस सरकार के अधीन होती है, तो उसका दुरु पयोग हो सकता है, और कोई देश ऐसा नहीं होता है, जहां ऐसा न होता हो.

तो हुआ यह कि योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली तो उनके सामने वे कागजात पेश किए गए जिन पर उनके हस्ताक्षर के बाद ही उनके विरुद्ध चल रहे मुकदमों को जारी रखा जा सकता था. विचित्र स्थिति थी. कौन आरोपित इतना दिलदार होगा कि कहे कि शौक से मुकदमे जारी रखो, मैं निर्दोष हूं, मुझे कोई भी अदालत सजा नहीं दे सकती. लेकिन मुख्यमंत्री कोई साधारण आदमी नहीं होता. उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी होती है कि वह अपने राज्य में इंडियन पीनल कोड को लागू होने दे और जो इसका उल्लंघन करता है, उसे सजा दिलवाए. मुख्यमंत्री खुद सजा नहीं दे सकता, यह काम अदालत का है.

इसलिए वही तय कर सकती है कि किस मुकदमे में दम है, और किस मुकदमे में नहीं. लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कानून हाथ में लेकर अपने खिलाफ चल रहे सभी मुकदमों को निरस्त कर दिया. क्या यह संविधान के विरुद्ध और न्यायपालिका का अपमान नहीं है? सवाल यह भी है कि जिन अदालतों में ये मुकदमे लंबित थे, उन्होंने किस वजह से ऐसा होने दिया? 


 
 

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