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02 Dec 2017 05:41:25 AM IST
Last Updated : 02 Dec 2017 05:45:51 AM IST

गैस-त्रासदी : ठहरा दी गई वह रात

अनिल जैन
गैस-त्रासदी : ठहरा दी गई वह रात
गैस-त्रासदी : ठहरा दी गई वह रात

तीन दिसम्बर 1984 की आधी रात के बाद भोपाल के यूनियन कार्बाइड के कारखाने से निकली जहरीली गैस (मिक यानी मिथाइल आइसो साइनाइट) ने अपने-अपने घरों में सोए हजारों लोगों को एक झटके में हमेशा-हमेशा के लिए सुला दिया था.

जिन लोगों को मौत अपने आगोश में नहीं समेट पाई थी, वे उस जहरीली गैस के असर से मर-मर कर जिंदा रहने को मजबूर हो गए थे. ऐसे लोगों में कई लोग तो उचित इलाज के अभाव में मर गए. और जो किसी तरह जिंदा बच गए उन्हें तमाम संघर्ष के बावजूद न तो आज तक उचित मुआवजा मिल पाया है और न ही उस त्रासदी के बाद पैदा हुए खतरों से पार पाने के उपाय किए जा सके हैं. अब भी भोपाल में यूनियन कारबाइड कारखाने का सैकड़ों टन जहरीला मलबा उसके परिसर में दबा या खुला पड़ा हुआ है. इस मलबे में कीटनाशक रसायनों के अलावा पारा, सीसा, क्रोमियम जैसे भारी तत्व है, जो सूरज की रोशनी में वाष्पित होकर हवा को और जमीन में दबे रासायनिक तत्व भू-जल को जहरीला बनाकर लोगों की सेहत पर दुष्प्रभाव डाल रहे हैं. यही नहीं, इसकी वजह से उस इलाके की जमीन में भी प्रदूषण लगातार फैलता जा रहा है और आसपास के इलाके भी इसकी चपेट में आ रहे हैं. मगर न तो राज्य सरकार को इसकी फिक्र है और न केंद्र सरकार को. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो बहुप्रचारित देशव्यापी स्वच्छता अभियान चला रखा है, उसमें भी इस औद्योगिक जहरीले कचरे और प्रदूषण से मुक्ति का महत्त्वपूर्ण पहलू शामिल नहीं है.
तात्कालिक तौर पर लगभग दो हजार और उसके बाद से लेकर अब तक कई हजार लोगों की अकाल मृत्यु की जिम्मेदार विश्व की यह सबसे भीषणतम औद्योगिक त्रासदी आज तीन दशक बाद भी औद्योगिक विकास के रास्ते पर चल रही दुनिया के सामने एक सवाल बनकर खड़ी हुई है. इंसान को तमाम तरह की सुख-सुविधाओं के साजो-सामान देने वाले सतर्कताविहीन विकास का यह रास्ता कितना मारक हो सकता है, इसकी मिसाल भोपाल में तैंतीस बरस पहले भी देखने को मिली थी और अब भी देखी जा रही है. गैस रिसाव से वातावरण और आसपास के प्राकृतिक संसाधनों पर जो बुरा असर पड़ा, उसे दूर करना भी संभव नहीं हो सका. नतीजतन, भोपाल के लोग आज तक उस त्रासदी के प्रभावों को झेल रहे हैं. जिस समय देश औद्योगिक विकास के जरिए समृद्ध होने के सपने देख रहा है, उन लोगों की पीड़ा भी अवश्य याद रखी जानी चाहिए. सिर्फ  उनसे हमदर्दी जताने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य में ऐसी त्रासदियों से बचने के लिए भी यह जरूरी है.

कारखाना-परिसर में रखे 350 टन जहरीले रासायनिक कचरे का निपटान सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी नहीं हो सका है. इस कचरे को ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी कारखाने के प्रबंधन की थी, मगर जब सरकार खुद उसके बचाव में खड़ी हो गई तो उससे वाजिब सख्ती की उम्मीद कैसे की जा सकती थी! सरकार ने इस कंपनी के अमेरिकी प्रबंधन से अदालत के बाहर समझौता कर लिया था और रासायनिक मलबे को कारखाना परिसर में ही या तो जमीन के नीचे दबा दिया गया या फिर खुला छोड़ दिया गया. वर्ष 2004 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में जहरीली गैस कांड संघर्ष मोर्चा की ओर से दायर याचिका में गैस पीड़ित बस्तियों में पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे इस रासायनिक कचरे को नष्ट करने के आदेश देने की मांग की गई थी, जिस पर हाई कोर्ट ने केंद्र एवं राज्य सरकार को निर्देश दिए थे कि इस जहरीले कचरे को मध्य प्रदेश के धार जिले के पीथमपुर में इन्सीनेटर में नष्ट कर दिया जाए. लेकिन अनेक स्वयंसेवी संगठनों ने यह कहकर इसका विरोध किया था कि पीथमपुर में इसे जलाने से वहां के पर्यावरण के साथ ही वहां रह रहे लोगों को नुकसान होगा. तब हाई कोर्ट ने गुजरात के अंकलेर में यह जहरीला कचरा जलाने के निर्देश दिए. वहां की तत्कालीन सरकार ने जहरीला कचरा जलाने की अनुमति भी दे दी थी, लेकिन वहां के लोगों ने कचरा जलाने का विरोध किया. उसके बाद गुजरात सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके इस मामले पर पुनर्विचार का अनुरोध किया था, जिस पर शीर्ष अदालत ने जहरीले कचरे को नागपुर के निकट डीआडीओ के इंसीनेटर में नष्ट करने के निर्देश दिए. लेकिन वहां भी गैर सरकारी संगठनों के विरोध के चलते महाराष्ट्र सरकार ने नागपुर में जहरीला कचरा जलाने से असमर्थता जता दी. इस सिलसिले में महाराष्ट्र विधानसभा में तो बाकायदा एक प्रस्ताव भी पारित किया गया.
कारखाने के गोदाम में रखे या जमीन में दबे जहरीले कचरे में तमाम कीटनाशक रसायन और लेड, मर्करी और आर्सेनिक मौजूद है, जिनका असर अभी कम नहीं हुआ है. यह खुलासा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अपनी जांच रिपोर्ट में किया है. इस कचरे की वजह से भोपाल और उसके आसपास का पर्यावरण और विशेषकर भूजल दूषित हो रहा है अनेक अध्ययन बताते हैं कि कारबाइड कारखाने वाले इलाके में रहने वाली महिलाओं में आकस्मिक गर्भपात की दर तीन गुना बढ़ गई है. पैदा होने वाले बच्चों में आंख, फ़ेफड़े, त्वचा आदि से संबंधित मर्ज लगातार बना रहता है. उनका दिमागी विकास अपेक्षित गति से नहीं होता है. इस इलाके में कैंसर के रोगियों की संख्या में भी लगातार इजाफा हो रहा है, लेकिन कानूनी और पर्यावरणीय उलझनों के चलते इस कचरे का समय रहते समुचित निपटान नहीं हो सका.
गैस त्रासदी के बाद से ही मांग की जाती रही है कि औद्योगिक इकाइयों की जवाबदेही स्पष्ट की जाए. मगर सभी सरकारें इससे बचती रही हैं. शायद उनमें इसकी इच्छाशक्ति का ही अभाव रहा है. नतीजतन गैस त्रासदी के पीड़ित परिवारों को आज तक मुआवजे के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. जो लोग आज तक स्वास्थ्य संबंधी गंभीर परेशानियां झेल रहे हैं, उनकी तकलीफों की कहीं सुनवाई नहीं हो रही है. ऐसे में सरकार से क्या उम्मीद की जाए.


 
 

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