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01 Dec 2017 04:23:17 AM IST
Last Updated : 01 Dec 2017 04:28:46 AM IST

पाकिस्तान : कट्टरपंथी ताकतें हावी

रहीस सिंह
पाकिस्तान : कट्टरपंथी ताकतें हावी
पाकिस्तान : कट्टरपंथी ताकतें हावी

माईनेशन इट्स टाइम टु मेक अ चेंज’ यह संदेश पाकिस्तान के उस तंजीमी संगठन का है, जिसने इस्लामाबाद को 27 नवम्बर को सजदा और पायबोस करा दिया.

न केवल इस्लामाबाद की सरकार के कानून मंत्री को इस्तीफा देने पर विवश कर दिया बल्कि दुनिया को भी इस्लामाबाद की निर्वाचित सरकार की हैसियत बता दी. इस संगठन का नाम है तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (या रसूल अल्लाह). इसका मुखिया चंद दिनों में एक मस्जिद के खादिम की हैसियत से ऊपर उठकर पाकिस्तान के बरेलवी संप्रदाय का ऐसा नेता बन गया है,  जिसके पीछे कुछ राजनीतिक दल एवं सेना खड़ी है. क्या लब्बैक द्वारा इस्लामाबाद की घेराबंदी की सफलता को देखकर नहीं लगता कि पाकिस्तान की कट्टरपंथी जमातें रियल स्टेट एक्टर नहीं हैं, तो उसके बराबर की हैसियत वाली जरूर हैं?

आखिर, लगभग ढाई साल की उम्र और लगभग 3000 सदस्यों वाला एक कट्टरपंथी संगठन सेना और सरकार को पेट के बल लेटने को मजबूर करने में कैसे सफल हो गया? आखिर, क्यों जनरल बाजवा इसके खिलाफ कार्रवाई के बजाय सरकार को सुझाव देते हुए नजर क्यों आए कि ‘मार से नहीं, प्यार से बात की जाए’? बाजवा के इस प्यार को तो पाकिस्तान की न्यायपालिका भी हजम नहीं कर पाई. पूछने पर मजबूर हो गई कि आपका रद्द उल फसाद कहां है? क्या सेना को इस प्रदर्शन में कोई फसाद नजर नहीं आता? सवाल यह भी उठता है कि आखिर, पाकिस्तान में अदना सा मौलवी देखते ही देखते पूरे देश को एक कैदखाने में तब्दील करने की ताकत कहां ले आता है?

5 नवम्बर से धरना शुरू करने वाले तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान ने 27 नवम्बर को दिखा दिया कि पाकिस्तान में असली ताकत जम्हूरियत में नहीं जिहाद में निहित है. बात इतनी सी थी कि 2 अक्टूबर को पाकिस्तान की संसद ने चुनाव सुधार विधेयक, 2017 पारित किया था, जिसमें निर्वाचित प्रतिनिधियों के शपथ से ‘खात्मे नबूव्वत या पैगम्बर मोहम्मद’ वाले खंड को हटा दिया गया था. इसके दो दिन बाद तंजीमी जमातों ने सरकार को इस खंड को वापस जोड़ने के लिए मजबूर कर दिया. नेशनल असेंबली में इसे क्लैरिकल गलती बताकर सुधार भी लिया गया. लेकिन तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) ने कानून मंत्री जाहिद हमीद को चुनावी शपथ में बदलाव का दोषी माना.

इसे ईश¨नदा के समान मानते हुए सजा का हकदार करार दिया. हालांकि हमीद ने माफी मांग ली थी, लेकिन टीएलपी ने उनके इस्तीफे की मांग को लेकर 5 नवम्बर को एक अन्य धार्मिंक पार्टी सुन्नी तहरीक के साथ मिलकर फैजाबाद इंटरचेंज पर धरना शुरू कर दिया जो रावल¨पडी और इस्लामाबाद के बीच यातायात का मुख्य मार्ग है. सरकार की तरफ से प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई विफल रही तो उसने सेना से मदद मांगी. सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा ने प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी को मशविरा दिया कि प्रदर्शनकारियों के साथ शांतिपूर्ण तरीके से निपटा जाए. यह भी कहा कि वह ‘अपने ही लोगों पर ताकत का इस्तेमाल नहीं कर सकती.’ परिणामत: सरकार ने जिहादियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. लेकिन जीता कौन-सेना या जिहादी?

कट्टरपंथियों के आगे इस तरह से सरकार का समर्पण सीधे तौर पर साबित करता है कि यह सत्ताधारी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की हार है. लेकिन सच तो यह है कि यह पाकिस्तान के लोकतंत्र या पाकिस्तान में डेमोक्रेटिक  एस्टैब्लिशमेंट की हार है. जिस देश में कट्टरपंथी संगठन इतनी ताकत हासिल कर ले जाएं कि तय करने लगें कि क्या इस्लामी है, क्या नहीं, कौन काफिर है, कौन ईमान वाला, किसने ईश¨नदा की है, कौन गुनहगार है, कौन पश्चिमी देशों का एजेंट है, कौन पाकिस्तानपरस्त? तो मान लेना चाहिए कि उस हैसियत को प्राप्त कर चुके हैं कि वे ही राष्ट्र हैं. दरअसल, इस पूरे प्रकरण के पीछे सेना की अहम भूमिका थी.

गौर से देखें तो पाकिस्तान की सेना नवाज शरीफ से उसी समय से खफा थी, जब भारतीय सेना द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक की गई थी. सेना ने उसी समय से इस्लामाबाद को कमजोर करना शुरू कर दिया था. रावलपिंडी से सेना प्रवक्ता पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था और कूटनीतिक विषयों पर बयान देने लगे थे. लेकिन इसके बाद भी नवाज को हटाने के लिए पाकिस्तान में कोई आंदोलन नहीं चला. इसलिए कि उनके पास कम से कम पंजाब प्रांत के दक्षिणपंथी मजहबी मतदाताओं को आकषिर्त रखने का हुनर तो है ही. लेकिन सितम्बर में चुनाव में तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान या रसूल-उल-उल्लाह’ उसमें सेंध लगाता दिखा यानि लब्बैक वही कर रहा है, जो सेना चाह रही थी.

आकलन करने से पता चलता है कि इस्लामाबाद की सरकार मौलवी के लब्बैक के पीछे की ताकत को पहचान नहीं पाई लेकिन उसने टीवी चैनलों पर खबरों का ब्लैकआउट और सोशल मीडिया व न्यूज वेबसाइट्स को पूरी तरह जनता की पहुंच से दूर करने की कोशिश की. जिस देश की अर्थव्यवस्था लगभग फेल होने की कगार पर हो, आर्थिक दिक्कतें लोगों को परेशान कर रही हों, बेरोजगारी चरम पर हो, युवा दिशाहीन हो रहा हो और कानून-व्यवस्था चौपट है, वहां ऐसी जमातों के लिए बहुत स्पेस होता है. सरकार ने इसे भरने के बजाय ब्लैकआउट के जरिए अराजक ताकतों के लिए मैदान बनने का अवसर दे दिया.

फिलहाल, पाकिस्तान की सेना और सियासत के बीच जिहादी ताकतें आज निर्णायक स्थिति में हैं. सच तो यह है कि चाहे 2013 में मौलाना ताहिरुल कादिरी का प्रदर्शन रहा हो या  2017 में मौलाना खादिम हुसैन रिजवी का, सभी सेना के लिए खेल का मैदान समतल करने में जुटे हैं. दरअसल, ये सभी उस चौसर पर ढाई चाल चलने वाले घोड़े हैं, या प्यादे हैं जिन्हें सेना और आईएसआई चला रहे हैं. कभी-कभी पाकिस्तान की न्यायपालिका भी लोकतांत्रिक एस्टैब्लिशमेंट के बजाय इनके तरफ झुकाव प्रदर्शित कर जाती है, यह सबसे अधिक खतरनाक पक्ष है. फिलहाल, अब पाकिस्तान में एक तरफ लोकतंत्र अपनी लाचारी के उपचार ढूंढेगा और दूसरी तरफ सेना अपनी सफलता के सूत्र. यह तंजीमी जमातों के लिए एक अवसर सिद्ध होगा. संभव है कि ये स्थितियां भारतीय हितों के हितों के लिए भी चुनौती बनें.


 
 

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