मुद्दा : दम तोड़ती रोजगार की उम्मीदें

Last Updated 23 Nov 2017 03:58:50 AM IST

कुछ समय पहले दिल्ली सरकार ने एक रोजगार मेले का आयोजन किया तो उसमें प्राय: यह देखा गया कि उच्च शिक्षा प्राप्त अनेक युवा ऐसे रोजगार प्राप्त करने के लिए बहुत प्रयत्नील थे, जिनमें उनकी शैक्षिक योग्यता का बहुत कम उपयोग होना था.


मुद्दा : दम तोड़ती रोजगार की उम्मीदें

सामान्यत: उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति ऐसे रोजगार के लिए आवेदन भी नहीं करते हैं, पर रोजगार मेले में तो इसके लिए ही बहुत बेसब्री से प्रयास हो रहे थे.

इसके पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने चपरासी के 368 पद भरने के लिए विज्ञापन निकाल तो इसके लिए 23 लाख से ज्यादा आवेदन पत्र प्राप्त हुए. इनसे 225 पीएचडी प्राप्त आवेदनकर्ता थे व हजारों स्नातकोत्तर थे. लगभग 2 लाख आवेदनकर्ता किसी तरह की इंजीनियरिंग शिक्षा प्राप्त कर चुके थे.

इस वर्ष जनवरी में पश्चिम बंगाल सरकार ने डी श्रेणी के ऐसे 6000 रिक्त पद भरने के लिए आवेदन आमंत्रित किए, जिनमें सातवी कक्षा पास करना पर्याप्त माना गया था. इसके लिए 25 लाख आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें बहुत से स्नातकोत्तर व स्नातक और कुछ पीएचडी आवेदनकर्ता भी थे. कुछ हद तक यह भी पता चलता है कि शिक्षा संस्थानों में स्तरीय शिक्षा नहीं दी जा रही है.

जब उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद छोटी नौकरी के लिए मारामारी करनी पड़ेगी कि तो जरूरी बात यह है कि इस नौकरी को करना चाहे एक मजबूरी हो, पर इसके लिए युवा हृदय में उत्साह नहीं होगा. इस तरह एक ओर तो हमारी अर्थव्यवस्था में आर्थिक संवृद्धि इस तरह की है कि उसमें बहुत कम रोजगार का सृजन होता है और दूसरी ओर जिस रोजगार का सृजन हो भी रहा है उसमें से बहुत सा इस तरह का है, जिससे रोजगार की मजबूरी में अपनाने वाले व्यक्ति अलगाव महसूस करते हैं, उस कार्य के प्रति वे निष्ठा या उमंग वे महसूस नहीं करते हैं.

मौजूदा आर्थिक बदलाव के दौर में बहुत सा रोजगार इस तरह का, अस्थाई व कम आय का उपलब्ध हो रहा है, जिसमें मजदूरों को लगभग निश्चित तौर पर अपने परिवारों से दूर रहना है या प्रवासी मजदूर के तौर पर कार्य करना है. अनेक रोजगारों में आय इतनी कम है कि परिवार की बुनियादी जरूरतों को पूरा नहीं किया जा सकता है. अनेक रोजगारों में कार्य का समय बहुत अधिक है व रोजगार-स्थल पर प्रतिदिन आने-जाने में भी बहुत समय लगता है.

इसके अतिरिक्त अन्य समय भी श्रमिक या कर्मचारी से मोबाइल फोन पर पूछताछ होती रहती है. इस कारण कम आय मिलने के साथ कर्मचारी को लगता है कि वह हर समय बंधा हुआ है. इस तरह के रोजगारों का सृजन बहुत कम हो रहा है, जिसमें कार्य करने वालों को यह अहसास हो कि वे समाज की भलाई के किसी व्यापक प्रयास से जुड़े हैं. ऐसा भी बहुत कम होता है कि रोजगार व्यक्ति की रचनात्मक प्रतिभाओं के अनुकूल हो व उन्हें आगे बढ़ाए. तिस पर यदि आय भी कम मिले व व्यवहार भी ठीक न हो तो कार्य के प्रति अलगाव उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है.

हालांकि जीवन का आधा हिस्सा कार्यस्थल पर, वहां आने-जाने पर या वहां से जुड़े कार्यों व तैयारी में व्यतीत होता है, फिर भी रोजगार के प्रति अलगाव व असंतुष्टि की यह सोच बनी रहने के कारण जीवन कष्टदायक हो जाता है. बहुत से रोजगार खुलेआम शोषण पर आधारित हैं, जिनमें अधिक ध्यान श्रम-शक्ति के अधिक से अधिक दोहन पर रहता है. अत: वेतन व मजदूरी कम देने के साथ कार्यस्थल को सुरक्षित, आरामदायक व स्वास्थ्य के अनुकूल बनाने पर भी समुचित ध्यान नहीं दिया जाता है. इस कारण कई बार कार्यस्थल पर मजदूर घायल व रोगी होते हैं अथवा कार्यस्थल में मानसिक तनावों की निरंतरता के कारण कई स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न होती हैं. आज कार्यस्थल से जुड़ी दुर्घटनाएं व स्वास्थ्य समस्याएं एक गंभीर चिता का विषय बन चुकी हैं. आंकड़े बताते हैं कि विश्व स्तर पर प्रतिदिन 500 लोग काम पर जाते हैं पर दुर्घटनाओं में मृत्यु के कारण लौटते नहीं हैं, वहां धीरे-धीरे उत्पन्न होने वाली अनेक कार्यस्थल स्वास्थ्य समस्याओं की स्थिति भी गंभीर है.

कार्यस्थल के हालात से जुड़े रोग जैसे सिलिकोसिस, आक्यूपेशनल कैंसर डरा देने वाली हद तक कुछ उद्योगों में बढ़ चुके हैं, जबकि रोजगारों से जुड़ी अवसाद की समस्या व कार्यस्थल पर हिंसा की समस्या भी कई स्थानों पर विकट हो रही है. आज आर्थिक संवृद्धि के साथ रोजगार सृजन न होने को एक बड़ी समस्या के रूप में स्वीकार किया जा रहा है. इसके साथ यह भी चाहिए कि रोजगारों का सृजन विभिन्न नागरिकों की रचनात्मक क्षमताओं के अनुकूल हो तथा एक बेहतर दुनिया के निर्माण से जुड़ा हो.

भरत डोगरा


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