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23 Nov 2017 04:04:34 AM IST
Last Updated : 23 Nov 2017 04:12:08 AM IST

किसानों का सम्मान बचे

किसानों का सम्मान बचे

दिल्ली के रामलीला मैदान पर जुटे देश के 19 राज्यों के लाखों किसानों की संसद को देखकर भारतीय किसान यूनियन के चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की अस्सी के दशक की रैलियों की याद ताजा हो गई.

तब केंद्र में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की मजबूत सरकार थी और आज नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा नीत एनडीए की. उस सरकार के पास प्रचंड बहुमत था, लेकिन सत्ता के शुरुआती घमंड बाद के उनकी चांदनी उतरने लगी थी.

इस सरकार के पास उतना बहुमत भले न हो, लेकिन इसका घमंड और अकड़ उससे कई गुना ज्यादा है. सरकार के पास उससे भी बड़ी क्षमता है मुद्दों को भटकाने, उनकी उपेक्षा करने और नये मुद्दे खड़े करने की. इसलिए जहां 1989 में टिकैत को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार का जबरदस्त कवरेज मिला था वहीं तकरीबन तीस साल बाद बड़े पैमाने पर जुटे किसानों की उपेक्षा की चैनलों में होड़ मची है. अगर चंद जनोन्मुखी चैनल और प्रतिबद्ध पत्रकार न हों तो मीडिया की छद्म और भड़काऊ पत्रकारिता का चेहरा एकदम से बेनकाब हो चुका है.

इसके बावजूद दुनिया की प्रसिद्ध रेटिंग एजेंसी ‘मूडीज’ की खुशनुमा रिपोर्ट और ‘पद्मावती’ फिल्म जैसा स्वाभिमान जगाने वाला विमर्श जब देश में धूम मचाए हो तब देश के किसानों ने दिल्ली में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर यह बता दिया है कि असली मुद्दा क्या है? देश छद्म मसलों में भटक जरूर रहा है लेकिन अखिल भारतीय किसान संघर्ष समिति के आयोजन में आए लाखों किसानों ने अपनी दस हजार किलोमीटर की यात्रा से उस चेतना को जगाने का काम किया है, जो इस समय के लिए प्रासंगिक है.

इस सम्मेलन में उठने वाले मुद्दों और इसमें शामिल संगठनों की तरह-तरह से व्याख्या हो रही है लेकिन एक बात जाहिर है कि यह वामपंथी, समाजवादी और गांधीवादी संगठनों के नेतृत्व में आयोजित कार्यक्रम है और इसीलिए यह मौजूदा सरकार को एक राजनीतिक चुनौती भी है. सम्मेलन में उचित ही कहा गया है कि यह लाल और हरे झंडे का समागम है, जो ऐतिहासिक होने जा रहा है. यहां यह तथ्य रोचक है कि मुलताई किसान आंदोलन के नायक और कभी समाजवादी पार्टी के विधायक रहे डॉ. सुनीलम ने पार्टी इसीलिए छोड़ी थी क्योंकि उनके नेताओं को उनके हमेशा हरा गमछा रखे रहने पर आपत्ति थी. पार्टी उनसे लाल टोपी पहनने के लिए कहती थी लेकिन वे मुलताई में शहीद हुए किसानों की याद में अपना हरा रंग छोड़ने को तैयार नहीं थे. असली सवाल यहीं पैदा होता है कि क्या कम्युनिस्ट और गैर कम्युनिस्ट पार्टयिों के किसान संगठन अपने मुद्दों को लेकर एकजुट होने को तैयार हैं? क्या सचमुच हरा और लाल झंडा एक होना चाहता है या फिर यह दिल्ली घूमने-फिरने का यह एक और आयोजन है? गौरतलब है कि यहां हरे रंग का मतलब पर्यावरण आंदोलन से भी है, जिसका सशक्त प्रतिनिधित्व मेधा पाटकर कर रही हैं. अगर लाल रंग का प्रतिनिधित्व कर रहे अतुल अनजान और हन्ना मौला की चिंताएं किसानों की उपज का दोगुना दाम दिलाने और कर्ज माफी कराने की हैं तो मेधा पाटकर की चिंताएं बड़े बाधों और परियोजनाओं से होने वाले विस्थापन को रोकना और वैकल्पिक विकास नीति बनवाना है.

संसद के शीतकालीन अधिवेशन का इंतजार कर रहे देश को इस जमावड़े का यह बड़ा संदेश है. यह लोग प्रधानमंत्री मोदी को याद दिलाने आए हैं कि उन्होंने किसानों की आमदनी दोगुनी करने का वादा किया था मगर नोटबंदी के दौरान जो आमदनी थी वह भी छीन ली गई. मोदी अंधेरे में जो मशाल लेकर चले उससे बची-खुची रोशनी भी जाती रही. किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ा है और जो सरकारी कर्ज तीन साल पहले 8.11 लाख करोड़ था वह अब 10.65 लाख करोड़ हो चुका है. ऐसा नहीं है कि किसान सिर्फ कर्ज ले रहा है. वह उत्पादन भी बढ़ा रहा है और इसका प्रमाण है पिछले साल के मुकाबले उत्पादन में आई डेढ़ गुना बढ़ोतरी. उत्पादन आज 534 करोड़ टन तक पहुंच चुका है. लेकिन कर्ज में डूबा किसान अपनी जान दे रहा है तो उसकी वजह है बाजार, सरकार और कंपनियों की ठगी की सांठगांठ. उत्पादन बढ़ाने के मार्ग में कई बाधाएं हैं. उदाहरण के लिए महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में कीटनाशक के बुरे प्रभाव से 32 किसान मर चुके हैं. उनकी दारुण कथा महिला संसद के माध्यम से दिल्ली और देश के उन लोगों ने सुनीं, जिन्हें छद्म मुद्दों से आगे भी कुछ देखने की इच्छा है. लेकिन कीटनाशक के प्रभाव में जान देने वाले किसानों का उत्पादन बढ़ जाए तो भी उन्हें मुक्ति नहीं है.

उत्तर भारत में व्यापारी और सरकारी दोनों किसानों का धान तो खरीद लेते हैं लेकिन भुगतान देने को तैयार नहीं है. इधर महाराष्ट्र में तूअर, सोयाबीन और कपास तीनों फसल के दाम लगातार घट रहे हैं. सरकार के आश्वासनों और बाजार की हकीकत के चक्रव्यूह में फंसे किसानों की दुविधा यह है कि वे आखिर करें तो क्या करें? उनके पास न तो कोई संगठन है और न ही कोई राजनीतिक दल जो सरकार पर उनकी मांगों का दबाव बना सके. वे कभी कभी कुछ संगठनों के माध्यम से एकजुट होते हैं और थोड़ा समय बीतते ही जाति और धर्म की आंधी में बह जाते हैं. इस देश में वर्गीय आधार पर संगठित होना कितना कठिन है यह बात किसान आंदोलन से लगातार प्रमाणित होती रही है. वे व्यवस्था को नींद से जगाते जरूर हैं लेकिन उसे पलटने का काम नहीं कर पाते.

आज जब मूडीज की रेटिंग से उत्साहित लोग फिर यह बात जोर देकर कहने लगे हैं कि विकास के सामने असली रुकावट जमीनों के अधिग्रहण की है, उसके आसान हुए बिना देश का विकास नहीं हो सकता, तब किसानों को सोचना होगा कि यह गाज फिर उन्हीं पर गिरने वाली है. बड़े संघर्ष और दबावों के बाद यूपीए सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून पास किया था, लेकिन उसे खत्म करने की साजिश और तैयारी प्रबल है. ऐसे में मेधा पाटकर की इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि देश में दस करोड़ किसान विस्थापित हैं और नर्मदा घाटी के विस्थापितों का पुनर्वास आज तक नहीं हुआ. इसलिए आज सवाल यही है कि समाज चौदहवीं सदी की मिथकीय महारानी पद्मावती का स्वाभिमान बचाए या देश के करोड़ों किसानों का?


अरुण कुमार त्रिपाठी
 

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