एक बड़ी बाधा है भ्रष्टाचार

Last Updated 04 Mar 2012 12:32:49 AM IST

भारत में भ्रष्टाचार का सबसे घृणित पहलू यह नहीं है कि यहां भ्रष्टाचार है, बल्कि यह है कि यह भारतीय जीवन में एक अपरिहार्य लक्षण के रूप में दूर-दूर तक स्वीकृत है.


अनादि काल से भ्रष्टाचार सभी समाजों में किसी न किसी रूप में विद्यमान रहा है. दो हजार साल पहले कौटिल्य ने पहले-पहल अपने अर्थशास्त्र में कुछ हद तक इस पर चर्चा की.

फिर भी भ्रष्टाचार व्यापक रूप से नैतिक और सदाचार की दृष्टि से निंदनीय था, हालांकि इसकी मौजूदगी अभिज्ञात थी. हाल के वर्षो में भ्रष्टाचार का यह नजरिया धीमें, अति सूक्ष्म मगर निश्चित परिवर्तन से गुजरा प्रतीत होता है. भारत के प्रजातंत्र और इसके शासन के ढांचे के एक अनिवार्य घटक के रूप में अब भ्रष्टाचार को बर्दाश्त करने का माद्दा ज्यादा है.

राजनीतिक स्तर पर माना जाता है कि पार्टियों और राजनीतिज्ञों में भ्रष्टाचार अपरिहार्य हो गया है क्योंकि चुनाव खर्चीले हो गए हैं और इन्हें लड़ने के लिए पैसा जुटाना पड़ता है. समान रूप से अत्याधिक व्याप्त नौकरशाही भ्रष्टाचार के बचाव में यह तर्क दिया जाता है कि भारत में लोक सेवकों को पर्याप्त वेतन नहीं मिलता या यह कि ऐसा भ्रष्टाचार ‘सर्वव्यापी घटना’ है.

भ्रष्ट नौकरशाही के लिए आजकल दी जाने वाली भारत की बचाव दलीलें उसी तरह हैं जैसी 1980 में युगांडा में दी जाती थीं; जब युगांडा को खुले तौर पर संसार में सबसे भ्रष्ट देश माना जाता था. तक ये दिए जाते थे कि लोक सेवक अपनी नौकरी में बने रहने के लिए या तो अपनी नैतिकता, कार्य और कर्तव्यनिष्ठा के मापदंड छोड़ दें या फिर ईमानदार बने रहकर नौकरी गंवाए. उसने नौकरी में बने रहने को चुना.

भारत में छोटे और बड़े निगमों ने भी बचे रहने और तरक्की के लिए भ्रष्टाचार में सक्रिय रूप से शामिल होने को इन आधारों पर चुना कि अपने काम को पूरा करने के लिए यही एकमात्र रास्ता है. रोचक रूप से, भारत में कारोबार में भ्रष्टाचार संभवत: जितना आंतरिक (यानी एक निजी खरीदार, निजी विक्रेता और वित्तदाता के बीच) है, उतना ही बाहरी (यानी निजी फर्म और सरकार के बीच) भी है. आम आदमी या औरत को भी भ्रष्टाचार में शामिल होना पड़ता है क्योंकि अगर उसको राशन कार्ड, लाइसेंस, अनुज्ञप्ति या कोई पंजीकरण लेना है तो यहां इसके सिवाय और कोई विकल्प नहीं है.

एक  आवश्यक बुराई के रूप में इसकी व्यापक स्वीकृति के अलावा गंभीर चिंता का अन्य क्षेत्र है, सरकारी पदानुक्रम के विभिन्न स्तरों- निर्वाचित राजनीतिज्ञ, उच्च अधिकारी वर्ग और निचले अधिकारी वर्ग में भ्रष्टाचार का परस्पर गुंफन या उध्र्वाधर एकीकरण. यह सामान्य धारणा अब मान्य नहीं है कि उच्च स्तरों पर बैठे हुए प्रत्येक मुखिया यह सुनिश्चित करने को प्रतिबद्ध हैं कि उनके अधीनस्थ सत्यनिष्ठा से आचरण करेंगे. ऐसी स्थिति में जब मुखिया और एजेंट भ्रष्टाचार के लिए आपस में सांठ-गांठ कर लेते हैं तो इससे जूझने की समस्या और अधिक असाध्य हो गई है. कार्यपालक शाखा के विभिन्न स्तरों पर उध्र्वाधर भ्रष्टाचार के साथ भ्रष्टाचार का समस्तरीय फैलाव विधायिका, न्यायपालिका के अंगों, मीडिया के साथ स्वतंत्र पेशों सहित अन्य सार्वजनिक संस्थानों तक है.

इसने भ्रष्टाचार की रोकथाम और नियंत्रण को कहीं ज्यादा मुश्किल बना दिया है. भ्रष्टाचार का राजनीतिकरण एक अन्य अशुभ घटना रही, मानो ये सब अभी कम था. समस्या से जूझने की गंभीर मंशा के बिना ही बराबर भ्रष्टाचार के मामलों को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है. इसने भ्रष्टाचार के आरोपी व्यक्तियों का राजनीति में प्रवेश सुगम बना दिया है. जनता अब नहीं जानती किसका विश्वास करे- अभियोक्ता का या अभियुक्त का.

उन्नति, विकास और गरीबी उन्मूलन में भ्रष्टाचार एक बड़ी बाधा है. शोध बताते हैं कि भ्रष्टाचार उत्पादकता को कम करता है, निवेश को निम्न करता है, राजस्व संबंधी क्षय का कारण बनता है और कार्यकुशलता को दुर्बल बनाता है. भ्रष्टाचार के ये विपरीत प्रभाव, भारत के राजनीतिक और वैधानिक संस्थानों या इसकी जनता द्वारा सामान्यत: पहचाने नहीं गए हैं. राज्य की भूमिका को पुन: परिभाषित करके और इसके शासन ढांचे में सुधार के माध्यम से भ्रष्टाचार की आपूर्ति और मांग दोनों को कम करने की आवश्यकता है.

(संपादित लेखांश ‘भारत का भविष्य’ से साभार)

बिमल जालान
लेखक


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