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05 May 2012 05:23:46 PM IST
Last Updated : 05 May 2012 06:53:43 PM IST

हिन्दी सिनेमा के 100 साल: ‘रामराज्य’ से 'जन्नत 2' तक

1913 से 2013 - धार्मिक से अपराध और सेक्स तक का सफर

भारतीय सिनेमा ने सौ साल का सफर तय कर लिया है. विकास और बदलवा की गति ने तकनीक और मापडंड दोनों ही बदल दिये.

भारतीय सिनेमा अपने 100वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है. बॉलीवुड में हिन्दी फिल्मों को तब ‘रामराज्य’ जैसी धार्मिक फिल्म देने वाले नानाभाई भट्ट के खानदानी महेश भट्ट की अपराध और सेक्स से भरपूर फिल्म ‘जन्नत 2’पर्दे पर आ चुकी है.

हिन्दी सिनेमा के 100 साल के सफर सुहाना और यादगार रहा है. तीन मई, 1913 को तत्कालीन बंबई के कोरोनेशन थियेटर में भारत की पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’रिलीज हुई थी. यह कभी झूठ ना बोलने वाले अयोध्या के राजा की कहानी थी, जिनकी सत्यवादिता की परख के लिए देवता उनका सबकुछ छीन लेते हैं लेकिन, वह अपनी सत्यवादिता से पीछे नहीं हटते.


4 मई, 2013 को, जब भारतीय सिनेमा अपने सौ साल के पहले दिन रूपी पायदान पर पांव रख रहा है तो बॉलीवुड में, हिन्दी फिल्मों को ‘रामराज्य’ जैसी धार्मिक फिल्म देने वाले नानाभाई भट्ट के खानदानी महेश भट्ट की फिल्म ‘जन्नत 2’रिलीज हूई. जो अपराध और सेक्स से भरपूर है.

दादा साहब फाल्के की फिल्म की नायिका तारामती श्मशान का कर चुकाने के लिए अपनी धोती फाड़ने को तैयार हो जाती हैं. लेकिन, देवता तारामती को अधनंगा होता नहीं देख सकते. पर सौ साल बाद बॉलीवुड के मापदड़ बदल गये. एक फिल्म निर्माता विक्रम भट्ट ठीक एक हफ्ते पहले देह व्यापार को प्रोत्साहित करने वाली फिल्म ‘हेट स्टोरी’ के साथ दर्शकों के सामने होते हैं. उनकी फिल्म की नायिका काव्या को अधनंगा क्या, पूरा नंगा होने तक में कोई हिचक नहीं.

दादा साहब फाल्के और उनके समकालीन फिल्म निर्माताओं ने पौराणिक कथानक पर फिल्में इसलिए बनायी थीं कि धार्मिक विषय, कहानियां और चरित्र उनके जाने-पहचाने होते हैं. दर्शकों से इनका परिचय कराने के लिए किसी संवाद या कॉमेंट्री की जरूरत नहीं होती.

फिल्मों को आवाज मिली

1931 में ‘आलम आरा’ के जरिये किरदारों को आवाज मिली, इंडियन सिनेमा भिन्न भाषाओं में बंटा ही, प्रदेश और क्षेत्र में भी बदल गया और कथानक भी बदलते चले गये. सामाजिक, स्टंट और हास्य फिल्मों के निर्माण का दौर शुरू हो गया लेकिन यह सोचते हुए अजीब लगता है कि अब, जबकि भारतीय सिनेमा दुनिया का सबसे अधिक फिल्म बनाने वाला देश बन गया है, बॉलीवुड, बांग्ला सिनेमा और तमिल-तेलुगू सिनेमा के जरिये इसकी अपनी पहचान बन गयी है.

बॉलीवुड नायिका की सेक्स अपील और स्टंट मास्टर के घूंसों में अपनी पहचान खोता जा रहा है. आमतौर पर भारतीय सिनेमा के नाम पर बॉलीवुड को भारतीय सिनेमा का पर्याय मान लिया जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि भारत में मुंबई (महाराष्ट्र) के अलावा आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, गुजरात, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, उड़ीसा, पंजाब और पश्चिम बंगाल में भी फिल्म संस्कृति है.

क्षेत्रीय भाषाओं में बन फिल्में


इन राज्यों में अपनी भाषा की फिल्में बनायी जाती हैं. मुंबई में दादा साहब फाल्के द्वारा ‘राजा हरिश्चन्द्र’ बनाये जाने के बाद 1917 में तमिल में, 1921 में तेलुगू में तथा 1919 में बांग्ला में फिल्में बनायी जाने लगीं.अन्य मुख्य भाषाओं में भी इसके आसपास ही फिल्मों का निर्माण शुरू हो गया था.

वास्तविकता तो यह है कि भारतीय सिनेमा के इतिहास के कुछ पृष्ठ तो क्षेत्रीय सिनेमा ने ही लिखे गये.मसलन, भारत की पहली त्रिआयामी फिल्म मलयाली भाषा में 1984 में ‘माई डियर कुट्टीछातन’ बनायी गयी.

तेलुगू फिल्म उद्योग भारत का दूसरा सबसे बड़ा फिल्म उद्योग है. तेलुगू इंडस्ट्री ने ही मोशन पिक्चर एसोसिएशन ऑफ अमेरिका से वीडियो पाइरेसी के विरुद्ध एमओयू साइन कर रखा है. इस उद्योग का नाम फिल्म निर्माण की सबसे अधिक सुविधा उपलब्ध कराने वाली इंडस्ट्री के रूप में गिनीज बुक ऑफ र्वल्ड रिकार्डस में दर्ज है.

बॉलीवुड ने बाद में इसे समानान्तर सिनेमा या कला सिनेमा जैसे नामों से अपनाया. बंगाल के सत्यजित रे को अपनी फिल्मों के जरिये दुनिया में इंडियन सिनेमा का परचम फहराने का श्रेय जाता है. वही इकलौते ऐसे भारतीय फिल्मकार हैं, जिन्हें मानद ऑस्कर पुरस्कार मिला.

भारत की पहली मूक फिल्म बनाने वाले दादा साहब फाल्के मराठी भाषी थे तथा मराठी और संस्कृत नाटककिया करते थे.1931 में सवाक फिल्म ‘आलम आरा’ बनने के ठीक बाद 1932 में पहली मराठी फिल्म ‘अयोध्याचे राजा’ का निर्माण हुआ था.

भारतीय सीरियल और सेंसरशिप

1918 पहला भारतीय सीरियल और सेंसरशिप श्रीराम पाटनकर ने पहले भारतीय सीरियल ‘राम वनवास’ (एक्जाइल ऑफ श्रीराम) का निर्माण किया.यह सीरियल चार अलग-अलग भागों में बनाया गया था.1918 में भारत में ब्रितानी एक्ट की तर्ज पर सेंसरशिप लागू की गयी. इसके द्वारा फिल्मों की सेंसरशिप और लाइसेंसिंग की व्यवस्था की गयी.

1921 सामाजिक हास्य फिल्म समाज में पाश्चात्य रहन-सहन और पाश्चात्य मूल्यों का पोषण करने वाले लोगों पर व्यंग्य करने वाली फिल्म ‘द इंग्लैंड रिटर्न’ का निर्माण धीरेन गांगुली ने किया.

1925 समाज सुधार वाली फिल्म मराठी फिल्मकार बाबूराव पेंटर की फिल्म ‘सवकारी पाश’ में एक लालची जमींदार एक किसान को उसकी जमीन से बेदखल कर देता है.

1929 देशी फिल्म कंपनियों और टॉकी फिल्म का आगमन वी. शांताराम ने 1929 में कोल्हापुर में प्रभात कंपनी और चन्दूलाल शाह ने बम्बई में द रंजीत फिल्म कंपनी की स्थापना की. प्रभात फिल्म कंपनी ने अपने 27 बरसों के सफर में 45 फिल्मों का निर्माण किया. इसी साल हॉलीवुड से आयातित बोलती फिल्म ‘मेलोडी ऑफ लव’ का प्रदर्शन हुआ.

चुंबन दृश्य वाली फिल्म

1933 अंग्रेजी में बनी चुंबन दृश्य वाली फिल्म हिमांशु राय की इंग्लैंड में पिक्चराइज ‘कर्मा’ में हिमांशु राय और देविका रानी मुख्य भूमिका में थीं. राजकुमार और राजकुमारी की इस प्रेमगाथा में जबर्दस्त चुंबन और आलिंगन के दृश्य थे. हिमांशु राय और देविका रानी के बीच चला चार मिनट लंबा चुम्बन आज भी कीर्तिमान है.

यह चुंबन विनोद खन्ना और माधुरी दीक्षित पर फिल्म ‘दयावान’ में पिक्चराइज चुंबन से चार गुना ज्यादा लंबा है. चूंकि, तत्कालीन ब्रिटिश शासन में चुंबन, सेक्स, हिंसा आदि टैबू नहीं थे, इसलिए इसे सेंसर की रोक का सामना तो नहीं करना पड़ा. इसके बावजूद ‘कर्मा’ डिजास्टर फिल्मों में शुमार की जाती है.

पाश्रव गायन की शुरुआत


1935 पाश्र्व गायन की शुरुआत प्रारंभ में परदे पर नायक-नायिका अपने गीत खुद ही गाते थे.1935 में नितिन बोस ने अपनी फिल्म ‘धूप छांव’ में पाश्र्व गायन की तकनीक इंट्रोड्यूज की. इस तकनीक ने परदे पर कभी नजर ना आने वाले पाश्र्व गायकों-गायिकाओं को भी स्टार बना दिया. ध्वनि तकनीक के विस्तार के साथ ही इन्द्रसभा और देवी देवयानी जैसे गीत संगीत से भरपूर फिल्मों का निर्माण हुआ.

रंगीन हुई फिल्में

1937 रंगीन हुई फिल्में और मिले अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार फिल्मों के गूंगे चरित्रों को आवाज दिलाने वाले आर्देशिर ईरानी ने ही ‘किसान कन्या’ के तमाम किरदारों में रंग भरे.‘किसान कन्या’ भारत में ही प्रोसेस की गयी पहली फिल्म थी. वास्तविकता तो यह थी कि उस दौर में रंगीन चित्रों को दर्शकों ने मान्यता नहीं दी. सोहराब मोदी की 1953 में रिलीज फिल्म ‘झांसी की रानी’ टेक्नीकलर में बनायी गयी पहली फिल्म थी. विष्णु गोविन्द दामले और शेख फत्तेलाल की फिल्म ‘संत तुकाराम’ ने वेनिस फिल्म महोत्सव में इंटरनेशनल एग्जिबिशन ऑफ सिनेमैटोग्राफिक आर्ट की श्रेणी में चुनी गयी तीन फिल्मों में स्थान पाया.

‘आलम आरा’ 1931

पहली सवाक फिल्म हिंदी-उर्दू मिश्रित संवादों वाली ‘आलम आरा’ 1931 बनायी गयी. यह दिलचस्प तथ्य है कि हिंदी फिल्म उद्योग को ‘बॉलीवुड’ तो कहा जाता है, लेकिन इसका वैसा कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है, जैसे कि अमेरिकी फिल्मों का निर्माण करने वाले ‘हॉलीवुड’ के लिए कहा जाता है कि यह लॉस एंजिल्स में स्थापित है.

बॉलीवुड का कोई ऐसा घरौंदा नहीं, क्योंकि हिन्दी फिल्में संख्या के लिहाज से मुंबई में ज्यादा संख्या में बनायी जाती हैं, इसलिए इसे बॉलीवुड नाम दिया गया.मगर, हिंदी फिल्में कोलकाता, चेन्नई आदि में भी बनायी जाती हैं.वास्तविकता तो यह है कि हिंदी सिनेमा आज जो भी है, उसके लिए बंगाली, पंजाबी, तमिल आदि भाषा-भाषी फिल्मकारों और कलाकारों का सराहनीय योगदान है.

इन्हीं लोगों की बदौलत हिंदी फिल्म उद्योग फिल्म निर्माण में हॉलीवुड को पछाड़ कर ‘बॉलीवुड’ बन सका.भारत की पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ 1931 में बनी.इस फिल्म का निर्माण खान बहादुर आर्देशिर ईरानी उर्फ आर्देशर ईरानी ने किया था.वह मशहूर फिल्म लेखक, निर्देशक, निर्माता, अभिनेता, फिल्म वितरक, फिल्म शोमैन और सिनेमेटोग्राफर भी थे.ईरानी ने हिंदी के अलावा तेलुगू, इंग्लिश, जर्मन, इंडोनेशियन, पर्शियन, उर्दू और तमिल भाषा में भी फिल्में बनायीं.‘आलम आरा’ को जबर्दस्त सफलता मिली.

‘किसान कन्या’ 1937


‘आलम आरा’ के छह साल बाद आर्देशर ईरानी ने ही पहली रंगीन फिल्म ‘किसान कन्या’ 1937 में रिलीज करवायी.उन्होंने अन्य रंगीन फिल्म ‘मदर इंडिया’ बनायी.लेकिन, उस समय रंगीन फिल्में दर्शकों में लोकप्रियता नहीं प्राप्त कर सकीं.इस बीच, फिल्मों में महिला अभिनेत्रियों का प्रवेश हुआ.फाल्के की फिल्म ‘भस्मासुर मोहिनी’ में महिला चरित्र अभिनेत्रियों द्वारा किये गये.

फाल्के की छह साल की बेटी मंदाकिनी ने ‘कालिया मर्दन’ फिल्म में बालक कृष्ण की भूमिका की.1925 में चंदूलाल शाह ने भारतीय फिल्मों को सामाजिक फिल्में बनाने का रास्ता दिखाया.1941 में प्रदर्शित मिनर्वा मूवीटोन की फिल्म ‘सकिंदर’ को केवल इसलिए छावनी क्षेत्रों में प्रदर्शित होने से रोका गया कि इसमें सकिंदर का आक्रमण और फिर वापस चले जाने को दिखाया गया था.इसी दौर में फिल्मों में गांधी और नेहरू से मिलते-जुलते नाम और चरित्रों को दिखाये जाने पर रोक लगा दी गयी.

‘ब्लैक मनी’

1943 में प्रदर्शित फिल्म ‘ब्लैक मनी’ ने स्टारडम की स्थापना की.स्टूडियोज का वर्चस्व खत्म होने लगा.मोहन भवनानी की फिल्म ‘रंगीन जमीन’ 16 एमएम में फिल्मायी गयी पहली फिल्म थी, जो 1949 में रिलीज हुई. इसी साल सेंसर बोर्ड ने ‘ए’ और ‘यू’ प्रमाण पत्र देने शुरू किये.भारत का पहला अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह 1952 में देश के चार बड़े शहरों- दिल्ली, बंबई, मद्रास और कलकत्ता में आयोजित हुआ.विधुविनोद चोपड़ा की फिल्म ‘1942-ए लव स्टोरी’ डॉल्बी साउंड सिस्टम में बनायी गयी पहली फिल्म थी.

‘मैंने प्यार किया’

राजश्री प्रॉडक्शन की फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ 4-ट्रैक स्टीरियोफोनिक साउंड में रिलीज की गयी.चालीस से साठ के बीच के पीरियड को ‘गोल्डन ऐज’ कहा जाता है क्योंकि इस पीरियड में गुरुदत्त ने ‘प्यासा’ और ‘कागज के फूल’ और राजकपूर ने ‘आवारा’ और ‘श्री 420’ जैसी फिल्में बनायी जो शहरी भारत का चितण्रकरती थीं.‘आवारा’ में भारत का पहला स्वप्न दृश्य था.इसी पीरियड में महबूब खान की ‘मदर इंडिया’ जैसी फिल्म भी बनी, जो ऑस्कर पुरस्कारों में विदेशी भाषा की श्रेणी में नामित हुई.‘मुगले आजम’ मुगलिया इतिहास को बुलंदियों पर पहुंचाने वाली फिल्म थी.बिमल राय की ‘मधुमती’ ने हिंदी फिल्मों को पश्चिम संस्कृति में लोकप्रिय पुनर्जन्म की कहानी से परिचित कराया.

चेतन आनन्द की ‘नीचा नगर’को ग्रांड प्राइज

कांस फिल्म समारोह में ग्रांड प्राइज पाने वाली पहली भारतीय फिल्म चेतन आनन्द की ‘नीचा नगर’ थी.सत्तर-अस्सी के दशक में भारत वि में सबसे अधिक फिल्में बनाने वाला देश बन गया.फिल्मों में जबर्दस्त परिवर्तन होने शुरू हो गये.रंगीन क्षेत्रीय फिल्मों का निर्माण तेज हो गया.बॉलीवुड में सबसे ज्यादा हिट फिल्में देने के कारण सुपर स्टार अभिनेता का जन्म हु आ.वैसे पहले अभिनेता रोमांटिक फिल्मों के हीरो राजेश खन्ना थे.राजेश खन्ना के बाद अपने एंग्री यंगमैन की बदौलत अमिताभ बच्चन सुपर स्टार, मेगा स्टार, वन मैन इंडस्ट्री आदि ना जाने क्या-क्या बन गये.धम्रेन्द्र को अपने कसरती बदन और सेक्सी लुक के कारण हीमैन की उपाधि दी गयी.‘शोले’ और ‘जय संतोषी मां’

 2009 में 2961 फिल्में बनीं

जैसी मेगा-हिट फिल्में इसी दौर में प्रदर्शित निहलानी, एमएस सथ्यू आदि इसी दौर के फिल्मकार हैं. चालू सदी में भारतीय सिनेमा ग्लोब्लाइज्ड हो गया है. 2009 में एक प्रकार का इतिहास बना, जब भारत में सबसे ज्यादा 2961 फिल्में बनीं.भारतीय फिल्म उद्योग द्वारा इस कीर्तिमान को अभी भंग किया जाना है.‘लगान’ और ‘स्वदेश’ जैसी फिल्में ऑस्कर की विदेशी फिल्मों की श्रेणी अपना नाम दर्ज करवाने में तो कामयाब रहीं, लेकिन इस प्रतिष्ठित पुरस्कार को जीत ना सकीं.

अलबत्ता, इंडो-ब्रिटिश को-प्रोडक्शन से बनी फिल्म ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ तीन श्रेणियों में ऑस्कर जीत पाने में सफल हुई.वैसे अस्सी में दशक में ‘गांधी’ की कास्ट्यूम डिजायनिंग के लिए भारत की भानु अथैया ऑस्कर जीतने में कामयाब रहीं.निश्चित रूप से भारतीय सिनेमा का इतिहास सुनहरा है और तेज तरक्की से भरपूर है लेकिन, एक सौ साल पूरे करते समय भारतीय फिल्मों का, खासतौर पर भारतीय फिल्मों का एक्शन और सेक्स पर ज्यादा निर्भर रहना चिंतनीय है.


भारत सरकार की एक कमेटी ने भी टिप्पणी की है कि फिल्में अब कंटेंट के मामले में खराब हो गयी हैं.चूंकि, फिल्में अब एक सौ करोड़ को अपना लक्ष्य बना रही हैं तो इसलिए वह कंटेंट के बजाय स्टारडम और धुआंधार प्रचार और दुष्प्रचार तथा हजारों की संख्या में स्क्रीन पर कब्जा कर वीकेंड में ही एक सौ करोड़ का लक्ष्य पा लेना चाहती हैं.भारतीय सिनेमा के लिए यह गर्व की बात हो सकती है कि वह अपने एक सौवें साल में अभी तक दो फिल्में ‘अग्निपथ’ और ‘हाउसफुल 2’ दे चुका है.


ऋतिक रौशन और अक्षय कुमार खान अभिनेताओं और अजय देवगन के साथ सौ करोड़िया क्लब में शामिल हो चुके हैं.लेकिन, जिस प्रकार से फिल्मों में सेक्स और हिंसा को अनावश्यक महत्व दिया जा रहा है, उसे देखते हुए फिल्म निर्माताओं को सोचना पड़ेगा कि अपने जन्म के सौवें साल में हम नारी शरीर को नग्न करने की होड़ के दौर में तो नहीं पहुंच रहे हैं?

 


 
 

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