वैक्सीन ही उम्मीद

Last Updated 15 May 2021 08:50:47 AM IST

कोरोना की दूसरी लहर देश को जो दिन दिखा रही है, वैसे दृश्य वर्षो, दशकों या सदियों तो क्या, मानव सभ्यता के ज्ञात इतिहास में भी कदाचित ही देखे गए होंगे। नये मरीजों का रोजाना लाखों की संख्या में जुड़ाव और हजारों की संख्या में मौत का अलगाव अब देश की नियमित दिनचर्या जैसा बन गया है।


वैक्सीन ही उम्मीद

तीन महीने पहले तक दुनिया को कोरोना से मुक्ति की राह दिखाने वाली पहचान महज 100 दिनों के अंदर कोरोना से सबसे ज्यादा हलकान देश वाली बन गई है। आज भारत इस हद तक कोरोना का कहर भोगने के लिए अभिशप्त है कि हम दुनिया की कोरोना कैपिटल बन चुके हैं और दम तोड़ रहा हर तीसरा शख्स भारतीय निकल रहा है। नौबत यह आ गई कि देश अब इस लहर का सबसे बुरा दौर देखने तक के लिए भी तैयार है, लेकिन पीक का इंतजार खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है।

रूप बदल-बदल कर बहरूपिया बन चुके कोरोना ने अब शहरों से निकल कर गांवों का रुख करने के विशेषज्ञों के सबसे बड़े डर को भी सही साबित कर दिया है। कोरोना की पहली लहर शहरों तक सीमित रही, गांव उसके असर से अछूते ही रहे थे। यहां तक कि जब लॉकडाउन लगा और मजदूरों का शहरों से गांवों की ओर बड़े पैमाने पर पलायन हुआ, तब भी तमाम आशंकाओं के विपरीत हमारे गांव कोरोना के कहर से बचे रहे। लेकिन इस बार हालात अलग हैं। कई राज्यों में गांव के गांव बीमार पड़े हैं, शहरों से दोगुने मामले अब गांवों में मिल रहे हैं। उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव से लेकर हरिद्वार में हुए कुंभ का इसमें कितना बड़ा योगदान है, यह भले ही बहस का विषय हो, लेकिन हकीकत यही है कि देश को सेहत का पाठ पढ़ाने वाले गांव इस बार खुद बीमार हैं।  

गांवों के लिए योजना का अभाव
ज्यादा बड़े अफसोस की बात यह है कि अपने गांवों को दोबारा सेहतमंद बनाने की हमारे पास कोई योजना भी तैयार नहीं दिख रही है। योजना तब तैयार होगी, जब हमें इस बात का ठीक-ठीक अंदाजा होगा कि गांवों में यह बीमारी कितनी फैल चुकी है। अभी तो हालत यह है कि ज्यादातर मामले दर्ज ही नहीं हो रहे हैं, क्योंकि उतनी टेस्टिंग ही नहीं हो रही है, जहां हो भी रही है वहां लोग जांच करवाने से झिझक रहे हैं। इस सच को देश के करीब 6 लाख गांव और उनमें रहने वाली करीब 90 करोड़ की आबादी से जोड़ कर देखेंगे, तो हमें पता चलेगा कि देश की असली तस्वीर तो अभी भी पर्दे में है। कोरोना काल ने महानगरों तक की स्वास्थ्य सुविधाओं की पोल खोल कर रख दी है, ऐसे में गांवों के बारे में कोई बात भी करना बेमानी है। जहां पीने के पानी जैसी जिंदा भर रहने की बुनियादी जरूरत के लिए भी लोगों के सामने रोजाना कई किलोमीटर आने-जाने की मजबूरी हो, वहां कोरोना से बचने के लिए घरों के अंदर रहने की प्राथमिक जरूरत तक पूरी करना संभव नहीं है। जब जान बचाने के ही लाले पड़े हों और जांच के लिए 50-50 किलोमीटर दूर शहरों तक जाना तो छोड़िए, एक-एक इंच का सफर भारी हो, तो ‘मेडिकल टूरिज्म’ जैसे शब्दों का खोखलापन खुद-ब-खुद बयां हो जाता है। इसलिए कस्बे की मेडिकल दुकान हो या झोलाछाप डॉक्टर की क्लिनिक, आप उनका कितना भी मजाक उड़ा लें, वहां उमड़ रही भीड़ ही दरअसल, हमारे गांवों की स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत है।
 

सवाल उठता है कि इस हालत से हम उबरेंगे कैसे? यह तो हर कोई जानता है कि जैसे इस दुनिया का अंत निश्चित है, वैसे ही कोरोना की ‘मौत’ का भी कोई-न-कोई वक्त तो मुकर्रर होगा ही। क्या पिछले साल जैसा सख्त लॉकडाउन ही हमें इस मंजिल की ओर लेकर जाएगा। भारत में कोरोना को काबू में करने के लिए डब्ल्यूएचओ से लेकर व्हाइट हाउस तक, हर कोई कम-से-कम 15 दिनों के लॉकडाउन की पैरवी कर रहा है। नजरिया स्पष्ट है कि उन्हें इसके अलावा संक्रमण रोकने का कोई और दूसरा तरीका नहीं दिखता। लेकिन हमारी शासन व्यवस्था इसके पक्ष में नहीं दिखती। शायद जान है तो जहान है वाली बात अब पूरी तरह भुला दी गई है और अब केवल जान भी और जहान भी वाला फलसफा ही आगे बढ़ने का सूत्र बन गया है। लॉकडाउन का सवाल अब ऐसी फुटबॉल बन गया है, जिसे लेकर केंद्र सरकार की चाहत तो यही दिखती है कि वो ज्यादा-से-ज्यादा समय राज्य सरकारों के पाले में ही रहे। वजह भी साफ है। अगर केंद्रीय स्तर पर कोई लॉकडाउन हुआ तो देश की अर्थव्यवस्था से लेकर गरीबों की आर्थिक व्यवस्था तक का हर प्रश्न उसकी जिम्मेदारी बन जाएगा जो उसके खजाने के खाली होने की रफ्तार को और तेज कर सकता है।
 

वैसे सरकार की निगाहें उस दूसरे विकल्प पर ज्यादा हैं, जिसे दुनिया के कई देशों में हालात सुधरने की बड़ी वजह बताया जा रहा है, और यह वजह है वैक्सीनेशन। पिछले कुछ दिनों में कोरोना की वजह से लगभग महापल्रय जैसे हालात देख चुका अमेरिका आज वैक्सीन के दम पर ही इतरा रहा है। करीब आधी आबादी को उम्मीद का टीका लगा देने के बाद अमेरिका के हौसले इतने बुलंद हो गए हैं कि वहां ऐसे लोगों को मास्क लगाने की पाबंदी से छूट दे दी गई है, जिन्होंने वैक्सीन की डोज ले ली है। इजराइल, कनाडा, ब्रिटेन समेत यूरोप के कई देश भी सीना ठोककर ‘अच्छे दिन’ आने का ऐलान कर रहे हैं।  

वैक्सीन के हम ‘खलीफा’, खा गए गच्चा
लेकिन दुनिया भर में वैक्सीन के ‘खलीफा’ तो हम हैं, फिर ये देश हमसे आगे कैसे निकल गए? अब इस बात में कोई राज नहीं रह गया है कि इस मोर्चे पर हमसे चूक हुई है। जिस वक्त यह विकसित देश अपने लोगों को टीके का सुरक्षा कवच पहनाने का खाका तैयार कर रहे थे, तब हम वैक्सीन बांटने वाली वैिक मैत्री का फर्ज निभा रहे थे। जब तक हम इन बातों से फुर्सत में हुए, तब तक कालांतर में हमसे ही वैक्सीन मांग कर काम चलाने वाले अपनी-अपनी जरूरत के कोटे का इंतजाम करने की राष्ट्रीय जवाबदेही पूरी कर चुके थे। नतीजतन, दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण कार्यक्रम शुरु आती चरण की सफलता के बाद लड़खड़ाने लगा। टीकों की कमी, एक देश में टीकों के अलग-अलग दाम, केंद्र-राज्यों की टकराहट जैसी कई वजह इसकी जिम्मेदार रही हैं। इनमें से कुछ वजह अभी भी अबूझ पहेली बनी हुई हैं, आगे भी रहेंगी, लेकिन राहत की बात यह है कि टीकाकरण के बंद होते रास्तों के बीच अब हमारे सामने कई विकल्प खुल गए हैं। वैक्सीनेशन कार्यक्रम को टीकों की खुराक उपलब्ध करवा रही सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटेक ने अपना-अपना उत्पादन बढ़ाने का वादा किया है। भारत बायोटेक को-वैक्सीन के अलावा एक नेजल वैक्सीन को भी बाजार में उतारने की तैयारी में है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वो कोरोना से लड़ाई में गेम-चेंजर साबित हो सकती है। स्पूतनिक, फाइजर, मॉडर्ना, जॉनसन एंड जॉनसन जैसी 6 और ग्लोबल वैक्सीन के देश में आने का रास्ता साफ ही नहीं हुआ है, बल्कि आने वाले दिनों में इनकी सप्लाई भी शुरू हो जाएगी। इस दिशा में नीति आयोग का आने वाले दिनों में 216 करोड़ डोज उपलब्ध करवाने का हौसला यकीनन हिम्मत बंधाने वाला है।
 

देश की रक्षा करने वाली सेना की रिसर्च शाखा डीआरडीओ ने भी इस मुश्किल वक्त में एक तीर से चार शिकार करने वाला दवा रूपी नया हथियार खोज निकाला है। यह हथियार है डीआरडीओ की नई दवा 2-डीजी (डिऑक्सी ग्लूकोज), जो एक साथ अस्पतालों में बिस्तर की कमी, ऑक्सीजन की किल्लत, रेमडेसिविर की उपलब्धता और वैक्सीन के कच्चे माल के लिए विदेशों पर निर्भरता को दूर करती है। जिन मरीजों को यह दवा दी गई, उन्हें ऑक्सीजन की जरूरत कम पड़ी और वो दूसरे मरीजों से पहले ठीक भी हो गए यानी उन्हें अस्पताल में कम दिन रुकना पड़ा।
तो ऐसा नहीं है कि अस्पतालों से लेकर श्मशानों तक लगी लंबी-लंबी कतारों के बीच उम्मीद की किरण पूरी तरह बुझ चुकी है। असफलताओं के भंवर से निकल कर सफलता की कुछ धाराएं आशाओं के सागर का निर्माण भी कर रही हैं। बेशक, इस मामले में काफी देर हुई है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में अब जिस तरह के प्रयास हो रहे हैं, वो जब जमीन पर उतरेंगे तो यकीनन देश के हालत सुधरेंगे।
 

उपेन्द्र राय


Post You May Like..!!

Latest News

Entertainment