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12 Jul 2020 03:40:49 AM IST
Last Updated : 12 Jul 2020 03:42:47 AM IST

मीडिया : मीडिया की खामोशियां

सुधीश पचौरी
मीडिया : मीडिया की खामोशियां
मीडिया : मीडिया की खामोशियां

पता नहीं क्यों, लेकिन कानपुर के गैंगस्टर विकास दुबे के ‘एनकाउंटर’ में मुझे ‘दबंग-थ्री’ की झलक दिखती है।

कोई अचरज नहीं कि एक फिल्म निर्माता ने इस ‘एनकाउंटर’ पर फिल्म बनाने के लिए जब मनोज वाजपेई से कहा तो उन्होंने तो मना कर दिया; लेकिन उनकी जगह कोई और आ जाएगा। आखिर, ‘दबंग थ्री’ को कौन न चाहेगा?
‘दबंगई’ एक ठोक-कल्चर है। इस ‘ठोक कल्चर’ का बड़ा बाजार है..विकास दुबे और उसके एनकाउंटर की कहानी दबंगई के ‘कंपटीशन’ की नई कहानी है। ‘दबंग टू’ की कहानी कानपुर की थी। उसमें भी कुख्यात ‘गैंगस्टर’ था, जिसे राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था। उससे भी दबंग एक पुलिस अफसर पांडे भी था, जिसका नारा ही था कि ‘दुश्मन पर दबाव बराबर बने रहना चाहिए’। ‘ठोक ठोक’ कर दबाव बनाता था। विकास दुबे और उनके एनकाउंटर की कहानी भी कानपुर की है। तुलना करते जाइए। दोनों के बीच बहुत-सी समानताएं मिलेंगी। ‘दबंग वन’ की कहानी भी पूर्वी प्रदेश की थी। ‘दबंग वन’ के पांडे जी का एक डॉयलाग तो ‘ठोक कला’ का आदर्श ही है : एक आइटम सांग पर नाचने के बाद ‘दबंग’ पांडे जी ‘खलनायक’ से कहते हैं कि छेदीलाल हम तुममें इतने छेद करेंगे कि तुम भूल जाओगे कि सांस किससे लें और पादें किससे?’ इसके बाद पांडे जी अपने इस गंदे मजाक पर हंसते थे और दर्शक भी पांडे जी की तरह इस मजाहिया दबंगई का आनंद लेते थे।

शायद यहीं कहीं से ‘दबंगई’ की ‘ठोक भाषा’ हमारी अपनी भाषा बनने लगी। यूपी में अरसे से ‘दबंग कल्चर’ पनपती गई है। हमारी फिल्मों ने उसका लगातार आदर्शीकरण किया है। फिर, इसके लिए  जमीन भी तो तैयार हुई है। राजनीति और अपराध एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। ‘नागरिक राजनीति’ की जगह ‘दबंगई की राजनीति’ का बोलबाला है। कितने ही ऐसे नेता, विधायक या सांसद  हैं, जिन पर क्रिमिनल केस चल रहे हैं लेकिन जो कानून बनाते हैं। जो सत्ता में आ जाता है, अपने ऊपर चल रहे सारे केसों को खत्म करा देता है और देवता बन जाता है..। कहने की जरूरत यह कि विकास दुबे में ऐसे सब तत्व थे जो दबंग के खलनायक में रहे। एक एंकर ने ही बताया कि वह इतना ‘खुंदकी’ था कि एक दिन उसने अपने स्कूल के प्रिंसिपल को जान से मारा और फिर उसके खून से अपना अभिषेक तक किया। वह कितना ‘वेल कनेक्टेड’ था, इसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस पर साठ संगीन केस थे, लेकिन उसे  हर बार जमानत मिल जाती थी और इतना अधिक ताकतवर था कि जब यूपी पुलिस ने क्रिमिनलों की लिस्ट बनाई तो उसमें उसका नाम नहीं लिखा।
वह कितना दुस्साहसी था, इसका अंदाज दो जुलाई को लगा जब दबिश देने गई पुलिस पार्टी में से आठ को जान से हाथ धोना पड़ा। उसके पास इतनी फायर पावर थी। जाहिर है कि ऐसा आदमी एक दिन में नहीं बनता। उसे भरोसा था कि पुलिस से लेकर सत्ता तक में उसके बचाने वाले हैं और वह फिर बच निकलेगा। इस घटना के बाद यूपी पुलिस की दबंग छवि काफी क्षतिग्रस्त हुई नजर आती थी। इस वजह से पुलिस तंत्र में विकास से निजी खुंदक भी हो गई हो। इसका पता पुलिस वालों के परिवारियों की उस खुशी के इजहार से चलता है, जो विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद मीडिया में दिखी। दुबे के ‘एनकाउंटर’ को मीडिया ने भी एक प्रकार से ‘दबंग थ्री’ की तरह ही बनाया और दिखाया। और क्यों न दिखाता, अपने मीडिया की भाषा भी तो ‘दबंगई’ की भाषा है। हमारे कई एंकर किसी ‘दबंग’ से कम नहीं।
उनके प्राइमटाइम के दरबारों में उनके नजरिए पर सवाल उठाने वाले का वे वहीं बैठे ‘शट अप शट अप’ करके, साइलेंट करके, एक प्रकार का ‘एनकाउंटर’ करते-कराते रहते हैं। शायद इसीलिए अपने मीडिया में भी दबंगई के प्रति पूजा का भाव बढ़ा दिखता है, वरना क्या वजह है कि एकाध एंकर को छोड़ कर इस ‘एनकाउंटर’ पर किसी ने भी इस लगभग, ‘पहले से ही तय कर दिए गए एनकाउंटर’ को लेकर बहुत सवाल नहीं किए। सिर्फ एक एंकर ने इसे ‘फेक एनकाउंटर’ कहने की कोशिश की, लेकिन वह भी अकेला पड़ गया। उसके अलावा सिर्फ एक हिंदी चैनल के रिपोर्टर ने कहने का साहस किया कि विकास दुबे का एनकाउंटर तो तय है। बस यह पता नहीं है कि वह कब और कहां होगा? यही हुआ। मीडिया की गाड़ियां रोकी गई ताकि चैनल उसे लाइव न दिखा दें और ‘एनकाउंटर’ कर दिया गया। और उसके बाद तो सारी कहानियां ही विकास की खलनायकी की ओर मोड़ दी गई। मीडिया की इस तरह की चुनी हुई खामोशियां अपने आप में बहुत कुछ कहती हैं।


 
 

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