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12 Jul 2020 03:38:26 AM IST
Last Updated : 12 Jul 2020 03:40:36 AM IST

वैश्विकी : साथ भी अकेले भी

डॉ. दिलीप चौबे
वैश्विकी : साथ भी अकेले भी
वैश्विकी : साथ भी अकेले भी

भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में सैन्य संघर्ष के बाद दुनिया की विदेश नीति और रणनीति के जानकार यह अनुमान लगा रहे हैं कि आने वाले दिनों में भारत कौन से रणनीतिक फैसले करता है।

सबसे अधिक उत्सुकता इस बात को लेकर है कि भारत मालाबार नौसैनिक अभ्यास में आस्ट्रेलिया को शामिल करता है या नहीं। अब तक इस अभ्यास में भारत, अमेरिका और जापान की नौसेनाएं भाग लेती रहीं हैं। इस अभ्यास में आस्ट्रेलिया का शामिल होना केवल एक अन्य देश का जुड़ना नहीं है; इसका विशेष रणनीतिक महत्त्व है। यह पहला स्पष्ट संदेश होगा कि भारत इंडो-पैसेफिक (भारत-प्रशांत) क्षेत्र में चीन को काबू करने के लिए 4 देशों के गुट को मूर्तरूप देने में सहयोग देने के लिए तैयार है। चीन काफी पहले से ही भारत को आगाह करता रहा है कि वह इस गुट (क्वाड) में शामिल नहीं हो।
भारत भी औपचारिक रूप से इस गुट में शामिल होने से बचता रहा है। इसका कारण यह है कि भारत पहले की गुटनिरपेक्षता की नीति के अनुरूप ही किसी सैन्य गुट से नहीं जुड़ना चाहता। उसकी विदेश नीति स्वतंत्र और रणनीतिक रूप से स्वायत्तता की है। पूर्वी लद्दाख में सैन्य संघर्ष के बाद समीकरण बदल गए हैं। हजारों किलोमीटर लंबी सीमा पर चीन भारत के लिए वास्तविक खतरे के रूप में उभरा है। इस सीमा पर चीन का दबाव कम करने के लिए भारत के सामने यह विकल्प है कि वह अन्य देशों के साथ मिलकर इंडो पैसेफिक क्षेत्र में चीन पर दबाव डाले।

मालाबार अभ्यास में आस्ट्रेलिया को निमंतण्रदेने में किसी तरह की नीतिगत बाधा नहीं है। भारत और आस्ट्रेलिया के बीच पिछले दिनों सैन्य अड्डों पर एक-दूसरे को सुविधाएं देने का समझौता हुआ है। इसके तहत आस्ट्रेलिया के युद्धपोत भारतीय नौसेना प्रतिष्ठानों पर सुविधा हासिल कर सकते हैं। ऐसी सुविधा भारतीय युद्धपोतों को आस्ट्रेलिया के अड्डों पर भी मिलेगी। भारत सरकार की ओर से अभी मालाबार अभ्यास के बारे में कोई सूचना नहीं दी गई है, लेकिन जापान, दक्षिण कोरिया और आस्ट्रेलिया से मिलने वाली सूचनाओं के अनुसार भारत जल्द ही सकारात्मक फैसला कर सकता है। अमेरिका के विदेश मंत्रालय के वर्तमान और पूर्व अधिकारियों ने भारत को यह सलाह दी है कि वह रूस और चीन के प्रभाव वाले अंतरराष्ट्रीय मंचों के बजाय अमेरिका और अन्य लोकतांत्रिक देशों वाले मंचों को तरजीह दे। उनका आग्रह यह है कि भारत ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन और रिक (रूस-भारत-चीन) जैसे मंचों में अपनी सक्रियता कम करे। भारत के लिए ऐसा फैसला करना आसान नहीं है। भारत नये विश्व के जिस ढांचे की परिकल्पना करता है, वह बहुध्रुवीय (मल्टीपोलर) है। भारत स्वयं को अमेरिका, रूस और चीन की तरह विश्व राजनीति का एक ध्रुव मानता है। इस विचार का तकाजा है कि वह किसी अन्य ध्रुव के साथ इस तरह न जुड़े की उसकी रणनीतिक स्वायत्तता प्रभावित हो।
इस समय भारत-चीन के मध्य स्थिति यह है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा के क्षेत्र को लेकर चीन के पास इसके उपयोग की महत्त्वाकांक्षी योजना है, जिसके माध्यम से वह दक्षिण एशिया और विश्व में अपनी पैठ बनाना चाहता है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के कार्यकाल में चीन की विस्तारवादी नीति को बढ़ावा मिल रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने गलवान घाटी के पूरे क्षेत्र में चीन की आक्रामक युद्ध नीति की आलोचना की है और भारत का समर्थन किया है। अमेरिका और अन्य पश्चिमी लोकतांत्रिक देश दक्षिण एशिया और विश्व में साम्राज्यवादी चीन के प्रभुत्व को रोकने के लिए एक मंच पर आ रहे हैं।
चीन भी अंतररराष्ट्रीय स्तर पर उसके विरुद्ध बन रहे माहौल को लेकर चिंतित है। उसे भान हो गया है कि किसी भी मुकाबले में भारत अकेला नहीं है। जहां एक ओर पश्चिमी देश भारत के पक्ष में खुलकर सामने आ रहे हैं वहीं रूस जैसा परंपरागत दोस्त भारत के साथ खड़ा नजर आता है। भारत-चीन सीमा पर तनाव के बाद भारत को अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों ने ही सैन्य आपूर्ति का भरोसा नहीं दिलाया बल्कि रूस ने भी मिसाइल और रक्षा प्रणाली एस-400 की आपूर्ति जल्द करने का आश्वासन दिया। भारत परस्पर विरोधी पक्षों से मिल रहे इस समर्थन की बजाय किसी एक पक्ष के साथ जुड़ना पसंद नहीं करेगा। स्वतंत्र विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों का तकाजा भी यही है।


 
 

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