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02 Jun 2020 12:13:09 AM IST
Last Updated : 02 Jun 2020 12:14:46 AM IST

महाराष्ट्र-दिल्ली : ऐसी सरकारों से तौबा

अवधेश कुमार
महाराष्ट्र-दिल्ली : ऐसी सरकारों से तौबा
महाराष्ट्र-दिल्ली : ऐसी सरकारों से तौबा

अगर आप केवल सरकारों के वक्तव्यों पर विश्वास करने तक सीमित हैं तो निष्कर्ष यह आएगा कि कोरोना मरीज पूरे स्वास्थ्य महकमे की प्राथमिकता हैं और उनका श्रेष्ठ इलाज चल रहा होगा।

दिल्ली भारत की राजधानी है और मुंबई आधुनिक अर्थव्यवस्था की राजधानी मानी जाती है। जाहिर है, यहां श्रेष्ठतम प्रबंधन एवं इलाज होना चाहिए।
आप किसी सरकारी, निजी अस्पताल में चले जाएं, घरों में क्वारंटीन मरीजों से संपर्क करें तो आपकी गलतफहमी मिनट में दूर हो जाएगी। आप कहेंगे कि दोनों राज्य सरकारें झूठ बोल रही है और कोविड-19 के संक्रमित केवल भगवान भरोसे हैं। अभी मुंबई की एक खबर चल रही है, जिसमें एक मरीज को लक्षण होने पर वी.एन. देसाई अस्पताल ले जाया गया। वहां निमोनिया बताते हुए कूपर अस्पताल भेजा गया। दो दिनों बाद कोविड-19 पॉजिटिव रिपोर्ट आई। परिजन शाम 6 बजे से बीएमसी के हेल्पलाइन नंबर पर फोन करते रहे। रात 12.30 बजे एम्बुलेंस आई और मरीज को लेकर गुरु नानक अस्पताल गए। वहां बताया गया कि आईसीयू के लिए सेवन हिल्स अस्पताल जाएं। सेवन हिल्स में घंटों प्रतीक्षा के बाद लोगों ने कुछ नेताओं को फोन किया तो बीएमसी के ट्रॉमा सेंटर में 18 घंटे बाद बेड मिला। रात 12 बजे मरीज की मृत्यु हो गई। यह एक उदाहरण बताने के लिए पर्याप्त है कि किस तरह की स्थिति है मुंबई में?

ठीक यही स्थिति दिल्ली की है। आपके यहां किसी को लक्षण दिखे तो हेल्पलाइन नंबर पर फोन करिए, सामान्य तौर पर मदद नहीं मिलेगी। मंडावली में मनोरंजन सिंह की रिपोर्ट पॉजिटिव आई। उन्होंने जितने नंबर उपलब्ध थे सब पर फोन किया। कोई रिस्पांस नहीं। दूसरे दिन बताया गया कि आप घर में क्वारंटीन हो जाइए। कोई स्वास्थ्यकर्मी आया, जिसने एक व्यक्ति के हाथों कागज भेजा जिस पर उन्हें हस्ताक्षर कर देना था कि हम घर में क्वारंटीन रहेंगे। स्वास्थ्यकर्मी वहां आया नहीं और न कोई मार्ग-निर्देश दिया। हां, कुछ फोन अवश्य आए कि क्या स्थिति है। बाद में वह भी बंद। अब वो ठीक हैं, लेकिन कोई बताने वाला नहीं कि क्या करें? 14 दिन कब बीत गए। पूरे परिवार का टेस्ट होना चाहिए, नहीं हुआ। कोई काउंसलिंग नहीं। यह भी कोई एक मामला नहीं है। शत-प्रतिशत घरों में क्वारंटीन होने वालों के साथ यही हो रहा है। अस्पतालों का हाल जानने के लिए जयप्रकाश नारायण अस्पताल चले जाइए आपको भारी संख्या में लोग रोते, बिलखते और  भागते मिल जाएंगे। उनके परिजन भर्ती भी हैं या नहीं,  इसकी सूचना मिलने तक में कई दिनों लग रहे हैं। मृत्यु होने प्राय: शव तक स्वाभाविक रूप में नहीं मिल पाता। दिल्ली एवं मुंबई के सारे राज्य अस्पतालों की एक ही दशा है। केंद्र ने स्वास्थ्यकर्मिंयों की रक्षा के लिए कानून बना दिया पर उनकी जिम्मेवारी तय हुई ही नहीं। किंतु जहां राज्य सरकारें अपनी जिम्मेवारी की बजाय झूठ, गफलत और कुटिलता से काम कर रहीं हैं वहां स्वास्थ्यकर्मिंयों पर नकेल कौन कसेगा? अभी एक ऑडियो वायरल है, जिसमें केजरीवाल से सफदरजंग अस्पताल का एक कर्मचारी कह रहा है कि यहां तो केवल मौत ही दिख रही है, कोई व्यवस्था नहीं है। जितने लोग मारे गए उतनी सरकार बता ही नहीं रही है।
अब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे एवं दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल से पूछने का समय आ गया है कि आपकी जिम्मेवारी क्या है? केजरीवाल का सारा फोकस आजकल टीवी और प्रिंट मीडिया में विज्ञापन पर है। पहले भी वे प्रेसवार्ता के माध्यम से केवल अपना प्रचार करते रहे हैं। जिस तरह का पूरा स्वास्थ्य ढांचा विफल है वह किसी भी नेता के लिए डूब मरने की बात है। सच यह है कि कोविड 19 के मरीज का समुचित इलाज तो छोड़िए उनके साथ उचित व्यवहार, उनके परिजनों के साथ सामान्य सहानुभूति, मृत्यु के बाद बिना भागदौड़ शव मिल जाना, जिनके घर में कोई कोविड-19 संक्रमित हो गया; उनके सारे परिवार की टेस्टिंग या काउंसलिंग तक नहीं की गई। अगर आप सोचते हैं कि निजी अस्पतालों में हम इलाज करा लेंगे तो आपको औसत प्रतिदिन कम-से-कम 30 हजार रु पया और अगर आईसीयू में गए तो शायद लाख या उससे ऊपर भी खर्च करना पड़ेगा। दुर्भाग्य यह है कि लगातार मरीजों की संख्या बढ़ने, मृतकों की संदिग्ध संख्या के बावजूद देश का ध्यान श्रमिकों के जाने-आने पर है। इसका भी सच भयावह है।
गहराई से देखेंगे तो निष्कर्ष यही आएगा कि दोनों जगहों की सरकारों ने ऐसी स्थिति पैदा की कि ज्यादा-से-ज्यादा बाहर के लोग निकल जाएं। दिल्ली में पहले लॉकडाउन के बाद तीन दिनों तक उत्तर प्रदेश सीमा पर भीड़ जुटी रही और उनको वापस लाने का केजरीवाल ने हरसंभव तो छोड़िए, एक भी ठोस कदम नहीं उठाए। आज भी उनका बयान है कि केंद्र हमको 100 ट्रेन प्रतिदिन दे तो हम लोगों को सम्मानपूर्वक पहुंचवा देंगे। क्या क्रूर मजाक है! महाराष्ट्र में लॉकडाउन पूरी तरह विफल रहा। अनेक जगहों से लोगों के इकट्ठे होने की रिपोर्ट आतीं रहीं, लेकिन लगा नहीं कि सरकार के अंदर गंभीरता भी है। यह बात आम लोग कहते हैं कि उद्धव सरकार ने मौका देखकर ज्यादातर गैर महाराष्ट्रीय कामगारों को बाहर निकालने की रणनीति पर काम किया। परिणाम हुआ कि शारीरिक दूरी टूट गई। महाराष्ट्र में देश का कुल 45 प्रतिशत मरीज एवं इतने ही मृतक हो चुके हैं। मुंबई संक्रमितों और मृतकों का शहर हो गया है। दिल्ली में भी लगातार संख्या बढ़ती जा रही है। इसके अपराधी ये सरकारें हीं हैं। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य को देखिए। सबसे ज्यादा संवेदनशील राज्य, सबसे ज्यादा शहर, सबसे ज्यादा बाहर से आने वाले श्रमिक, दूसरे राज्य जाने के लिए सबसे ज्यादा गुजरने वाले श्रमिक भी यहीं..बावजूद कोविड 19 नियंत्रण में है, दूसरे राज्यों के श्रमिकों की भी हरसंभव सहायता हो रही है। दूसरी ओर सबसे ज्यादा दुर्घटनाग्रस्त होने वाले श्रमिकों की संख्या महाराष्ट्र की है। प्रश्न है कि रास्ता क्या है?
जीवन जीने से बड़ा कोई मौलिक अधिकार नहीं। महाराष्ट्र और दिल्ली ने अपने कुप्रबंधन और कुछ कुटिल नीति के कारण इस अधिकार को जोखिम में डाल दिया है। स्थिति इनके नियंत्रण से बाहर हो गई है। इसमें केंद्र का हस्तक्षेप अनिवार्य है। इन दोनों सरकारों को सत्ता में रहने का अधिकार नहीं है।  मोदी सरकार को विरोध और दलों के बीच अलोकप्रियता का जोखिम उठाते हुए भी इन दोनों राज्यों का शासन अपने हाथ में लेकर संक्रमण का विस्तार, लोगों की जान की रक्षा करनी चाहिए। अनावश्यक पलायन को रोकने का रास्ता भी उसी से निकलेगा। साहस करे मोदी सरकार।


 
 

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