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18 Sep 2019 03:27:28 AM IST
Last Updated : 18 Sep 2019 03:30:33 AM IST

कुंवर नारायण: जन्मभूमि में भी बेगाने

कृष्ण प्रताप सिंह
कुंवर नारायण: जन्मभूमि में भी बेगाने
कुंवर नारायण: जन्मभूमि में भी बेगाने

दो साल पहले इस संसार को अलविदा कह गए हिन्दी के ‘आत्मजयी’ कवि कुंवरनारायण की एक कविता है ‘अयोध्या, 1992’।

इसमें अयोध्या में प्रभु राम के साम्राज्य के एक विवादित स्थल में सिमट जाने पर चिंता जताते हुए वे उनसे ‘सविनय निवेदन’ करते हैं कि जंगल-जंगल भटकने के बजाय ‘सकुशल सपत्नीक../किसी पुरान-किसी धर्मग्रंथ में’ लौट जाएं’ क्योंकि ‘अबके जंगल वो जंगल नहीं/जिनमें घूमा करते थे वाल्मीकि’।
कुंवरनारायण की चिर-परिचित मिथकीय चेतना की प्रतिनिधि और व्यापक परिप्रेक्ष्य में रची गई इस कविता को उनकी जन्मभूमि के संदर्भ में देखें तो अयोध्या के जिस जुड़वां शहर फैजाबाद के मोतीबाग मुहल्ले में पिता विष्णुनारायण अग्रवाल के दूसरे बेटे के रूप में 19 सितम्बर, 1927 को उनका जन्म हुआ, वह फैजाबाद भी अब फैजाबाद नहीं ही रह गया है। उनके जन्मकाल के फैजाबाद की सामाजिक राजनीतिक चेतना को समझना हो तो जानना चाहिए कि कुंवरनारायण के जन्म के महज तीन महीने बाद 19 दिसम्बर को देश की गोरी सरकार ने ऐतिहासिक काकोरी कांड के क्रांतिकारी नायक अशफाक उल्लाह खां को ‘जिन्दान-ए-फैजाबाद’ से ही ‘सू-ए-अदम’ भेजा था! इसके दो साल बाद 1929 में महात्मा गांधी ने अपने हरिजन फंड के लिए धन जुटाने के सिलसिले में फैजाबाद के मोतीबाग मुहल्ले  में स्थित मैदान में ही सभा की थी। उन दिनों कुंवरनारायण का अपना घर भी कांग्रेस के समाजवादियों की गतिविधियों और जमावड़ों का केंद्र हुआ करता था। आचार्य जे. बी. कृपलानी, उनकी जीवनसंगिनी सुचेता कृपलानी, आचार्य नरेन्द्र देव और डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे नेता वहां आते, ठहरते और विचार-विमर्श किया करते थे।

पिता के ही कारण कुंवरनारायण को किशोरावस्था से ही इन समाजवादी नेताओं का सान्निध्य मिलने लगा था, जिसका प्रभाव उनकी साहित्य सर्जना पर भी दिखाई देता है। लेकिन आज के फैजाबाद का ‘अपने’ कुंवरनारायण से बेगानापन है कि उनके निधन के दो सालों में ही हैरतनाक ढंग से अपरिचय की हद तक जा पहुंचा है। उसके मोतीबाग के जिस घर में उनका जन्म हुआ था, उसकी इस दौरान कम से कम दो बार खरीद-बिक्री हो चुकी है। इस अंचल या शहर के साहित्यिक-सांस्कृतिक हलकों में भी उनके इस शहर का होने को लेकर कोई खास गौरवबोध नहीं दिखता। अवध में पुरानी कहावत है-घर का जोगी जोगना, आन गांव का सिद्ध। लेकिन आज का फैजाबाद कुंवरनारायण को घर के जोगी जितनी भी तरजीह नहीं देता। यह विडम्बना इस अर्थ में ज्यादा दंशित करती है कि बगल का बस्ती जिला ‘कुंआनो के कवि’ सव्रेरदयाल सक्सेना को अपनी माटी की उपज के रूप में निरंतर याद रखता है। दो दिन पहले यह लेखक उनके मुहल्ले मोतीबाग में जाकर उन्हें अपने बड़े ताऊ का छोटा बेटा बताने वाले चैरासी वर्षीय नरेशचंद्र गर्ग से मिला तो उन्होंने बताया, ‘कुंवरनारायण मुझसे सात आठ साल बड़े थे और कुछ साल पहले तक कभी-कभी  मिलने-जुलने आ जाया करते थे।’ लेकिन बस, इतना ही बताकर वे नकारात्मक हो उठे,  ‘ताऊ जी का व्यापार तो उनके बड़े बेटे कृष्ण नारायण ही संभालते थे। बाद में उनके न रहने पर कृष्ण नारायण ने ही सारे परिवार को एकजुट रखा और संभाला। कुंवरनारायण तो बाहर निकले तो बाहर के ही होकर रह गए।’
गर्ग के बताए इस बेदर्दी भरे ‘बाहर के ही होकर रह गए’ का दूसरा पहलू है कि उन दिनों पूरी तरह लाइलाज माने जाने वाले क्षय रोग से असमय ही पहले मां, फिर चाचा और फिर बहन को खोकर कुंवरनारायण ने फैजाबाद छोड़ा तो अरसे तक लौटने का कोई कारण ही नहीं तलाश पाए। इस कारण और भी कि उनके परिजनों ने अपनी फैजाबाद स्थित ज्यादातर परिसंपत्तियां बेच डालीं और लखनऊ में नया व्यवसाय आरंभ कर लिया। कुंवरनारायण ने वहीं विज्ञान के विद्यार्थी के रूप में इंटरमीडियेट की परीक्षा पास करने के बाद साहित्य में अपनी गहन अभिरु चि के कारण आगे का रास्ता बदल लिया और 1951 में लखनऊ विश्वविद्यालय से 1951 अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. किया। उनकी काव्य यात्रा ‘चक्रव्यूह’ से शुरू हुई, जिसमें उन्होंने अपने पाठकों में लगातार एक नई तरह की समझ पैदा की। कहते हैं कि उनके रचनात्मक जीवन की शुरुआत में लखनऊ शहर का विशेष योगदान रहा लेकिन 15 नवम्बर, 2017 को 90 वर्ष की अवस्था में उन्होंने दिल्ली के सीआर पार्क स्थित घर में अंतिम सांस ली तो पत्नी भारती गोयनका और बेटा अपूर्व ही उनके साथ थे। भारती ने 1966 में उनसे विवाह रचाया और 1967 में अपूर्व को जन्म दिया था।


 
 

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