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18 Sep 2019 03:30:44 AM IST
Last Updated : 18 Sep 2019 03:33:18 AM IST

जम्मू-कश्मीर : फारूक पर पीएसए के मायने

विजय शंकर सिंह
जम्मू-कश्मीर : फारूक पर पीएसए के मायने
जम्मू-कश्मीर : फारूक पर पीएसए के मायने

बीते सोमवार को जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला को पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) के तहत गिरफ्तार कर लिया गया।

उनकी गिरफ्तारी सुप्रीम कोर्ट में एमडीएमके नेता वाइको द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई। सोलह सितम्बर को दोपहर 1 बजे उन्हें निरुद्धि आदेश दिया गया। हालांकि गिरफ्तारी के औपचारिक आदेश 16 सितम्बर को जारी किए गए हैं पर वे अपने घर में 5 अगस्त से ही हैं, जिस दिन अनुच्छेद 370 की समाप्ति से जुड़ा जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन बिल संसद में पेश किया गया था। ग्यारह सितम्बर को जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने नेशनल कांफ्रेंस नेताओं को फारु क से मिलने की सशर्त अनुमति दी थी।
पीएसए,1978 कानून राज्य का कानून है। यह कानून 1978 में जब शेख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री थे तब राज्य की सुरक्षा के लिए पारित किया गया था। इसके तहत राज्य के किसी भी क्षेत्र को सुरक्षित और प्रतिबंधित घोषित करने और किसी भी दस्तावेज को राज्य के हित के विरु द्ध उसके प्रसारण को रोकने का अधिकार प्राप्त है। इस एक्ट की धारा 8 के अंतर्गत राज्य को किसी भी व्यक्ति की निरुद्धि का अधिकार है। अब यह देखना महत्त्वपूर्ण है कि क्या फारूक की इस धारा में निरु द्धि विधि सम्मत है? लेकिन अगर अखबारों को ही स्त्रोत माना जाए तो फारूक की गिरफ्तारी इस धारा में उचित नहीं लग रही। फारूक का जो इतिहास रहा है, उसके अनुसार वे जिम्मेदार नेता रहे हैं। न केवल राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं, बल्कि केंद्र में भी मंत्री रहे हैं। वे अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के खिलाफ रहे हैं।

यह उनकी अपनी सोच है कि वे जिस राज्य से आते हैं, उसका विशिष्ट दरजा वह बरकरार रखना चाहते हैं। जम्मू-कश्मीर का कोई भी राजनेता इस अनुच्छेद को हटाए जाने के पक्ष में नहीं है। यही नहीं, बल्कि 371, 372 आदि संविधान के अनुच्छेद जो देश के नॉर्थ ईस्ट के विभिन्न राज्यों को विशेषाधिकार प्रदान करते हैं, को हटाने का भी विरोध वे राज्य करते हैं, जिन्हें इन अनुच्छेदों के तहत विशेष दरजा प्राप्त है। यह विशिष्ट दरजा देने वाला अनुच्छेद 370 हटाने का विरोध करना किसी राज्य की लोक व्यवस्था के लिए कैसे खतरा बन सकता है, यह विश्वास दिलाना राज्य का काम है। हो सकता है इस निरुद्धि को अदालत में चुनौती दी जाए और जब सरकार और निरुद्ध व्यक्ति, दोनों के तर्क सामने आएं, तभी कुछ कहा जा सकता है। इस कानूनी तर्क-वितर्क को अगर दरकिनार कर के राजनैतिक आधार पर सरकार के कदम को देखें तो फारूक की पीएसए में गिरफ्तारी जम्मू-कश्मीर के उलझे मसले को और भी पेचीदा बनाएगी। फारूक राज्य पुनर्गठन बिल, 2019 के पारित होने के पहले से ही अपने घर मे नजरबंद हैं। तब से न तो उनकी गतिविधि सामने आई  और न ही कोई बयान। अनुच्छेद 370 के खत्म करने के विरोध में बोलना कोई असंवैधानिक कृत्य नहीं है। यह  व्यक्ति का मौलिक अधिकार है कि वह वैधानिक रूप से किसी की भी आलोचना कर सकता है।
सच तो यह है कि जिस तरह से यह अनुच्छेद शिथिल किया गया है, उसकी प्रक्रिया पर भी सवाल उठा है। सुप्रीम कोर्ट में नेशनल कांफ्रेंस ने असंवैधानिक तरीके से अनुच्छेद 370 को शिथिल करने के संबंध में एक याचिका भी दायर कर रखी है। इस समय सुप्रीम कोर्ट में कुल सात याचिकाएं अनुच्छेद 370 के संदर्भ में चल रही है। फारु क की निरु द्धि के खिलाफ भी एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई है जिस पर अदालत ने सरकार को नोटिस भी जारी किया है। इसी बीच, फारूक को पीएसए के अंतर्गत बंदी बना लिया गया है। उनकी गिरफ्तारी अलगाववादी संगठन हुर्रियत कांफ्रेंस का ही हित पूरा करेगी क्योंकि हुर्रियत के चुनाव बहिष्कार के आह्वान के विरुद्ध फारूक और उनकी नेशनल कांफ्रेंस और महबूबा मुफ्ती और उनकी पीडीपी खड़ी रही है। यह भी तथ्य है कि नेशनल कांफ्रेंस अटल सरकार में उनकी भागीदार थी। चालीस से अधिक कर्फ्यूग्रस्त जम्मू-कश्मीर में फारूक ऐसे नेता हैं, जो न केवल अपना अच्छा खासा प्रभाव रखते हैं, बल्कि उनका और उनकी पार्टी का दृष्टिकोण बराबर भारत की मुख्यधारा के पक्ष में रहा है। अनुच्छेद 370 की समाप्ति के पीछे अगर जम्मू-कश्मीर को जोड़ने का उद्देश्य है तो इतने लंबे समय तक निषेधाज्ञा लागू करना और फारूक जैसे वरिष्ठ और लोकतांत्रिक नेता, जिन्होंने गंभीर आतंकवाद के समय मे भी चुनावी राजनीति में खुल कर भाग लिया और भारतीय संविधान के साथ पूरी पार्टी के साथ खड़े रहे हैं, को पीएसए के तहत निरु द्ध करना जम्मू-कश्मीर को भारत से मनोवैज्ञानिक रूप से और अलग करेगा। जम्मू-कश्मीर विशेषकर कश्मीर घाटी में सदैव तो कर्फ्यू नहीं लगाया जा सकता है और न ही अनंत काल तक गवर्नर शासन रखा जा सकता है। कभी न कभी तो चुनाव होगा ही। केंद्र-शासित राज्य बन जाने के बाद भी तो राज्य की एक विधानसभा रहेगी ही और उसका चुनाव भी होगा। चाहे जब भी कर्फ्यू हटे, एक बार जनाक्रोश उबलेगा और फिर उस समय पुन: यही निषेधाज्ञाएं लगाई जाएंगी और एक कर्फ्यू फिर आक्रोश और फिर कर्फ्यू का लंबा सिलसिला चलेगा। कश्मीर घाटी फिर अशांत होगी और अशांत कश्मीर दुनिया की खबरों में बराबर बना रहेगा। उस समय कश्मीर में कोई भी ऐसा लोकप्रिय और प्रभावशाली नेता भारत सरकार के पक्ष की ओर से खड़ा नहीं होगा जो कश्मीर की जनता के साथ संवाद कर सके। नेतृत्व शून्यता की स्थिति में बातचीत किससे की जाएगी और भारत सरकार की बात पर विश्वास भी कम ही लोग करेंगे।
अनुच्छेद 370 के हटने का पूरा देश चाहे भले ही समर्थन करे पर जम्मू-कश्मीर की जनता ने उसे नकार दिया तो फिर राज्य को सामान्य बनाने में बहुत कठिनाई आएगी। जम्मू-कश्मीर का यह मसला अब केवल कानून व्यवस्था का नहीं रहा और यह कर्फ्यू, सुरक्षा बल आदि के भरोसे हल नहीं किया जा सकता, बल्कि राजनीतिक समाधान ढूंढाना ही होगा। राजनीतिक समाधान के लिए फारूक और महबूबा मुफ्ती, दोनों को विश्वास में लेना होगा क्योंकि कश्मीर में कोई भी फिलहाल ऐसा नहीं है जिसका इन दोनों नेताओं जितना व्यापक प्रभाव हो।  कश्मीर में नया नेतृत्व अभी दूर-दूर तक दिख नहीं रहा। पाकिस्तान, न तो कश्मीर का हित और न ही वहां के मुसलमानों का हित चाहता है। पाकिस्तान को सदैव ऐसा कश्मीर चाहिए जहां उसके आतंकी भी खूनखराबा करते रहें और हमारे सुरक्षा बल भी कानून व्यवस्था के नाम पर कर्फ्यू की कैद बनाए  रखे। इस निरंतर दबाव से वहां की जनता का आक्रोश समझा जा सकता है। एक शांत और समृद्ध जम्मू-कश्मीर पाकिस्तान के उद्देश्य के विपरीत है।


 
 

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