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30 Dec 2017 05:12:31 AM IST
Last Updated : 30 Dec 2017 05:21:43 AM IST

तीन तलाक- समानता की तरफ

जकिया सोमन
तीन तलाक-  समानता की तरफ
तीन तलाक

मुस्लिम महिला (विवाह में अधिकारों की रक्षा) विधेयक-2017 कल लोक सभा से पारित हो गया. भारतीय लोकतंत्र का यह एक महत्त्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक पड़ाव है.

देश में मुस्लिम महिलाओं को पारिवारिक मामलों में क़ानूनी संरक्षण की दिशा में यह अति महत्त्वपूर्ण कदम है. वैसे मुस्लिम महिलाओं के पारिवारिक मामलों और विशेषकर ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर राजनीति और पितृसत्ता का खूब खेल खेला गया है. लेकिन पिछले कुछ वर्षो में खुद मुस्लिम महिलाओं ने ट्रिपल तलाक के खिलाफ मुहीम छेड़ कर इस खेल का पर्दाफाश कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट में याचिका द्वारा साधारण महिलाओं ने बड़ी-बड़ी धार्मिंक, पितृसत्तात्मक एवं राजनैतिक ताकतों को चुनौती दी है.

हैरानी की बात है कि शादी और परिवार से जुड़े मामलों में हमारे देश की मुस्लिम महिलाओं के साथ क़ानूनी भेदभाव होते आए हैं. और यह आजादी के 70 सालों के बाद भी जारी है. देश का संविधान पारिवारिक मामलों में हर नागरिक को मजहब आधारित कानून के अनुसरण की इजाजत देता है. इसी के चलते देश में हिन्दू मैरिज एक्ट, 1955; हिन्दू सक्सेशन एक्ट, 1956 और क्रिश्चियन मैरिज एक्ट जिसमें 2000 में संशोधन हुआ जैसे कानून लागू हैं. इन सभी कानूनों में संसद ने लगातार सुधार किये हैं ताकि जेंडर जस्टिस का मकसद हासिल हो सके. दूसरी ओर, देश के मुसलमान समाज में शरीअत एप्लीकेशन एक्ट, 1937 यानी की अंग्रेज सरकार के ज़माने का कानून लागू है और इसमें आज तक कोई सुधार या संशोधन नहीं हुआ है. इसी वजह से ट्रिपल तलाक, निकाह हलाला एवं बहुपत्नीत्व जैसी स्त्री विरोधी प्रथाएं चलती आई हैं.

इंसाफ के कुरानी आयामों और सांविधानिक उसूलों के बावजूद मुस्लिम महिला के साथ खुलेआम नाइंसाफी होती आई है. पुरुषवादी मानसिकता के धार्मिंक संगठनों के वर्चस्व के चलते मुस्लिम महिलाओं को उनके हकों से वंचित रखा गया है. ये ऐसी पित्तृसत्तात्मक  साजिश है, जिसमें धार्मिंक संगठनों के अलावा राजनीतिक वर्ग भी पूरी तरह से शामिल रहा है. इसमें कोई पॉलिटिकल पार्टी दोषी नहीं है. मौजूदा विधेयक को इस रौशनी में समझने की जरूरत है.

ट्रिपल तलाक की याचिका 2016 में सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई. लेकिन इससे पहले लम्बे अरसे से मुस्लिम महिलाएं कानून की गुहार लगाती आई हैं. हमने लगातार कहा है कि कानून हमारी जरूरत ही नहीं, बल्कि हमारा संवैधानिक अधिकार भी है. दिसम्बर 2012 में मुंबई में मुस्लिम महिलाओं के राष्ट्रीय अधिवेशन में हमने ट्रिपल तलाक के खात्मे का आह्वान किया था और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को खत भी लिखा था. इसमें मुस्लिम महिलाओं के संरक्षण के लिए कानून बनाना जरूरी बताया था. तत्कालीन उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी से भी हमारे प्रतिनिधिमंडल ने दिल्ली में मुलाकात एवं बैठक भी की थी. उसके बाद से लेकर मुस्लिम महिलाएं इंसाफ के लिए लगातार आंदोलनरत हैं. तो जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, देश में ट्रिपल तलाक के खिलाफ एक आम राय बन चुकी थी. शायरा बानो अब 1986 की शाह बानो की तरह अकेली नहीं थी, उसे न केवल देश की मुस्लिम महिलाएं बल्कि समूची महिला आबादी का साथ मिला था. यह कहना अतियुक्ति नहीं होगा कि इसी महिला समन्वय के चलते सुप्रीम कोर्ट का फैसला संभव हो सका वरना सांविधानिक प्रावधान तो हमेशा से मौजूद थे!

विधेयक लाने के लिए केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार की कोशिश सराहनीय है. साथ ही, कांग्रेस पार्टी और अन्य विपक्ष द्वारा कानून का समर्थन दिया जाना भी सराहनीय है. यह तालमेल भी एक ऐतिहासिक घटना है. लगता है कि राजनीतिक वर्ग को मुस्लिम महिलाओं के प्रति किये गए अन्याय का एहसास है. या फिर ये केवल राजनीतिक गिनती हो सकती है, यह तो वक्त ही बताएगा. लेकिन मुस्लिम महिलाओं के लिए 1947 से लेकर पहली बार क़ानूनी समानता का मौका हाथ आया है. खुशी की लहर का संदर्भ यही है.


ट्रिपल तलाक को सुप्रीम कोर्ट ने अवैध करार दिया है, लेकिन उसके बावजूद ट्रिपल तलाक के मामले सामने आ रहे हैं. यह दर्शाता है कि एक स्पष्ट व सक्षम कानून की जरूरत बनी हुई है. इस विधेयक के मुताबिक यदि कोई पति अपनी पत्नी को ट्रिपल तलाक यानी तलाक-ए-बिदत देता है तो इसे क़ानूनी जुर्म माना जायेगा. यह गैरजमानती संज्ञेय जुर्म होगा जिसकी सजा तीन साल तक जेल हो सकती है. पीड़िता पत्नी के लिए या खर्ची या भत्ते का प्रावधान है. बच्चे मां के साथ रहेंगे.

इस विधेयक को सांविधानिक जेंडर जस्टिस और लोकतांत्रिक नजरिये से देखा जाना चाहिए. इस विधेयक में दो सुधारों की गुंजाइश जरूर है. पहला यह कि इस विधेयक में तलाक की विधि अंकित करना सही रहेगा. जब ट्रिपल तलाक अवैध है तो यह भी कहा जाना चाहिए कि तलाक का सही तरीका क्या होगा. तलाक-ए-एहसान पर आधारित तरीका सटीक होगा. तलाक से पहले कम से कम 90 दिनों तक पति-पत्नी में संवाद, सुलह, मध्यस्थता की कोशिश हो. हिन्दू मैरिज एक्ट में तलाक से पहले 6 महीने की कुलिंग पीरियड क़ानूनी शर्त है. मुस्लिम शादी में भी इसका प्रावधान सही रहेगा. 90 दिनों के बाद भी अगर सुलह नहीं होती है और तलाक की नौबत आती है तो फिर पत्नी के लिए घर, खर्ची, बच्चों की सरपरस्ती उसे मिलनी चाहिए.

दूसरा यदि पति कानून का उल्लंघन करता है तो उसे सजा ज़रूर मिले. लेकिन उसका जुर्म हो और केस दर्ज कराने का हक पत्नी का हो. वे चाहें तो केस दर्ज करवाए और कोर्ट पति को जेल या अन्य सजा दे; चाहे तो इसे गैर-जमानती जुर्म बनाया जाए. इस सुधार से कानून के दुरुपयोग की आशंका नहीं रहेगी. विधेयक का मकसद जेंडर जस्टिस है और गुनहगार को सजा दिलाना भी. कानून का अमल सही होने से एवं सजा के डर से ही अपराध कम हो सकता है. अब क्या इस कानून को महज इसलिए ठुकरा दिया जाए कि यह बीजेपी सरकार की पहल का नतीजा है. यह तो मुस्लिम महिलाओं के साथ सरासर ज्यादती होगी और लोकतंत्र का मजाक बनाना होगा.


 
 

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