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19 Nov 2013 12:10:57 AM IST
Last Updated : 19 Nov 2013 12:16:17 AM IST

‘आप’ के आगे चुनौतियों के पहाड़

‘आप’ के आगे चुनौतियों के पहाड़

देश को दीमक की तरह चाटने वाले भ्रष्टाचार के नाश के लिए सक्षम नेतृत्व की तलाश है.

शायद, इस शून्य को केजरीवाल टीम भरने में समर्थ हो. केजरीवाल का व्यक्तित्व गांधीवादी विचारों से तो प्रभावित है, लेकिन उनमें तानाशाही प्रवृत्ति की झलक भी दिखती है. जो हो, उनमें विस्तारवादी, अतिवादी व सुनिश्चितावादी प्रवृत्ति का समावेश है, जो भारतीय समकालीन राजनीति के लिए कारगर साबित हो सकता है.

भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक व भौगोलिक बनावट बहुत जटिल है. यहां राजनीति के रास्ते बहुत टेढ़-मेढ़े हैं जो सुधारवादी जन आंदोलनों में जुटे लोगों के व्यक्तित्व पर खरे नहीं उतरते. दूसरी ओर देश विकास के अर्ध शिखर पर है. एक तरफ गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, किसानों की बदहाली, कमरतोड़ मंहगाई व भ्रष्टाचार है तो दूसरी ओर अलगाववादी, आतंकवादी व नक्सलवादी ताकतें देश की एकता-अखंडता व सुरक्षा को तार-तार करने में जुटी हैं.  बजट घाटा बढ़ता जा रहा है, मुद्रा का अवमूल्यन हो रहा है. यानी हर मोर्चों पर सरकार विफल दिख रही है.

राजनीतिक मगरमच्छों की जमात में केजरीवाल टीम आम आदमी को कहां तक पहुंचाती है, नहीं कहा जा सकता, लेकिन फिलहाल केजरीवाल टीम के पास वृहद राजनीतिक व आर्थिक एजेंडा नहीं है और न देश को विभिन्न समस्याओं से निजात दिलाने की कारगर योजना. इस दिशा में आम आदमी पार्टी को बहुत कार्य करना बाकी है. कहने को देश की हर पार्टी आम आदमी और जनहित की बात कर रही है. आम आदमी को जमीन से उठाकर खड़ा करने के लिए अनेक सुधारवादी आंदोलन भी चलाये गये हैं लेकिन पिछले 67 सालों से राजनीति के क्षेत्र में भारतीय प्रजातंत्र का परिवारवाद व राजशाहीकरण कर दिया गया है. इसलिए भारत की शीर्ष राजनीति में युवराजों और राजकुमारों का बोलबाला दिखता है. और आम आदमी के भी इन सामंती सियासी दलों में अपने-अपने घरौदें बने हुए हैं.  

केजरीवाल की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह इन घरौंदों से आम आदमी को कैसे बाहर लायें. दूसरी चुनौती आम आदमी की निर्णय क्षमता और सत्ता पर नियंत्रण की है, जिसे केजरीवाल व्यवस्था परिवर्तन की संज्ञा दे रहे हैं. प्राचीन काल में मुखिया, चौधरी, सरपंच आदि पदों पर शक्तिशाली सामंती प्रवृत्ति के लोगों का वर्चस्व रहा है और  गांव व शहर की राजनीति पर अब भी सबल परिवारों का ही बोलबाला है. भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में जहां शिक्षा साधनों एवं समझ का न्यूनतम स्तर है और वाद-विवादों की पराकाष्ठा है, निचले यानी ग्राम पंचायत स्तर पर नीतिगत निर्णय लेना संभव नहीं है.

यह मॉडल स्विजरलैंड जैसे शिक्षित व विकसित देशों में पूर्णत: असफल रहा है. भारतीय लोकतंत्र विकास की प्रक्रिया से गुजर रहा है, यहां जनमानस इस तरह के प्रयोग के लिए तैयार नहीं और प्रबुद्ध वर्ग भी आम आदमी के प्रयोग की इजाजत नहीं देता है. भ्रष्टाचार के मुद्दे से केवल 3.5 प्रतिशत मतदाता प्रभावित हो सकते हैं, व्यवस्था परिवर्तन नहीं किया जा सकता. इसलिए केजरीवाल टीम को अपने विजन और लक्ष्य को विस्तार देने की आवश्यकता है. भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन मुठ्ठीभर आक्रोशित मध्यवर्गीय युवाओं पर टिका है. जब तक इसको विस्तार और समग्र रूप नहीं दिया जाएगा, तब तक राजनीति में प्रभावकारी परिणाम मुश्किल है. वोट, धनबल और दांवपेंच की राजनीति में व्यापक चुनाव सुधारों की आवश्यकता है.

सच यह है कि गांव या शहर का जनमानस कितना ही भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का समर्थक क्यों न हो, लेकिन चुनाव के समय अपने आकाओं को छोड़ने को तैयार नहीं होगा. किसान किसान नेताओं, दलित दलित नेताओं, अल्पसंख्यक अल्पसंख्यक नुमाइंदो का समर्थन करते दिखेंगे. कुछ कसर बाकी रह जाएगी तो 500 और 1000 के नोटों में वोटों का सौदा ठेकेदारों के सहयोग से आसानी से तय हो जायेगा. सत्ता के शिखर पर पहुंचने में फिर भी कोई अड़चन बाकी रह जाए तो विधायकों-सांसदों की भेड़-बकरियों की तरह खरीद-फरोख्त हो जाएगी. यानी वृहद न्यायिक और चुनाव सुधारों की महती आवश्कयता है.

केजरीवाल के आर्थिक विकास का एजेंडा मुक्त और उदारवादी बाजार व्यवस्था से परे समतावादी विचारधारा और आखिरी आदमी की आवश्यकता पर टिका है. लेकिन यह मॉडल दुनिया के किसी भी देश में सफल नहीं हो सका है. दूसरी ओर, अधिक निवेश के तर्क व बड़े घरानों और उद्योगों पर आधारित मुक्त बाजार व्यवस्था का सिद्धान्त भी वर्ग विशेष के लिए व्यवस्थित पूंजीवाद को जन्म देता है. पश्चिमी और यूरोपीय देशों में यह आर्थिक मॉडल भी ध्वस्त होता दिखता है.

यूरोप में मंदी का आलम यह है कि स्पेन, टर्की, ग्रीक जैसे देश भुखमरी की कगार पर हैं.  आखिरी आदमी की जरूरत ग्राम, मोहल्ला, पंचायतों की अर्थनीति भारत को प्राचीन काल में तो ढकेल सकती है, लेकिन प्रगतिशील शक्तिशाली भारत का निर्माण नहीं कर सकती. इसके उलट चीन के समकालीन मॉडल वाली सेवा प्रधान तकनीक पर आधारित लघु उद्योग और अनुशासित बड़े उद्योगों की समन्वित नीति से नई आर्थिक क्रान्ति को जन्म दिया जा सकता है.

आम आदमी पार्टी के राजनीतिक भविष्य को लेकर विश्लेषकों की अलग-अलग राय है, क्योंकि यह अभी शैशवकाल में है. पार्टी के प्रमुख विचारक योगेन्द्र यादव कहते हैं कि हमारी पार्टी बाध्यकारी शक्ति के रूप में जरूर उभरेगी ताकि मुख्यधारा के दलों पर दबाव बन सके और वे राष्ट्रीय मुद्दों पर फोकस कर सकें. पार्टी का सीमित राजनीतिक एजेंडा है, अत: वृहद राजनीतिक एजेंडे के साथ बड़े निर्णायक आंदोलन तथा लक्ष्य तक पहुंचना जरूरी है. आज देश को ऐसी पार्टी और कानून की जरूरत है जो देश के लुटेरों को सींखचों के अंदर घसीट उनकी अरबों-खरबों की सम्पत्ति जब्त कर आम-आदमी तथा देश के हित में लगा सके. अत: युवा पीढ़ी को जाति, धर्म, सम्प्रदाय, लिंग-भेद, क्षेत्रवाद से उठकर भ्रष्ट और अपराधी तत्वों का बहिष्कार करना चाहिए तथा परिवर्तन के लिए उठ खड़ा होना चाहिए, तभी हम आधुनिक भारत का सपना साकार कर सकते हैं.

यह समय प्रयोगवाद का नहीं है. इस समय जनता को संगठित, समन्वित व प्रेरित कर व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्ष जरूरी है. न भूलें कि सत्ता की सीढ़ियां घोर भ्रष्टाचार की राह पर ले जाती हैं. अन्ना हजारे का मानना भी यही है.  इसलिए वह  राजनीति से अलग-थलग केवल भ्रष्टाचार उन्मूलन की मुहिम के साथ व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्षरत हैं. फिर भी केजरीवाल और उनकी पार्टी दिल्ली की तमाम जनविरोधी पाटियों से बेहतर प्रतीत होती है.


डॉ राजवीर सिंह
लेखक
 

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