अपने आप नहीं आ रही, बुलाई जा रही हैं आपदाएं!

Last Updated 29 Jun 2013 03:48:47 AM IST

भू-वैज्ञानिकों का स्पष्ट मत है कि पहाड़ों में आपदाएं स्वयं नहीं आ रही हैं, वरन बुलाई जा रही हैं.


अपने आप नहीं आ रही, बुलाई जा रही हैं आपदाएं!

दैवीय आपदा के बारे में जहां धारी देवी की मूर्ति को उनके स्थान से हटाने और प्रदेश में बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं बनाने जैसे अनेक कारण गिनाए जा रहे हैं, वहीं भू-वैज्ञानिकों का स्पष्ट मत है कि आपदाएं स्वयं नहीं आ रही हैं, वरन बुलाई जा रही हैं. आपदा मनुष्य के पास नहीं आ रहीं, वरन मनुष्य आपदा के पास स्वयं जा रहा है. दूसरे विश्व में बहुचर्चित ग्लोबल वार्मिग का सर्वाधिक असर पहाड़ों पर हो रहा है.

भू-वैज्ञानिकों पद्मश्री प्रो. खड़ग सिंह वल्दिया और गढ़वाल विवि के पूर्व कुलपति प्रो. एसपी सिंह के अनुसार करीब दो करोड़ वर्ष पुराना हिमालय दुनिया का युवा पहाड़ कहा जाता है. अपने दौर के महासमुद्र टेथिस की कमजोर बुनियाद पर जन्मा हिमालय आज भी  युवाओं की तरह ऊंचा उठ रहा है. उन्होंने बताया कि भारतीय भू-प्लेट हर वर्ष करीब 55 मिमी की गति से उत्तर दिशा की ओर बढ़ रही है.

ऐसे में ऊंचे उठते पहाड़ अपने गुरुत्व केंद्र को संयत रखने की कोशिश में अतिरिक्त भार को नीचे गिराते रहते हैं. दूसरी ओर पानी अपनी प्रकृति के अनुसार इसे नीचे की ओर मैदानों से होते हुए समुद्र में मिलाता रहता है. ऐसे में ऊंचे उठते पहाड़ों और नीचे की ओर बहते पानी के बीच हमेशा से एक तरह की जंग चल रही है, और पहाड़ कमजोर होते जा रहे हैं.

नदियों के किनारे की रेत, राख, कंकड़-पत्थर व बालू आदि की भूमि पर अच्छी कृषि होने के साथ ही इसके कमजोर होने और कम श्रम से ही कार्य हो जाने के लालच में पहाड़ पर अधिकतर सड़कें नदियों के किनारे ही बनाई जाती हैं. सड़कों से पानी को हटाने का प्रबंध भी नहीं किया जाता, इस कारण यहां लगातार पानी के रिसते जाने और वाहनों के भार से भूस्खलन होते जाते हैं. 

सड़कों के किनारे ही बाजार, दुकानें आदि व्यापारिक गतिविधियां विकसित होती हैं.  यहां तक कि नदियों के पूर्व में रहे प्रवाह क्षेत्रों में भी भवन बन गए हैं. और गत दिनों आई जल पल्रय में देखें तो सर्वाधिक नुकसान नदियों के किनारे के क्षेत्रों और सड़क के नदी की ओर के भवनों को ही पहुंचा है.

प्रो. खड़ग सिंह वल्दिया का कहना है कि पहाड़ पर अतिवृष्टि, भूस्खलन और बाढ़ का होना सामान्य बात है, लेकिन इनसे होने वाला नुकसान इस बात पर निर्भर करता है कि वह कितनी बड़ी आबादी के क्षेत्रों में होता है. आबादी क्षेत्रों में निर्बाध रूप से निर्माण हो रहे हैं. सरकार जियोलॉजिकल सव्रे आफ इंडिया की रिपोटरे की भी अनदेखी करती रही है.

नदियों के छूटे पाटों में यह भुलाकर भवन बन गए हैं कि वह वापस अपने पूर्व मार्ग (फ्लड वे) में नहीं लौटेंगी. लेकिन इस बार ऐसा ही हुआ, और अकल्पनीय नुकसान हुआ. वहीं केदारनाथ मंदिर इस लिए बच गया कि यह मंदाकिनी नदी के पूर्वी और पश्चिमी पथों के बीच ग्लेशियरों द्वारा छोड़ी गई जमीन-वेदिका (टैरेस) पर बना हुआ है, जबकि अन्य निर्माण नदी के पूर्व पथों पर बने थे.

वहीं प्रो. एसपी सिंह का मानना है कि ग्लोबल वार्मिग का सर्वाधिक प्रभाव ऊंचे पहाड़ों पर पड़ता है. क्योंकि मैदानों की ग्रीन हाउस गैसें व ब्लैक कार्बन आदि हवा से हल्के होने के कारण ऊपर उठते हैं और पहाड़ों पर मौसम को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं. मौसम का यह परिवर्तन यहां ‘एक्सट्रीम इवेंट’ यानी बेमौसमी और अत्यधिक वष्रा, ठंड, सूखा आदि के रूप में दिखाई देता है.

नवीन जोशी
एसएनबी


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