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02 Aug 2020 12:01:26 AM IST
Last Updated : 02 Aug 2020 12:03:09 AM IST

वर्चुअल वार के रियल खतरे

उपेन्द्र राय
सीईओ एवं एडिटर इन चीफ
वर्चुअल वार के रियल खतरे
वर्चुअल वार के रियल खतरे

अमेरिका और चीन के रिश्ते क्या इतने बिगड़ गए हैं कि तीसरा विश्व युद्ध अब कोरी कल्पना नहीं, बल्कि बड़ी मुश्किल से टलने वाली एक खतरनाक संभावना बन गया है?

इस बार मामला इसलिए गंभीर दिख रहा है, क्योंकि दोनों ओर से इस खतरे को टालने की कोई कोशिश भी नहीं दिख रही है। अमेरिका डाल-डाल, तो चीन पात-पात। लंबे समय से सुलग रही तनाव की आग को कोरोना वायरस के विवाद और अमेरिका के चुनावी साल ने और विकराल बना दिया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने देश में कोरोना से बिगड़े हालात के लिए बार-बार न केवल चीन को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, बल्कि इस हिमाकत का नतीजा भुगतने के लिए चीन को धमका भी रहे हैं। इसकी आड़ में ट्रंप चीन से मिले ‘गिफ्ट’ में अमेरिकी चुनाव को आगे शिफ्ट करने का मौका भी तलाश रहे हैं। जिस देश में साल 1864 में हुआ गृह युद्ध भी चुनाव नहीं टाल पाया हो, जहां दोनों विश्व युद्ध के दौरान भी चुनाव तय समय पर हुए हों, जहां साल 2004 में 9/11 के आतंकी साए के बावजूद मतदान हुआ हो, ऐसे अमेरिकी स्वाभिमान से समझौता करने और इसके लिए चीन को इस्तेमाल करने की ट्रंप की कोशिश बताती है कि हालात अपने पक्ष में करने के लिए वो किस हद तक जा सकते हैं। हालांकि यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि जब भी युद्ध काल में अमेरिका में चुनाव हुआ है, तब मौजूदा राष्ट्रपति को कभी हार का मुंह नहीं देखना पड़ा है, लेकिन क्या अमेरिकी मतदाताओं से अपनी कैमिस्ट्री सुधारने के लिए ट्रंप समूची दुनिया का भूगोल बिगाड़ने का खतरा भी मोल ले सकते हैं? ट्रंप को जानने-समझने वाले भी यही कहेंगे कि इसका जवाब तो खुद ट्रंप के पास भी नहीं मिलेगा। यही हाल चीन के आसमान में अमेरिका के लड़ाकू और टोही विमानों की दस्तक से जुड़े सवाल का है। अमेरिकी विमानों का शंघाई से महज 77 किलोमीटर दूर तक उड़ान भरने का मकसद क्या था? क्या यह विमान वहां ‘सैर’ करने गए थे या फिर ट्रंप चीन से चल रहे ‘बैर’ का हिसाब बराबर करने की जल्दी में हैं? एक अमेरिकी थिंक टैंक के हवाले से यह जानकारी भी सामने आई है कि इन विमानों को एक अमेरिकी युद्धपोत कवर दे रहा था यानी चीन अगर कोई पलटवार करता तो उसे उसका तुरंत जवाब भी मिल जाता। कौन जानता है कि अगर चीन ने पलटवार कर ही दिया होता, तो यह किसी युद्ध का फ्लैशप्वाइंट भी बन सकता था।

अमेरिका और चीन के बीच बार-बार युद्ध की नौबत आना और फिर इसका टल जाना कितना रियल है या फिर कितना वर्चुअल, इसकी वजह का पता लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है। अमेरिका से ऐसी खबरें आ रहीं हैं, जो काफी हद तक सही भी लगता है, कि ट्रंप चुनाव प्रचार में पिछड़ रहे हैं और बाजी पलटने के लिए उन्होंने चीनी कार्ड खेला है। चार साल पहले भी ट्रंप ने रूस की पीठ पर चढ़कर चुनाव जीता था। अमेरिकी सर्वेक्षण एजेंसी गैलप की जुलाई की रेटिंग बताती है कि बगदादी को मारने से ट्रंप को फायदा मिला था, लेकिन कोरोना से निपटने की नाकामी के कारण ट्रंप की लोकप्रियता ने छह फीसद का गोता लगाया है। ये नाकामी इतनी बड़ी बताई जा रही है कि वियतनाम की असफलता भी इसके आगे छोटी दिखने लगी है। वियतनाम से लड़ाई में अमेरिका के 58 हजार सैनिक मारे गए थे, लेकिन कोरोना इससे भी ज्यादा अमेरिकियों को निगल चुका है। बना-बनाया खेल बिगड़ने से परेशान ट्रंप चीन को खलनायक बनाकर अपनी जीत की राह आसान करना चाहते हैं, लेकिन अमेरिकी वोटरों में ऐसे लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है जो इसके लिए ट्रंप की लापरवाही को जिम्मेदार मानते हैं। हालांकि इस मसले पर आम अमेरिकी भले ही बाइडेन और ट्रंप में बंटे हुए हों, लेकिन चीन से नाराजगी पर पूरा मुल्क एक है। दक्षिण चीन सागर में दोनों देशों का युद्धाभ्यास, वाणिज्य दूतावासों की तालाबंदी, और ट्रेड वॉर का तनाव इस नाराजगी को और बढ़ा रहा है। अलग-अलग वजहों से  ईरान, ब्राजील, जापान, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, जर्मनी और यूरोपीय संघ के साथ आसियान देशों में भी चीन को लेकर गुस्सा है।

चीन से नाराज वैश्विक समूह की वजनदारी इस वजह से भी काफी ज्यादा बढ़ जाती है कि भारत भी इस समूह में शामिल है। सीमा विवाद को लेकर भारत में भी चीन के खिलाफ माहौल बना हुआ है। चीन को आर्थिक चोट पहुंचाने के लिए भारत ने कई कदम उठाए हैं, जिससे चीन झल्लाया हुआ है। राफेल के आने से जिस तरह सैन्य संतुलन बदला है, उसने चीन की झल्लाहट को और बढ़ा दिया है, लेकिन असली खतरा चीन की खामोशी को लेकर है। चीन साम, दाम, दंड, भेद वाली रणनीति से चुपचाप अपनी ताकत को लगातार बढ़ाता रहता है। इसलिए अमेरिका की ओर से इतनी तीखी बयानबाजी के बावजूद अगर चीन पलटबयानी नहीं कर रहा है तो यह दुनिया के लिए राहत नहीं, बल्कि खतरे का अलर्ट माना जाना चाहिए। जिस इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से अमेरिका की आर्थिक और सामरिक सुरक्षा जुड़ती है, उसके इस ओर चीन युद्धपोत और लड़ाकू विमान तैनात कर इस सुरक्षा पर लगातार दबाव बढ़ाता जा रहा है। पेंटागन की हालिया रिपोर्ट ने इस क्षेत्र में अमेरिका की सामरिक तैयारियों को और दबाव में ला दिया है। पेंटागन का अनुमान है कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन अब अमेरिका से बड़ी ताकत बन चुका है और साल 2030 तक दोनों देशों के बीच अगर कोई युद्ध होता है, तो अमेरिका का जीतना आसान नहीं होगा। इस वजह से भी अमेरिका ने अब चीन की सैन्य ताकत के साथ-साथ उसकी आर्थिक ताकत पर हमला तेज किया है।

साल 2008 में ग्लोबल मंदी के बाद चीन ने दूसरे देशों में काफी पैसा निवेश किया है। इससे देश के बाहर उसकी ट्रेड पावर तो बढ़ी है, लेकिन साथ ही इन देशों से रिश्ते बनाकर रखने की मजबूरी भी बढ़ी है। इनमें से कई देश अब पाला बदल चुके हैं और अमेरिका इन्हें चीन का आर्थिक बॉयकॉट करने के लिए उकसा रहा है। शीत युद्ध के दौरान रूस के खिलाफ यही रणनीति अपनाकर अमेरिका दुनिया का ‘दादा’ बन गया था। बदले माहौल में चीन के खिलाफ यह रणनीति कितना काम करेगी, यह वक्त बताएगा। वैसे भी चीन इतना चालाक है कि अमेरिकी रणनीति के जवाब में वो अपनी बेल्ट एंड रोड परियोजना को जल्द-से-जल्द पूरा कर लेना चाहता है, ताकि अगर अमेरिका उसके समुद्री रास्ते बंद भी कर दे तो भी व्यापार के लिए एक वैकल्पिक रास्ता खुला रहे। यानी बात वही है अमेरिका डाल-डाल, तो चीन पात-पात।

विस्तारवाद से लेकर व्यापारिक एकाधिकारवाद के लिए चीन की ऐसी तैयारी केवल अमेरिका ही नहीं, बाकी दुनिया के लिए भी चुनौती बनती जा रही है। इसीलिए फिलहाल पूरी दुनिया में इस बात की चिंता है कि एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ कहीं  अमेरिका और चीन को एक-दूसरे के सामने लाकर खड़ा न कर दे, क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो फिर कोई भी देश हाथ-पर-हाथ धरे चैन से नहीं बैठ पाएगा।


 
 

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