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18 Jan 2020 01:11:43 AM IST
Last Updated : 18 Jan 2020 01:32:23 AM IST

शांति का विश्वदूत बने भारत

उपेन्द्र राय
सीईओ एवं एडिटर इन चीफ
शांति का विश्वदूत बने  भारत
शांति का विश्वदूत बने भारत

सवा सौ साल पहले दुनिया में अमन-चैन की दुआ भारत की जमीन से ही निकली थी। उस दौर में स्वामी विवेकानंद ने दुनिया को शांति का संदेश दिया था। दोबारा सत्ता में लौटने के बाद पिछले साल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र के मंच से भारत की उस पहचान को दुनिया से साझा किया था। प्रधानमंत्री ने दुनिया को याद दिलाया था कि भारत ने मानवता को युद्ध नहीं, बुद्ध दिए हैं। आज के दौर में बुद्ध भले न लौटें, युद्ध का खतरा जरूर लौटा है। मानवता आज फिर संकट में है, और दुनिया की नजरें एक बार फिर भारत पर टिकी हैं

विश्व शांति सैद्धांतिक रूप से भले संभव हो, इसे व्यावहारिक जामा पहनाना बड़ी चुनौती रहा है। आम तौर पर इसके पीछे मान्यता है कि मानव प्रकृति स्वाभाविक तौर पर इसे रोकती है क्योंकि मनुष्य प्राकृतिक रूप से हिंसक है। लेकिन यही सच है तो फिर हिंसा न करने की वह शपथ क्या थी, जिसने भारत महान को न केवल आजाद जहान बनाया, बल्कि समूची मानवता को शांति का पाठ भी पढ़ाया। दुनिया आज एक बार फिर उसी मुहाने पर खड़ी है, जहां इतिहास के उन्हीं पुराने पन्नों से सबक लेने की जरूरत आन पड़ी है। मिडिल ईस्ट में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव से विश्व युद्ध का खतरा पैदा हो गया है। ऐसे में मानवता को तबाही से बचाने के लिए एक बार फिर भारत से ही शांति का विश्वदूत बनने की उम्मीद लगाई जा रही है।

इसकी सबसे बड़ी उम्मीद तो वही दोनों देश कर रहे हैं, जिन्होंने दुनिया को निराशा में झोंकने का काम किया है। अमेरिका और ईरान आज पुरानी दुश्मनी को नये सिरे से याद कर रहे हैं। हालांकि राहत की बात यह है कि वह भारत के साथ अपने पुराने रिश्तों को नजरअंदाज भी नहीं कर रहे हैं। रायसीना डायलॉग में हिस्सा लेने आए ईरान के विदेश मंत्री जावेद जरीफ ने खाड़ी क्षेत्र में तनाव कम करने के लिए भारत की हिस्सेदारी को काफी अहम बताया है। जरीफ से पहले भारत में ईरान के राजदूत भी भारत की शांति की कोशिशों के समर्थन की बात कह चुके हैं। दूसरी तरफ बदले हालात में अमेरिका को भी भारत की यह पहल सुकून दे रही है।

दुनिया के मौजूदा राजनीतिक संतुलन को देखने पर भारत की अहमियत और साफ हो जाती है। विश्व शक्तियों पर नजर डालें तो रूस और चीन से अमेरिका के रिश्ते सामान्य नहीं हैं। यूरोपीय यूनियन भी हाल-फिलहाल की घटनाओं के बाद उतना मजबूत नहीं रहा। अमेरिका के लिए झटके वाली बात यह भी है कि सुलेमानी की हत्या के बाद इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस जैसे उसके परंपरागत समर्थकों में से किसी ने भी खुलेआम तो छोड़िए, दबी जुबान में भी अमेरिका का खुलकर समर्थन नहीं किया।

भारत बन सकता है धुरी
दरअसल, अमेरिका और ईरान के बीच भारत के शांति की धुरी बनने के पीछे कई वजहें हैं। दोनों ही देशों से भारत के दशकों पुराने आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। बंटवारे से पहले 14 अगस्त, 1947 तक तो ईरान भारत का पड़ोसी ही था। सात दशक बीत जाने के बाद भी दोनों पड़ोसी धर्म को अच्छे से निभा रहे हैं। एक के मुश्किल में पड़ने पर दूसरा या तो मदद के लिए आगे आता है, या फिर तटस्थ रहता है। युद्ध के मैदान में भारत बनाम पाकिस्तान और ईरान बनाम इराक इसकी मिसालें हैं।

ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद से लेकर अब तक अमेरिका के सख्त रवैये के बावजूद दोनों देशों के बीच रिश्ते काफी मजबूत बने हुए हैं। साल 1990 में अफगानिस्तान से तालिबान को उखाड़ फेंकने के लिए भारत के साथ ही ईरान ने भी नॉर्दर्न अलायंस बनाने का समर्थन किया था। साल 2002 में दोनों देशों के बीच रणनीतिक संधि तक हो गई। बीबीसी के एक सर्वे में तो ईरान के 71 फीसद लोगों ने कहा था कि भारत को लेकर उनकी सोच पॉजिटिव है।

इन सभी के अलावा भारत अपनी जरूरत का करीब 80 फीसद तेल ईरान से ही खरीदता है। ईरान को तेल खरीद की कीमत भारतीय रुपये में अदा करने से भारत को तेल डॉलर की तुलना में सस्ता पड़ता है। भारत ईरान में तेल के अलावा गैस के क्षेत्र में सबसे बड़ा विदेशी निवेशक भी है। 

पाकिस्तान के भारत विरोधी एजेंडे का भी ईरान तीखा आलोचक रहा है। संयुक्त राष्ट्र से लेकर इस्लामिक सहयोग संगठन तक वह भारत के खिलाफ पाकिस्तान की गलतबयानी का विरोध करता रहा है। गर्मजोशी से भरे इस दोस्ताने को नई मजबूती देने के मकसद से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मई, 2016 में ईरान का दौरा किया था। इस दौरान दोनों देशों के बीच कई समझौतों पर हस्ताक्षर हुए थे। इसमें चाबहार पोर्ट भी शामिल है, जो दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत बनाने में मील का पत्थर साबित हुआ है। 

ईरान की तरह अमेरिका से भी भारत के रिश्ते आजादी के पहले से हैं, जो बीते दो दशकों में खासकर पीएम मोदी के कार्यकाल में और भी घनिष्ठ हुए हैं। साल 2015 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का भारत दौरा इस संबंध में बेहद खास मायने रखता है। यह पहला मौका था कि जब कोई अमेरिकी राष्ट्रपति भारत के गणतंत्र दिवस के मौके पर मुख्य अतिथि बना हो। भारत को एनएसजी (न्यूक्लियर सप्लाई ग्रुप) का हिस्सा बनाने की वकालत कर अमेरिका ने संबंधों को और घनिष्ठ बनाने की पहल की। इसकी एक वजह यह भी रही कि चीन के सामने अमेरिका को सबसे बड़ी ताकत भारत ही लगती है। हालांकि चीन की वजह से ही भारत इसमें शामिल नहीं हो सका था।

भारत का साथ दिया अमेरिका ने
भारत ने पाकिस्तान के आतंकियों को वैश्विक आतंकी घोषित करने के लिए यूएन में जो प्रस्ताव रखा था, उसे भी अमेरिका का समर्थन मिला था। पुंछ और पुलवामा के आतंकी हमलों की कड़ी आलोचना और बालाकोट एयर स्ट्राइक और सर्जिकल स्ट्राइक का खुलेआम समर्थन कर अमेरिका ने पाकिस्तान को साफ कर दिया कि किस तरह दक्षिण एशिया में अब उसकी प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं।  

जहां रिश्तों की डोर इतनी मजबूत हो, वहां तनाव के शोर को कम करना भारत के लिए जरूरी भी है, और उसकी जिम्मेदारी भी। इस तनाव ने पहले से ही ग्लोबल मंदी झेल रही दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं को संकट में डाल दिया है। खासकर वे देश जिनकी इकोनॉमी पूरी तरह मिडिल ईस्ट के तेल पर टिकी हैं। भारत और चीन के साथ-साथ रूस और समूचा यूरोपीय संघ भी इसमें शामिल है। तेहरान और वॉशिंगटन, दोनों से ही दोस्ती निभाते हुए भारत को इस अप्रत्याशित घटनाक्रम के बीच मुश्किलों से गुजर रही अपनी अर्थव्यवस्था को बहुत सावधानी से संभालने की चुनौती है। यही कारण है कि दोनों देशों से संयम बरतने की अपील करते हुए भारत ने मध्यस्थता की शुरु आत समझदारी से की है।



दुनिया की चिंताएं अपनी जगह हैं, लेकिन इन सबके बीच भारत को इस संकट में अपनी प्राथमिकताओं पर ज्यादा गौर करने की जरूरत है। तेल की निर्बाध सप्लाई भारत के लिए एक अहम पहलू है। इसके अलावा, खाड़ी क्षेत्र में भारी संख्या में भारतीय कामगार भी मौजूद हैं। हवाई परिवहन के लिहाज से भी मिडिल ईस्ट का शांत हवाई क्षेत्र हमारे लिए जरूरी है। लेकिन इन सबसे बड़ा सवाल है क्षेत्रीय स्थिरता लाने में हमारी भूमिका का। सवा सौ साल पहले दुनिया में अमन-चैन की दुआ भारत की जमीन से ही निकली थी। उस दौर में स्वामी विवेकानंद ने दुनिया को शांति का संदेश दिया था। दोबारा सत्ता में लौटने के बाद पिछले साल प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र के मंच से भारत की उस पहचान को दुनिया से साझा किया था। प्रधानमंत्री ने दुनिया को याद दिलाया था कि भारत ने मानवता को युद्ध नहीं, बुद्ध दिए हैं। आज के दौर में बुद्ध भले न लौटें, युद्ध का खतरा जरूर लौटा है। मानवता आज फिर संकट में है, और दुनिया की नजरें एक बार फिर भारत पर टिकी हैं।


 
 

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