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09 Nov 2019 03:35:13 PM IST
Last Updated : 09 Nov 2019 03:51:12 PM IST

इच्छाशक्ति चाहिए, फॉर्मूले नहीं

उपेन्द्र राय
प्रिंसिपल एडवाइजर, सहारा न्यूज नेटवर्क
इच्छाशक्ति चाहिए, फॉर्मूले नहीं

देश की राजधानी में पहुंच कर या दिल्ली से गुजरते हुए गांवों का अक्खड़पन यादों में सिमट कर रह जाता है। न सर्द दिनों की अलसायी सुबह नजर आती है, न ही सूरज की रोशनी में नहाते बदन को हरारत नसीब होती है। अगर दिल्ली में कुछ मिलता है, तो वह है खुली हवा में घुटन भरी सांसें, धुंध के तेजाब से जलती हुई आंखें और एक ऐसा डर, जो मन में खतरनाक बीमारियों की चिंता सजाता है। यह कोई लच्छेदार शब्दों की चाशनी में डूबी कहानी नहीं है, बल्कि दिल्ली की हकीकत है।

दिल्ली में न तो पराली जलाई जाती है, न ही ईंट भट्ठे चलते हैं। इसके बावजूद पिछले 5 सालों में ठंड के मौसम में जिस तरह प्रदूषण बढ़ा है, उसका कारण है दिल्ली और आसपास की राज्य सरकारों का वह रवैया, जिसने जीवन देने वाले पर्यावरण को वरीयता के अंतिम पायदान पर रख दिया है। 2014 तक दिल्ली में ठंड कुहासे में लिपट कर आती थी। प्रदूषण उस समय भी था, लेकिन एयर क्वालिटी इनडेक्स मास्क लपेट कर इतने बड़े खतरे का अलार्म नहीं बजाता था। 2015 में प्रदूषण का खतरा ऑरेंज अलर्ट तक पहुंच गया और फिर हालात बद से बदतर होते गए।

सवाल है कि प्रदूषण के खतरनाक स्तर पर खड़ी दिल्ली-एनसीआर को सरकार या सरकारी मशीनरी के प्रयासों से कोई उम्मीद दिखती है? जवाब दुखदायी है क्योंकि न तो दिल्ली सरकार का ऑड-ईवन फॉर्मूला इस जवाब की चौखट में समाता है, न ही नये निर्माण कार्यों पर रोक की सख्ती इस जवाब के आसपास फटकती है। आमजन की परेशानियों को लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत पहले भी कई बार सख्ती दिखा चुकी है, लेकिन राजधानी दिल्ली का दम घोंट रही पराली पर उसका हालिया रुख ऐतिहासिक है। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए केवल किसानों को ही नहीं, बल्कि हरियाणा और पंजाब के अफसरों को भी उनकी लापरवाही पर फटकार लगाते हुए जिम्मेदार ठहराया है।

जब नौबत हेल्थ इमरजेंसी की आ जाए तो यह सख्ती जायज ही नहीं, जरूरी भी हो जाती है। पिछले कुछ साल से सर्दियों के आगाज के साथ दिल्ली पर पराली की गाज गिरना नियमित प्रक्रिया बन चुका है, इसके बावजूद इसकी रोकथाम के लिए जमीन पर कोई तैयारी नहीं दिखती। वायु प्रदूषण पर नजर रखने वाले एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स और शिकागो यूनिवर्सिटी के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट की ताजा स्टडी में कहा गया है कि उत्तर भारत में खराब हवा के कारण सामान्य इंसान की जिंदगी करीब 7.5 साल कम हो रही है। साल 1998 में यह आंकड़ा 3.7 साल था।

एनसीआर में बढ़ता गया पराली का दायरा

इसमें कोई संदेह नहीं है कि साल-दर-साल दिल्ली समेत पूरे एनसीआर में पराली ने अपना दायरा बढ़ाया है। यह भी सच है कि समूचे देश में प्रदूषण का भी विस्तार हुआ है। ग्रीन पीस की रिपोर्ट बताती है कि वायु प्रदूषण की सबसे ज्यादा मार झेल रहे दुनिया के 30 शहरों में 22 अकेले भारत से हैं, और दिल्ली दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी बन चुकी है। बेशक, आंकड़ों की बिसात पर देश के ये हालात रातों-रात नहीं बने हैं। नदियों से लेकर पहाड़ों तक और महानगरों से छोटी बसाहटों तक प्रदूषण कम-ज्यादा रफ्तार से लगातार अपने पैर पसारता जा रहा है। चिंता की बात यह है कि जिस सवाल से हमारा देश दो-चार हो रहा है, वो पूरी दुनिया के लिए भी पहेली बन चुका है।

  • स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2019 के अनुसार वायु प्रदूषण दुनिया भर में हो रही मौतों की पांचवीं सबसे ब़ड़ी वजह बन चुका है। दुनिया में हो रही हर दसवीं मौत में से एक के लिए अकेले वायु प्रदूषण जिम्मेदार है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि वायु प्रदूषण हर साल 70 लाख जिंदगियां लील जाता है यानी हर घंटे 800 और हर मिनट 13 मौत।
  • दुनिया के तीन हजार शहरों में शोध के बाद ग्रीन पीस और एयर विजुअल एनालिसिस का दावा है कि इनमें से 64 फीसदी शहरों में प्रदूषण विश्व स्वास्य संगठन के मानकों को पीछे छोड़ चुका है। तस्वीर और भी डराने वाली हो सकती है, क्योंकि अफ्रीका के कई शहरों में प्रदूषण से लड़ना तो दूर, उसे नापने के माकूल इंतजाम तक नहीं हैं।
  • वर्ल्ड बैंक का अनुमान है कि प्रदूषण से हो रही मानव क्षति से दुनिया की अर्थव्यवस्था को सालाना 225 बिलियन डॉलर का नुकसान हो रहा है।

कहा जाता है कि कई बार समस्या का हल समस्या में ही मौजूद होता है। प्रदूषण से निपटने में यह बात बेशक, सौ-फीसदी खरी न उतरती हो, लेकिन लड़ाई का हौसला जरूर देती है। अमेरिका, यूरोप और एशिया में लोगों ने प्रदूषण के खिलाफ छोटे स्तर पर ही सही, लेकिन वो कामयाबियां हासिल की हैं, जो पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन सकती हैं। इंग्लैंड में साल 1952 के ग्रेट स्मॉग ऑफ लंदन के दौरान चार दिन में चार हजार लोग मारे गए थे। इसके बाद वहां कोयले से चलने वाले कारखाने और रेल के इंजन तक बंद कर दिए गए। गाड़ियों से निकलने वाले धुएं के बदले पैसे वसूले गए। 1956 में बना स्वच्छ हवा कानून दूरगामी नतीजे लेकर आया जो अब लंदन की पहचान बन चुका है। आज लंदन के बड़े से बड़े आदमी के लिए ट्यूब ट्रेन की सवारी राष्ट्रीय शर्म नहीं, नेशनल प्राइड का सिंबल माना जाता है। इसी तरह टेम्स नदी एक जमाने में लंदन में बीमारियों की जड़ मानी जाती थी। इस पहचान से पीछा छुड़ाने के लिए टेम्स पर 1958 में जमीन के अंदर 134 किलोमीटर का सीवेज सिस्टम बनाया गया। नदी के समानांतर सड़क व ट्रीटमेंट प्लांट बनाए गए। आज छह दशक बाद भी यह सीवेज सिस्टम कारगर है।

हडसन नदी के लिए लड़ी गई लड़ाई

करीब-करीब इसी कालखंड में टेम्स से 5,500 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर एक और लड़ाई लड़ी गई। यह लड़ाई थी अमेरिका में न्यूयॉर्क के पूर्वी हिस्से में बहने वाली हडसन नदी के लिए। साल 1947-1977 के बीच कारखानों से निकले औद्योगिक कचरे से हडसन नदी सीवर का गंदा नाला बन गई थी। प्रदूषण और बदबू से लोग नदी से दूर रहने लगे। लेकिन नदी का यह दर्द हडसन के मछुआरों से नहीं देखा गया। उन्होंने वकीलों के साथ मिलकर रिवरकीपर टीम बनाई जिसने अमेरिका की अदालत में पहली बार पर्यावरण का कानूनी मुकदमा दायर किया।

हडसन नदी भारत की गंगा या नर्मदा जैसी बड़ी नदी नहीं है। इसकी लंबाई भी केवल 507 किलोमीटर है। फिर भी पूरा अमेरिका इसे बचाने के लिए अदालत से लेकर सड़कों तक पर उतर आया। इसी संघर्ष के दौरान ‘वी शैल ओवरकम’ (हम होंगे कामयाब) जैसे कालजयी गीत की रचना हुई, जो आज दुनिया भर में उम्मीद का एंथम बन चुका है। आज हडसन का पानी इतना साफ है कि बिना फिल्टर किए सीधे न्यूयॉर्कवासियों के घरों में सप्लाई होता है। लेकिन मिसाल सिर्फ इतनी भर नहीं है। इस उपलब्धि को हासिल करने के बाद न्यूयॉर्क हाथ-पर-हाथ रख कर नहीं बैठ गया। हडसन की लगातार चौकसी के लिए हडसन सोसाइटी बनाई गई, जो हर साल क्लियर वॉटर फेस्टीवल का आयोजन करती है, जिसमें लोगों को हडसन नदी की सफाई के अभियान से जोड़ा जाता है।

साल 2013 तक प्रदूषण के मामले में चीन की हालत भी बेहद बुरी थी। उसके शहर दुनिया के सबसे प्रदूषित इलाकों में शामिल थे और पूरा देश धुंध की चादर से ढंका रहता था। लेकिन केवल 6 साल में चीन ने तस्वीर को बदल डाला है। अक्षय ऊर्जा पर निर्भरता बढ़ा कर चीन आज इस हालत में पहुंच चुका है कि साल 2020 तक वायु प्रदूषण के स्तर को 60 फीसदी कम करने के उसके दावे को दुनिया गंभीरता से ले रही है।

हाल के वर्षों में प्रदूषण को लेकर हमारे देश में भी कई नई और सार्थक पहलें हुई हैं। इस दिशा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वर्ल्ड लीडर बनकर सामने आए हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा उन्हें अपना सबसे बड़ा पर्यावरण पुरस्कार ‘चैम्पियन ऑफ द अर्थ’ दिया जाना इसका प्रमाण है। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वच्छता अभियान को जिस तरह जन आंदोलन में बदला है, वो आज दुनिया के कई देशों के लिए प्रेरणा का काम कर रहा है। देश में आज एलईडी बल्ब से लेकर रेन वॉटर हारवेस्टिंग तक पर्यावरण को हर स्तर पर सुरक्षित करने की मुहिम चलाई जा रही है। देश के नेशनल हाई-वे और एक्सप्रेस-वे को ग्रीन कोरिडर की तर्ज पर विकसित कर उन्हें इको फ्रेंडली बनाया जा रहा है। शहरों के पब्लिक ट्रांसपोर्ट नेटवर्क को सोलर एनर्जी से जोड़ा जा रहा है। सबसे बड़ा परिवर्तन तो पर्यावरण को लेकर लोगों की संवेदना में आया बदलाव है। इस सबके बावजूद पराली की मार यह अहसास भी दिलाती है कि इन कोशिशों को अभी और धार की जरूरत है। खासकर तब जब इस मार से खतरा जीने के अधिकार की हार का हो।

 


 
 

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