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21 Oct 2020 01:28:11 AM IST
Last Updated : 21 Oct 2020 01:29:57 AM IST

बिहार चुनाव : मजदूर का मसला जिंदा रहेगा

बिहार चुनाव : मजदूर का मसला जिंदा रहेगा
बिहार चुनाव : मजदूर का मसला जिंदा रहेगा

इसी वर्ष मई महीने में बिहार सरकार द्वारा जारी एक सूचना के मुताबिक करीब 7.5 लाख प्रवासी मजदूर कोरोना महामारी के कारण लौट आए हैं।

इसके अलावा सरकार का यह भी कहना है कि उसने 12 लाख प्रवासी बिहारियों को एक-एक हजार रु पये की सहायता राशि उनके बैंक खाते में भेजा है। बिहार सरकार के इन्हीं दो आंकड़ों को आधार मानें तो हम इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि वर्तमान में करीब 70 फीसद प्रवासी मजदूर हैं, जो कोरोना काल के पहले दूसरे राज्यों में काम कर रहे थे और अब बेरोजगार हैं।
यह तथ्य इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि बिहार में पहली बार चुनाव रोजगार के मुद्दे पर लड़ा जा रहा है। इसे मुद्दा राजद महागठबंधन के नेता तेजस्वी यादव ने बनाया है। महागठबंधन की ओर से जारी संयुक्त घोषणापत्र में उन्होंने दस लाख नौकरियां देने की बात कही है। इसके अलावा युवाओं का समर्थन हासिल करने के लिए उन्होंने आवेदन शुल्क खत्म करने व परीक्षा केंद्र तक आने-जाने का किराया देने का वादा भी किया है। साथ ही उन्होंने पलायन करने वाले मजदूरों को भी प्राथमिकता देने की बात कही है। इस प्रकार इस बार का चुनाव एक ऐतिहासिक चुनाव है, जिसके मुद्दे पारंपरिक मुद्दों से अलग हैं। यह सत्तासीन एनडीए के लिए चुनौती भी है। हालांकि इसमें कोई शक नहीं कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और बिहार कृषि प्रधान राज्य। भारत और बिहार के स्तर पर कृषि संबंधित आंकड़ों में जमीन आसमान का अंतर है।

बिहार की कृषि अभी भी बरसात के पानी पर निर्भर है। सिंचाई की सुविधा के मानदंड पर बिहार अत्यंत ही पिछड़ा राज्य है। यह इसके बावजूद कि इस प्रांत में गंगा, गंडक, कोसी जैसी बड़ी नदियां हैं। बिहार में कृषि कितनी बदहाल है, इसकी जानकारी बिहार सरकार द्वारा इस वर्ष जारी आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में दी गई है। रिपोर्ट यह बताती है कि बिहार की अर्थव्यवस्था के प्राथमिक क्षेत्र, जिसमें कृषि व पशुपालन आदि शमिल है, का वार्षिक विकास दर वित्तीय वर्ष 2017-18 में 4.88 प्रतिशत था जो कि 2018-19 में घटकर -3.87 प्रतिशत रह गया। इसके पहले के भी आंकड़े बहुत अधिक अच्छे नहीं रहे हैं। दरअसल, यह कोई नई बात नहीं है कि बाढ़ प्रभावित बिहार में कृषि बदहाल होती जा रही है। मूल बात यह है कि कृषि की बदहाली से गांवों में बेरोजगारी की स्थिति उत्पन्न होती है और लोग काम की तलाश में पलायन करते ही हैं। पलायन की एक और बड़ी वजह शिक्षा ग्रहण करना भी है। इससे पहले कि हम यह विचार करें कि क्या पलायन करने वाले मजदूर इस बार बिहार चुनाव में कोई भूमिका निभाएंगे, हम यह समझने का प्रयास करते हैं कि गांवों में रोजगार संबंधी सरकारी आंकड़े क्या हैं? बिहार सरकार द्वारा जारी आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट-2020 यह बताती है कि गांवों में श्रमिक जनसंख्या अनुपात पुरुष श्रमिकों के लिहाज से 64 फीसद है। वहीं महिलाओं के हिसाब से यह आंकड़ा 3.9 फीसद, जबकि बिहार में 55.9 फीसद लोग स्वरोजगार करते हैं।
यह आंकड़ा सरकार के पहले आंकड़े के उलट है। जब 100 लोगों की आबादी 64 ग्रामीण पुरुष और 3.9 फीसद ग्रामीण महिलाएं श्रमिक हैं तो 55.9 फीसद आबादी के किस तरह का स्वरोजगार है। करीब 24.3 फीसद दिहाड़ी मजदूर बिहार में काम करते हैं। इस लिहाज से शेष 76.7 फीसद आबादी के हिस्से में क्या है, यह जानकारी उपरोक्त सरकारी हिसाब-किताब में नहीं है। सरकार के पास इसके आंकड़े नहीं हैं कि गांवों में कितने खेतिहर मजदूर हैं और कितने बटाईदार छोटे किसान। हालांकि उसके पास यह आंकड़ा जरूर है कि कृषि, वानिकी और मत्स्यपालन का क्षेत्र करीब 46.6 फीसद रोजगार के अवसर उपलब्ध कराता है। वहीं निर्माण क्षेत्र 17.1 फीसद। कुल मिलाकर यही दो क्षेत्र हैं, जो बिहार में सर्वाधिक रोजगार उपलब्ध कराते हैं। इन दोनों क्षेत्रों में पिछले एक दशक में विकास दर नगण्य रहा है।
आंकड़ों से अलग सवाल यह है कि वे मजदूर जो कोरोना के आगमन के साथ ही लॉकडाउन के दौरान जैसे-तैसे अपने घर पहुंचे और अब बेरोजगारी के शिकार हैं, वे किसे अपना समर्थन देंगे? इस सवाल को समझने से पहले यह समझना भी जरूरी है कि प्रत्येक प्रवासी मजदूर एक परिवार का प्रतिनिधित्व करता है और एक परिवार में औसतन चार मतदाता मान लें तो करीब डेढ़ करोड़ मतदाता ऐसे हैं, जिनका पलायन से सीधा संबंध है।
निस्संदेह भाजपा और जद (यू) के पास अपने आंकड़े और तर्क हैं कि उन्होंने कितने प्रवासी मजदूरों को मुआवजा दिया और कितना दिया, लेकिन यह भी सच है कि गांवों में उनके पास रोजगार नहीं है। मनरेगा के आंकड़े भी सत्तासीन गठबंधन के पक्ष में नहीं है। ऐसे में इसकी संभावना बढ़ जाती है कि गांवों में फंसे प्रवासी मजदूरों का चुनावी व्यवहार सरकार के पक्ष में नहीं होगा।
दरअसल, यह बात समझने की आवश्यकता है कि प्रवासी मजदूरों के कारण ही नीतीश कुमार ने 2010 के विधानसभा चुनाव में जबरदस्त जीत हासिल की थी। सीएसडीएस के आंकड़े बताते हैं कि करीब 87 फीसद प्रवासी मजदूर जो तब दूसरे राज्यों में थे, नीतीश कुमार के काम से संतुष्ट थे। उनकी संतुष्टि का ही असर रहा कि गांवों में उनके परिजनों ने सरकार के पक्ष में वोट किया, लेकिन इस बार वे गांवों में मजबूर हैं। उनके अंदर असंतोष है। उधर मजदूरों की असंतुष्टि को  तेजस्वी यादव समझ चुके हैं और उन्होंने सत्ता पक्ष को इसी मुद्दे पर घेरा है। दूसरी ओर सत्ता पक्ष अभी भी उनके उपर व्यक्तिगत हमला कर रहा है। ऐसे में नैरेटिव यह बनता जा रहा है कि सत्ता पक्ष के पास तेजस्वी यादव के हमलों का जवाब नहीं है। बहरहाल, गांवों में रह रहे प्रवासी मजदूरों का असंतोष किस रूप में प्रकट होगा, यह तो आगामी 10 नवम्बर को सामने आएगा, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि गांवों में वे मूकदशर्क नहीं रहेंगे।


नवल किशोर कुमार
 

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