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14 Feb 2020 12:10:59 AM IST
Last Updated : 14 Feb 2020 12:12:44 AM IST

प्रमोशन-कोटा : फिर बन रहा आंदोलन

अनिल चमड़िया
प्रमोशन-कोटा : फिर बन रहा आंदोलन
प्रमोशन-कोटा : फिर बन रहा आंदोलन

पिछड़े वर्गों व अनुसूचित जाति एवं जनजाति के आरक्षण को लेकर दो तरह के सवाल प्रमुख रूप से उठते हैं।

पहला, क्यों भाजपा के शासनकाल में दलित, पिछड़े व आदिवासियों में अपने संवैधानिक अधिकारों को लेकर सबसे ज्यादा असुरक्षा बढ़ जाती है? भाजपा की छवि आरक्षण विरोधी विचारधारा की अगुवाई करने वाली पार्टी के रूप में बनी हुई है। यदि इस धारणा के पीछे कारणों की तलाश करें तो नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में सरकारी नौकरियों में दलित, पिछड़े व आदिवासी के आरक्षण के संदर्भ में न्यायालयों द्वारा जो फैसलें आते रहे हैं, उनमें आरक्षण विरोध का स्वर होता है। उनको देखने का राजनीतिक नजरिया इसीलिए बन जाता है क्योंकि न्यायालय के रुख के साथ सरकार की भूमिका भी घुली मिली होती है।
नया विवाद सुप्रीम कोर्ट का 7 फरवरी का एक फैसला है, जिसमें भारतीय जनता पार्टी की उत्तराखंड सरकार ने अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के लिए प्रमोशन में आरक्षण नहीं देने के अपने फैसले को सही बताया है। सरकार ने साथ ही यह भी कहा है कि राज्य सरकार जब आरक्षण देने का फैसला करती है, तब तो उसे सही ठहराने के लिए आरक्षण संबंधी आंकड़े जमा करने पड़ते हैं कि आरक्षण के दायरे में आने वाले वर्ग के सदस्यों का राज्य सरकार की सेवाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व है। लेकिन जब राज्य सरकार ने आरक्षण नहीं देने का फैसला कर लिया है तो उसे ऐसे किसी आंकड़ों को जमा करने की भी जरूरत नहीं है। इसे आरक्षण पर एक नये खतरे के रूप में देखते हुए देश के दलित, पिछड़े व आदिवासी फिर से आंदोलन की तैयारी में जुट गए हैं। ऐसा लगा है कि भाजपा अपनी आरक्षण विरोधी विचारधारा को लागू करने के लिए जो रास्ते अख्तियार कर रही है, उनमें एक महत्त्वपूर्ण और आसान रास्ता न्यायालय को मान लिया गया है। 

उत्तराखंड में सहायक अभियंता के पदों पर अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति को प्रमोशन में आरक्षण को लेकर यह नया विवाद उठा है। 2011 में वहां की तात्कालीन कांग्रेस सरकार ने एक कमेटी बनाई थी जिसमें कि यह आंकड़े जमा किए गए थे कि राज्य सरकार की सेवाओं में अनुसूचित जाति व जनजाति का प्रतिनिधित्व कितना है और यह पाया गया था कि अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति का प्रतिनिधित्व अपर्याप्त है और 12 अप्रैल 2012 को उस कमेटी की रिपोर्ट और उसकी अनुशंसाओं को राज्य सरकार के मंत्रिमंडल ने अपनी स्वीकृति भी दी थी। लेकिन राज्य सरकार ने 5 सितम्बर 2012 को राज्य की सेवाओं में प्रमोशन देने के पूर्व के आदेशों को रद्द कर दिया। लेकिन इसके बाद राज्य सरकार के 5 सित. 2019 के आदेश को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के 5 सितम्बर 2019 के आदेश को रद्द करने के फैसले को सही नहीं माना हैं।
उत्तराखंड के बनने के बाद राज्य में अनुसूचित जाति का आरक्षण 21 प्रतिशत से घटाकर 19 प्रतिशत एवं अनुसूचित जनजाति का आरक्षण दो प्रतिशत से चार प्रतिशत कर दिया गया था। साथ ही पिछड़े वर्ग का आरक्षण 21 प्रतिशत से घटाकर 14 प्रतिशत कर दिया गया। उत्तराखंड के बनने के पीछे खास तरह की सामाजिक पृष्ठभूमि रही है। उत्तराखंड के निर्माण के आंदोलन में सामाजिक रूप से वर्चस्व रखने वाली जातियों की ही भूमिका रही है। लिहाजा, उस राज्य में पिछड़े, दलितों एवं आदिवासियों को आरक्षण की सुविधा देने की राजनीतिक इच्छा शक्ति के मजबूत होने जरूरत महसूस की जाती है जो कि लगातार असंभव होती जा रही है।  उत्तराखंड में प्रमोशन को लेकर पीडब्ल्यूडीके विनोद कुमार एवं अन्य ने हाई कोर्ट में यह अपील की कि विभाग में सहायक अभियंता के पद पर प्रमोशन के लिए सामान्य वर्ग एवं आरक्षित वर्ग की सूची तैयार की जाए। साथ ही, हाईकोर्ट राज्य सरकार को यह भी निर्देश दें कि विभाग अनुसूचित जाति एवं जनजाति के सदस्यों को आरक्षण देने के साथ ही विभागीय स्तर पर प्रमोशन के लिए एक समिति भी बनाई जाएं। हाई कोर्ट ने इसी अपील पर 15 जुलाई 2019 को फैसला सुनाकर अजा/अजजा  के सदस्यों को राहत पहुंचाई थी। हाई कोर्ट ने कहा कि प्रमोशन में आरक्षण दिया जाना चाहिए। लेकिन हाई कोर्ट के उस फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए राज्य सरकार ने एक याचिका दायर की। इसके बाद हाई कोर्ट ने अपना रुख बदलते हुए 15 नवम्बर 2019 को एक नया आदेश जारी किया कि राज्य सरकार प्रमोशन में आरक्षण देने से पहले आंकड़े जमा करे कि अजा/अजजा का राज्य सरकार की सेवाओं में प्रतिनिधित्व की क्या स्थिति है और इसके लिए राज्य सरकार को चार महीने का वक्त दिया गया। यह पूरा विवाद उत्तराखंड सरकार के एक विभाग के एक पद पर प्रमोशन से जुड़ा हैं। लेकिन जब बड़ी अदालत में कोई फैसला सुनाया जाता है तो वह किसी एक विभाग और किसी एक राज्य के दायरे में नहीं सिमटा रहता है। हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट में जब यह लाया गया तो वहां उत्तराखंड सरकार ने यह कहा कि संविधान के अनुच्छेद 16(4) एवं 16(4ए) में आरक्षण का प्रावधान है। लेकिन राज्य सरकार पर आरक्षण देने की कोई संवैधानिक जिम्मेदारी नहीं है। फिर, राज्य सरकार ने आरक्षण नहीं देने का फैसला कर लिया है तो उसकी अपर्याप्त प्रतिनिधित्व संबंधी आंकड़े भी जमा करने की बाध्यता भी नहीं है।
आरक्षण को लेकर व्याख्याओं का खेल चलता है। व्याख्याएं जब वर्चस्ववाद को बढ़ावा देने वाली दिशा में बढ़ जाती हैं तो उस पर संवाद समाप्त हो जाता है और फिर उसे लेकर धारणाएं बनती जाती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी उत्तराखंड की भाजपा सरकार की दलीलों को लगभग स्वीकार कर लिया। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक कानून के अनुसार राज्य सरकार कोटा देने के लिए बाध्य नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा है कि कोई व्यक्ति प्रमोशन में आरक्षण की मांग इस तरह से नहीं कर सकता है कि यह उसका मौलिक अधिकार है। न ही न्यायालय राज्य सरकार को आरक्षण देने के लिए कोई निर्देश दे सकता है। तब भी नहीं, जब सरकारी सेवाओं में आरक्षित वर्गों की संख्या के अपर्याप्त होने के आंकड़े भी हो और उसे न्यायालय में पेश किए जाते हैं। उत्तराखंड की भाजपा सरकार के मौजूदा रुख को मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार ने यह कहकर दूसरी तरफ मोड़ने की कोशिश की है कि यह मसला राज्य में कांग्रेस की सरकार के समय का है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला उत्तराखंड सरकार की तरफ से दी गई दलीलों पर आधारित है। कोटे को कोर्ट की व्याख्याओं के बारे में एक निश्चित धारणा बन चुकी है। उसमें यह शामिल है कि यह एक राजनीतिक स्तर पर समाधान किए जाने वाला मसला है। संविधान के प्रावधानों को लागू करने के लिए जो राजनीतिक इच्छा शक्ति की जरूरत होती है, उसे अदालतों की दलीलों के जरिये भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए।


 
 

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