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22 Sep 2019 05:47:40 AM IST
Last Updated : 22 Sep 2019 05:50:15 AM IST

सामयिक : पुरानी बुढ़िया से हमारी रिश्तेदारी

अरविन्द मोहन
सामयिक : पुरानी बुढ़िया से हमारी रिश्तेदारी
सामयिक : पुरानी बुढ़िया से हमारी रिश्तेदारी

इसे मात्र संयोग मान सकते हैं कि हड़प्पाकालीन राखीगढ़ी की खुदाई से निकले नरकंकाल और अन्य अवशेषों के डीएनए के निष्कर्ष उसी भाजपा और संघ परिवार के शासनकाल में सामने आए हैं, जो जमाने से आर्यों को स्थानीय और श्रेष्ठ मानता रहा है।

संघ परिवार और उससे जुड़े इतिहासकार अभी तक बिना वैज्ञानिक साक्ष्यों और बैल/सांड के कान को कम्प्यूटर कलाकारी से खींचकर घोड़ा बनाकर यह साबित करने का प्रयास करते रहे हैं कि हड़प्पाकालीन सभ्यता आर्य सभ्यता ही थी। दूसरी ओर इतिहासकारों और पुरातत्ववेत्ताओं का एक जमात वहां मिले मोहरों को पढ़ने के दावे से लेकर अनेक दूसरे आधार लेते हुए इसे द्रविड़ साबित करने में लगा था और इसके सहारे आर्य-द्रविड़ टकराव और आज के भारत पर आर्य जमात के ‘कब्जे’ के सिद्धांत को चलाता था। पुणो के डेक्कन कॉलेज के वसंत शिन्दे की अगुआई में 28 लोगों की टोली के इस वैज्ञानिक अध्ययन ने काफी हद तक निर्णायक ढंग से यह बात साबित किया है कि हड़प्पाकालीन सभ्यता स्थानीय थी और आयरे के आने की बात तो दूर इरानी किसानों (स्टेप्पे) के भारत की तरफ बढ़ने के पहले ही दक्षिण एशिया मूल के ही ये लोग दक्षिण भारत की तरफ भी बढ़ चले थे।
उल्लेखनीय है कि हरियाणा के हिसार के पास स्थित राखीगढ़ी हड़प्पाकालीन सबसे बड़ी बसावट के रूप में सामने आया है और इस दौर की सभ्यता सिन्धु घाटी के इलाके से काफी दूर-दूर तक दिखाई दी है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई कराने वाले व्हीलर का अनुमान था कि यह सभ्यता नील और मेसोपोटामिया वाले दौर की थी और बाहर से इसका व्यावसायिक गहरा सम्बन्ध था। सम्भवत: इसी विकास के चलते यह आयरे के आक्रमण के साथ नष्ट हुई। उनके दावे का मुख्य आधार यहां घोड़ों के अवशेष का न मिलना था जो आयरे के जीवन में महत्त्वपूर्ण थे।

तेज गति वाले घोड़े रखने और लड़ाकू जीवन जीने वाले आयरे ने इस कृषि प्रधान नगरी सभ्यता को नष्ट कर दिया। बाद में भारतीय सभ्यता के इन केंद्रों के पतन के पीछे सरस्वती के सूखने और जलवायु परिवर्तन से लेकर महामारी तक के कारण बताए गए। इसी चलते शोध, अनुसंधान और अध्ययन की दिशा काफी भटकती रही। स्विडिश परपोला परिवार से लेकर इरावतम महादेवन जैसे लोग सारा जीवन लगाकर कुछ-कुछ बातें निर्धारित करने की कोशिश करते रहे तो नटवर झा जैसे लोग बैल को घोड़ा साबित करके तो कभी सिन्धु लिपि को पढ़ने का दावा करते हैं। पर बात आर्य और द्रविड़ विभाजन पर ही रही। और एक दौर में यह भी हो गया कि अगर आप इस सभ्यता को आयरे के करीब मानें तो साम्प्रदायिक और दकियानूस व द्रविड़ मान लें तो प्रगतिशील। इस बार का अध्ययन ज्यादा महत्त्व का है क्योंकि राखीगढ़ी से जिस महिला के नरकंकाल मिले, उसके डीनए जीवित मिले और आज गुणसूत्रों की पढ़ाई के लिए एक स्रोत भी एक बिलियन अर्थात दस अरब के बारे में सही अनुमान देने में सक्षम है। सो अब अगर यह कहा जा रहा है यहां रहने वाले स्थानीय थे तो इसका मतलब काफी हद तक यही है। और अगर यह कहा जा रहा है कि ईरानी चरवाहे/किसान लोग बाद में आए तो वह भी भरोसा करने लायक है। हार्वर्ड में डीएनए का अध्ययन करने वाले प्रो. डेविड रीच का कहना है कि आज के दक्षिण एशिया में रहने वाले ज्यादातर लोग उसी उन्हीं पूर्वजों के हैं, जो हड़प्पाकालीन शहरों के वासी थे। स्टेप्पे लोगों का मिशण्रभी पर्याप्त हुआ है पर वह शून्य से तीस फीसद से ज्यादा का नहीं है। उत्तर से इन लोगों का आगमन 4,000 से 3,500 साल पहले हुआ है, जबकि हड़प्पाकालीन सभ्यता उससे पहले की है। यहां तक की बात तो ज्यादा विवाद नहीं करेगी पर डॉ. शिन्दे का यह कहना अभी भी सबके गले से नीचे आसानी से नहीं उतरेगा कि इसके बाद का वैदिक युग और वेदों की रचना स्वाभाविक ढंग से हुई विकास है। मामला एक डीएनए भर का नहीं है।
हम वैदिक सभ्यता के नाम पर जिस दौर को देखते हैं, वह अनेक मामलों में सिन्धु घाटी सभ्यता से पीछे का लगता है। इतिहास एक रैखिक दिशा में ही बढ़ता गया हो यह दावा भी गलत होगा। पर शहर बन जाएं, नालियों और सार्वजनिक स्थलों वाला नगर बसे, विदेश से व्यापार हो और फिर कई सौ या हजार साल पीछे वाला जीवन हो, कृषि का आदिम विकास दिखे, बलियों वाला दौर हो यह अटपटा लगता है। और इतिहास में एक स्थान से दूसरे तक लोगों का आना-जाना लगा रहा है। इस संदर्भ में दो-तीन महत्त्वपूर्ण अध्ययनों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। राजेश कोचर जैसे लोग उपग्रह चित्रों के आधार पर आबादी की आवाजाही रेखांकित करते हैं वह महत्त्वपूर्ण है, पर उस दिशा में और काम नहीं हुआ है। एक काम जएनयू की प्रशिक्षित शिरीन का है, जो मानती हैं कि हड़प्पा काल की मोहरें असल में विभिन्न कबीलों के प्रतीक या कबीलाई देवी-देवताओं की निशानियां हैं। जो कबीला जितना बड़ा है, उसकी उतनी ज्यादा मोहरें मिली हैं। और मोहरों में संकेतों और चिह्नों का मेल-जोल कबीलाई मेल-जोल से जुड़ा हो सकता है। अपनी किताब जाति व्यवस्था में प्रसिद्ध बौद्धिक सच्चिदानन्द सिन्हा ने गृह देवी-देवता और ग्राम देवी-देवता को उस समाज की आदिम और कबीलाई पहचान से जुड़ा और बाकी सब हिन्दू देवी-देवताओं को उनके बाद मान्य बताया है। उनका तर्क है कि शादी-ब्याह, जन्म-मरण से लेकर हर बड़े त्योहार पर भी हमारा समाज आज भी सबसे पहले गृह देवता-देवी की पूजा से ही शुरुआत करता है। और किसी भी देवी-देवता का नाम या रूप-रंग का विवरण चालू अर्थ वाले वैदिक या संस्कृत के नाम वाला नहीं है। इन तीन अध्ययनों और अब तक हुए व्यापक अध्ययनों और बहसों की पृष्ठभूमि में मौजूदा अध्ययन, जिसके निष्कषरे के प्रसिद्ध जर्नल ‘सेल’ में प्रकाशन के बाद से मौजूदा शोर शुरू हुआ है, कई मायनों में निर्णायक और महत्त्वपूर्ण हो सकता है। एक तो यह ऐसे वैज्ञानिक तथ्यों को सामने लाता है, जिसे काटना आसान नहीं है।
अभी तक इसके निष्कषरे पर कोई सवाल नहीं उठा है। पर निष्कषरे को अवैज्ञानिक कारणों से या किसी न्यस्त स्वार्थ के चलते किसी खास बनी-बनाई धारणाओं पर ले जाने की कोशिश करना इस पर पानी फेरना ही साबित हो सकता है। दुर्भाग्य से टीम लीडर वसंत शिन्दे इस अध्ययन से आर्य हमले के सिद्धांत को काटने और इसी सभ्यता के आर्य सभ्यता में विकसित होने का जो दावा करने लगे हैं वह इसी प्रवृत्ति को बताता है। विलुप्त सरस्वती का मार्ग ढूंढ़ने की जो कोशिश इसी हरियाणा में हो रही है, उसके नतीजों को भी जल्दबाजी में एक बनी-बनाई धारणा पर ले जाने का प्रयास पहले विवाद में आ चुका है। यह सही है कि हम इतिहास का अध्ययन बन्द आंखों से या कल्पना के बिना नहीं करते, लेकिन ऐसा चश्मा चढ़ाकर भी नहीं कर सकते जिससे हर चीज एक खास रंग में ही रंगी दिखे। यह लगभग सौ साल के अध्ययनों और अध्येताओं के श्रम को दिशा देने वाला वैज्ञानिक निष्कर्ष है। इसे अवैज्ञानिक और राजनैतिक लड़ाइयों की भेंट नहीं चढ़ने देना चाहिए।


 
 

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