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12 Jun 2019 02:45:11 AM IST
Last Updated : 12 Jun 2019 02:49:01 AM IST

भाजपा-जदयू : 2015 दोहराने की तैयारी !

प्रेमकुमार मणि
भाजपा-जदयू : 2015 दोहराने की तैयारी !
भाजपा-जदयू : 2015 दोहराने की तैयारी !

वेताल-पंचविंशति संस्कृत-साहित्य की अमर कृति है, जिसे सोमदेव ने लिखा है। यह भारतीय उपमहाद्वीप की एक चर्चित कथा है, जो जन और अभिजन, दोनों में समान रूप से विश्रुत है। जाने कितनी जुबानों में इसका अनुवाद हुआ है।

हिंदी इलाकों के लोग इसे ‘बैताल-पचीसी’ के रूप में जानते हैं। कथा की थोड़ी चर्चा जरूरी है। राजा विक्रमादित्य को एक तांत्रिक ने एक खास शव लाने को कहा है। राजा उस शव को कंधे पर ढो कर लाता है। उस शव में एक बैताल है, जो राजा को कहानी सुनाता है, और फिर लौट कर पेड़ पर टंग जाता है। पचीसवीं कथा में विक्रमादित्य  शव को तांत्रिक के पास ले जाने में सफल होता है। बैताल ने राजा को बताया था कि तांत्रिक की योजना राजा को बलि देकर स्वयं सम्राट बनने की है। इसलिए हे राजन! तांत्रिक जब बलि के प्रति सिर झुकाने के लिए कहे तो तुम कहना, राजा किसी के प्रति सिर नहीं झुकाता। तुम सिर झुकाओ और जब वह तांत्रिक सिर झुकावे तब तुम उसका सिर कलम कर देना। विक्रमादित्य ने ऐसा ही किया और तांत्रिक की कुरबानी हो गई। यदि वह नहीं मारा जाता तो विक्रमादित्य की बलि होनी थी।
बिहार की राजनीति में भी फिलहाल कुछ -कुछ ऐसा ही हो रहा है। इतिहास ही नहीं दुहराए जाते, कथा-कहानियां भी दुहराई जाती हैं। कोई भी यहां बैताल-पचीसी का खेल देख सकता है। विक्रमादित्य को तांत्रिक की योजनाओं का पता चल गया है, और उन दोनों में छिड़ गई है। विक्रमादित्य ने महागठबंधन का ‘शव’ तांत्रिक के चरणों में रख तो दिया, लेकिन शीश झुकाने से इनकार कर दिया। अब कुछ भी अस्पष्ट नहीं है। अधिक संभावना यही है कि अगला चुनाव दोनों साथ-साथ नहीं लड़ेंगे; फिलहाल वे दोस्ती की बात चाहे जितनी कर लें। नीतीश और भाजपा के बीच मैत्री या गठबंधन के जो आधार थे, वे ध्वस्त हो गए हैं। अंतर्कलह शुरू हो गई है।

दरअसल, दुविधा दोनों तरफ है। भाजपा को अपने राजनैतिक अमेघ के लिए नीतीश को हजम करना जरूरी है। बिहार, बंगाल, झारखंड और ओडिशा भी उसके टारगेट में है। पश्चिम बंगाल में तो उसका कोई संगी नहीं है। लेकिन बिहार में उसे नीतीश को अब ढोना भार अनुभव हो रहा है। वह इनसे मुक्ति चाहती है। 
राजनैतिक गठबंधन और दोस्तियां टूटती रही हैं, लेकिन इतनी जल्दी दोनों में खटक हो जाएगी यह अनुमान किसी को नहीं था। यों, इस बार अपने दूसरे जुड़ाव में नीतीश आरंभ से ही बहुत सहज नहीं थे। जुलाई, 2017 में नीतीश जब फिर से भाजपा से मिले, तब किसी को समझ में नहीं आया कि वह कौन-सी राजनीति कर रहे हैं। ध्रुव (निश्चित ) को छोड़  अध्रुव की ओर बढ़ना शास्त्र-निषिद्ध है, लेकिन नीतीश ने यह किया था। उन्होंने जनता से मिले समर्थन का अपमान भी किया था क्योंकि वह भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ कर आए थे। लेकिन उनकी अनैतिकता पर कम ही सवाल उठे क्योंकि हमारे समाज में नैतिकता का मार्गदर्शक-मंडल एक खास तबका है। उसकी अभिरु चियों और स्वार्थ से सब परिचित हैं। बिहार में भाजपा के पास खोने के लिए कुछ नहीं था। विधानसभा में उसके केवल 53  सदस्य थे। उन्हें तो सब कुछ एक अचंभे जैसा दिखा। उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने उसी रोज त्वरित प्रतिक्रिया दी थी-‘ऐसा लगता है, जैसे स्वप्न देख रहा हूं।’ वाकई भाजपा को बैठे-बिठाए सत्ता हासिल हो गई थी। यह  स्वप्न नहीं तो क्या था!
नीतीश कुमार की राजनीति ने कई दफा भाजपा की सेवा या रक्षा की है। 1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद की राजनैतिक स्थितियों का खयाल कीजिए। भाजपा से कोई हाथ नहीं मिलाना चाहता था। तब नीतीश कुमार समता पार्टी के दूसरे नम्बर नेता थे। उनकी पहल पर उस भाजपा से गठबंधन हुआ, जिसे लोगों ने राजनैतिक तौर पर अछूत मान लिया था। उन दिनों, तब के भाजपा नेता दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी ने बहुत पीड़ा के साथ अपनी राजनैतिक अस्पृश्यता की चर्चा की थी। जॉर्ज फर्णाडीस-नीतीश कुमार ने भाजपा का अहल्या-उद्धार किया था। उसे राजनैतिक गतिशीलता दी थी। अटल जब तक रहे, उन्होंने इसका अहसान माना। ताली दोनों हाथ से बजती है। इसे दोनों ने समझा। नीतीश को अनुमान था, भाजपा अब भी वैसा ही व्यवहार करेगी। लेकिन उनने यह नहीं विचार किया। अब न ही वह नेता है, और न ही वैसी परिस्थितियां। 2014 में भाजपा को जैसे ही पूर्ण बहुमत मिला, उसका दंभ बढ़ना स्वाभाविक था। इस दफा तो उसने अकेले 303 का आंकड़ा पा लिया। अब उसे किसी की जरूरत नहीं है, लोगों को उसकी जरूरत है। इस बात को नीतीश शायद नहीं समझ पाते। कभी गाड़ी नाव पर, कभी नाव गाड़ी पर की कहावत के अर्थ नीतीश कुमार ने समझे हुए होते तो ऐसी राजनैतिक चूक उनसे नहीं होती।
मंत्रिमंडल में शामिल होने की लालसा प्रकट कर नीतीश ने भारी भूल की है। अपने राजनैतिक प्रबंधकों को मंत्री बनाने की जिद में उन्होंने तिरस्कार का जो अपमान झेला है, वह इस स्तर के नेता के लिए कुछ ज्यादा है। वह दिल्ली में बैठे रहे, याचना-अनुरोध किया, लेकिन कोई ध्यान नहीं दिया गया। प्रधानमंत्री को व्यक्तिगत स्तर पर उनसे बात करनी चाहिए थी। लेकिन यह हर कोई जानता है कि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री भले हो जाएं, अटल बिहारी वाजपेयी की तरह के राजनेता नहीं हैं। अटल जी शपथ-ग्रहण के खुशनुमा माहौल को अपने सहयोगियों की रंजगी से फीका नहीं होने देते।
प्रश्न है अब क्या होगा? नीतीश कुमार अब क्या करेंगे? इस लोक सभा चुनाव में बिहार एनडीए को कोई 53 फीसद वोट मिले हैं। भाजपा और जदयू ने बराबर की सीटें लड़ीं, लेकिन भाजपा को जदयू से 1 .5 फीसद अधिक वोट मिले। महागठबंधन और एनडीए को मिले मतों में 22 फीसद का अंतर है। राजद को इतने कम वोट कभी नहीं मिले थे। फिर भी 2014 के लोक सभा चुनाव में 37 सीटों पर चुनाव लड़ कर जदयू ने जो वोट हासिल किए थे, उसे राजद ने इस दफा 21 सीटों पर लड़ कर हासिल किया है। इसलिए कोई यह नहीं कह सकता कि राजद की संभावनाएं समाप्त हो गई हैं। चुनाव बाद उभर रही परिस्थितियों में एक बार फिर इस बात के कयास लग रहे हैं कि क्या जदयू और राजद फिर एक बार साथ होंगे? यदि यह हुआ तो 2015 एक बार फिर लौट सकता है। फिलहाल अभी कुछ भी दावे के साथ नहीं कहा जा रहा।


 
 

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