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19 May 2019 06:36:12 AM IST
Last Updated : 19 May 2019 06:39:08 AM IST

गौरतलब : मायूस हुई महिलाएं अपने आयोग से

फैजान मुस्तफा
गौरतलब : मायूस हुई महिलाएं अपने आयोग से
गौरतलब : मायूस हुई महिलाएं अपने आयोग से

हाल में भारत के प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ यौन उत्पीड़न संबंधी आरोपों की खासी चर्चा रही। शिकायतकर्ता महिला कर्मचारी और उसके पुरुष रिश्तेदार की बर्खास्तगी को लेकर सुप्रीम कोर्ट की आलोचना हुई।

शिकायत को खारिज करने वाली जस्टिस बोबड़े की अगुवाई वाले तीन सदस्यीय पैनल की रिपोर्ट शिकायतकर्ता को नहीं दिए जाने की भी आलोचना हो रही है। लेकिन बहुतों को जानकारी नहीं है कि 2016 में राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) ने दो महिलाओं की शिकायत को खारिज कर दिया था। दोनों महिलाओं ने ‘एनसीडब्ल्यू में कार्यस्थल पर लगातार यौन उत्पीड़न’ की शिकायत की थी। यह मामला 2017 से दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित पड़ा है। केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश के बावजूद एनसीडब्ल्यू ने सूचना का अधिकार के तहत मामले से संबंधित कुछ दस्तावेज भी मुहैया नहीं कराए।
एनसीडब्ल्यू की संवेदनहीनता आयोग की मौजूदा अध्यक्ष एवं भाजपा नेता रेखा शर्मा की थॉमसन रॉयटर के सव्रे पर उनकी प्रतिक्रिया से पता चलती है। सव्रे का निष्कर्ष था कि अफगानिस्तान और सीरिया के बाद भारत विश्व में महिलाओं के लिए सर्वाधिक खतरनाक देश है। इस निष्कर्ष पर प्रतिक्रिया जताते हुए आयोग की अध्यक्ष ने कहा कि एनसीडब्ल्यू ने बलात्कार के जिन मामलों की जांच की उनमें से लगभग 30 प्रतिशत झूठे पाए गए। सरकार के अपने नेशनल फैमिली हेल्थ सव्रे (2015-16) से पता चला है कि यौन उत्पीड़न के 99.1 प्रतिशत मामलों की तो रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हो पाती। 

एनसीडब्ल्यू की स्थापना 1990 में स्वायत्त संवैधानिक संगठन के रूप की गई थी। एनसीडब्ल्यू एक्ट, 1990 के तहत इसका अध्यक्ष ऐसे व्यक्ति को बनाया जाना चाहिए जो महिला संबंधी मुद्दों के प्रति प्रतिबद्ध हो। इसके पांच अन्य सदस्य होने चाहिए। महिलाओं के हितों की सुरक्षा से जुड़े मामलों की जांच के लिए आयोग के पास व्यापक अधिकार हैं। इस पर महिला संबंधी नीतियों और नियमों की समीक्षा और इनमें सुधार संबंधी सुझाव देने का दायित्व है। महिलाओं के अधिकारों के हनन पर स्वत: संज्ञान लेकर कार्रवाई करने या प्राप्त शिकायतों की जांच का अधिकार है। नीतिगत फैसलों या कानूनों की अनुपालना नहीं होने पर कार्रवाई करने का अधिकार है। महिलाओं की समस्याओं के समाधान संबंधी दिशा-निर्देशों का अनुपालन नहीं होने और महिलाओं के कल्याण और उन्हें राहत पहुंचाने संबंधी कार्रवाई करने का अधिकार है। जेलों, रिमांड होम्स और महिला संस्थानों आदि का निरीक्षण करने और समय-समय पर सरकार को अपनी रिपोर्ट भेजने का दायित्व है। बीते तीन दशकों में एनसीडब्ल्यू का प्रदर्शन शिथिल रहा है। सभी सरकारों ने इसके अध्यक्ष पद पर अपनी पार्टियों के ही किसी नेता-कार्यकर्ता को नियुक्त किया है। बीते तीन दशकों के दौरान नियुक्त अधिकांश अध्यक्ष ऐसे रहे जिन्हें महिला विषयक मुद्दों का अनुभव नहीं था। इसी के चलते अनेक ऐतिहासिक अवसरों पर एनसीडब्ल्यू अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन करने में नाकाम रहा।
2002 में जब गुजरात में पूरे दो महीने तक बड़े पैमाने पर मुस्लिमों के खिलाफ यौन हिंसा हुई तब एनसीडब्ल्यू ने वहां अपनी टीम नहीं भेजी। बाद में इसकी टीम ने अजीब सा निष्कर्ष निकाला कि किसी समुदाय विशेष को निशाना नहीं बनाया गया और यौन हिंसा नहीं हुई। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के साथ ही अन्य रिपोटरे ने एनसीडब्ल्यू के निष्कषरे के विपरीत बातें कहीं। हाल में सुप्रीम कोर्ट ने बिलकीस बानो को पचास लाख रुपये की क्षति पूर्ति देने का फैसला दिया। इसी प्रकार, गुवाहाटी में 10 जुलाई, 2012 को एक युवती के साथ सरेराह छेड़छाड़ की गई तो एनसीडब्ल्यू की अध्यक्ष एवं कांग्रेस नेता ने तो युवती पर ही सारा दोष मढ़ दिया। कहा कि ‘अपने लिबास पर ध्यान दें..पश्चिमी जगत के अंधे अनुसरण से हमारी संस्कृति का क्षरण होता है, और ऐसी घटनाएं होती हैं।’ ऐसी मानसिकता वाले बयान ने पीड़िता को गहरा सदमा पहुंचाया। 2012 का ही मामला है, जब एनसीडब्ल्यू की मुखिया ने जयपुर में कहा, ‘यदि लड़कों का एक समूह आपको सेक्सी कहकर छेड़ता है, तो आप बिफरे नहीं, बल्कि इस टिप्पणी को सकारात्मकता से स्वीकारें।’ 16 दिसम्बर, 2012 की दिल्ली गैंगरेप घटना पर एनसीडब्ल्यू ने कोई ज्यादा सक्रियता दिखाई और न ही संबंधित कानून में संशोधन के लिए कोई आंदोलन चलाया। यह तो सामाजिक कार्यकर्ताओं की पहल पर आम जनता सड़कों पर उतर आई जिसने सरकार को विवश कर दिया कि यौन उत्पीड़न के संबंध में विशेष कानून बनाए। और 2013 में यह कानून बनाया गया।
सुरक्षा बलों द्वारा यौन उत्पीड़न के तथ्य को एनसीडब्ल्यू ने नकार दिया। आयोग ने उन मेजर लितुल गोगोई के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया जिन्हें हाल में सेना ने स्थानीय कश्मीरी लड़की से निकटता रखने के आरोप में कोट मार्शल किया है। दिल्ली डोमेस्टिक वर्किग वीमैन फोरम मामले (1994), जो मुरी एक्सप्रेस में सेना के अधिकारियों द्वारा कुछ लड़कियों के साथ रेप का मामला था, में सुप्रीम कोर्ट ने एनसीडब्ल्यू के इस बयान को शर्मनाक करार दिया था कि ‘ऐसे मामलों में हर्जाने के लिए कोई नीति तैयार करना उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है।’ एनसीडब्ल्यू की एक टीम ने बीते माह राजीव गांधी नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (आरजीएनएलयू), पटियाला का दौरा किया था। विचित्र बात है आयोग की टीम ने एक रिपोर्ट यूनिवर्सिटी के पास भेजी तो एक दूसरी रिपोर्ट सरकार को प्रेषित की। यूनिवर्सिटी को भेजी गई रिपोर्ट के साथ जो पत्र था, उससे पता चलता है कि एनसीडब्ल्यू की कार्यप्रणाली किस कदर अकुशल है। ग्यारह अप्रैल, 2019 को यह पत्र भेजा गया। इसके दूसरे पैरा में कहा गया है कि कथित भेदभाव की जांच के लिए आयोग ने 19 मार्च, 2019 को एक जांच समिति का गठन किया और इस समिति ने 20 मार्च, 2018 को आरजीएनएलयू का दौरा किया लेकिन हस्ताक्षर करते हुए आयोग की अंडर सेक्रेटरी ने इस तारीख को 12 अप्रैल, 2012 लिखा। इस प्रकार इस पत्र में तीन विभिन्न वर्षो का जिक्र है।  
प्रत्येक संस्थान में आईसीसी का व्यापक प्रचार होना जरूरी है, लेकिन आरजीएनएलयू की आईसीसी के गठन का जिक्र यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर है, और अक्टूबर, 2017 में इसे अपलोड किया गया। तथ्य है कि ग्रिवांस कमेटी का लिंक भी वहां है, जिसका गठन मार्च, 2019 में किया गया था। जांच समिति का निष्कर्ष था कि कुछ कर्मचारियों का व्यवहार ‘रूखा’ था। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ‘देखा गया कि (कुछ प्रोफेसरों ने) छात्रों के प्रति रूखा व्यवहार किया और छात्रों के खिलाफ अवांछित टिप्पणियां कीं।’ समिति ने इन कर्मचारियों को उनकी बात सुनने का अवसर दिए बिना ही अपना निष्कर्ष निकाल लिया। इस प्रकार एनसीडब्ल्यू ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत की उल्लंघना की है, जो कहता है कि ‘किसी को भी सुने बिना दोषी नहीं ठहराया जा सकता।’ एनसीडब्ल्यू ने अपने अधिकार क्षेत्र का भी अतिक्रमण किया जब उसने सुझाया कि शिक्षकों को वार्डन नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए। यह भी एक अलग समस्या है क्योंकि अधिकांश विश्वविद्यालयों में वार्डन के रूप में शिक्षक शानदार कार्य कर रहे हैं। आयोग ने यह सुझाव भी दिया कि छात्रों की पसंद के लोगों को ही ग्रिवांस कमेटी का सदस्य बनाया जाना चाहिए। लगता है कि महिलाओं विषयक मुद्दों के लिए लड़ने की न तो एनसीडब्ल्यू की इच्छा है, और न ही क्षमता। अत : यह बेहद जरूरी हो गया है कि किसी स्वतंत्र संस्था से आयोग के प्रदर्शन की जांच कराई जाए।


 
 

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