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10 Feb 2019 03:04:46 AM IST
Last Updated : 10 Feb 2019 03:08:23 AM IST

समीक्षा : तुम इतना क्यों बौखला रहे हो!

अरविन्द मोहन
समीक्षा : तुम इतना क्यों बौखला रहे हो!
समीक्षा : तुम इतना क्यों बौखला रहे हो!

इसे मात्र संयोग माना जा सकता है कि जब दिल्ली और एनसीआर में गुरुवार शाम को बादल गरज रहे थे और ओलों की तड़ातड़ बौछार हो रही थी, तब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संसद के अंदर अपने लगभग पौने दो घंटे के भाषण (इतना ही लम्बा भाषण उन्होंने इस बार लाल किले की प्राचीर से भी दिया था) में विपक्ष पर शाब्दिक गोलों की बौछार कर रहे थे।

दूरदर्शन के सभी चैनलों के साथ-साथ लगभग सभी समाचार चैनलों पर लाइव चले इस भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई बहस का विस्तार से जवाब दिया या अगले चुनाव के लिए शंखनाद किया, यह किसी के लिए अस्पष्ट नहीं रहा। संभवत: तभी अधिकांश चैनल मोदी के जवाब को ‘गेमचेंजर’ जैसे शीषर्क के साथ दिखाते रहे।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वैसे भी बोलते समय पूरे लय में होते हैं, लेकिन इस बार के भाषण में कुछ वह ज्यादा ही रमे और इतना ही नहीं, बल्कि आनन्द लेते भी नजर आए और उन्होंने काफी कुछ ऐसा कहा कि विपक्षी खेमे में मायूसी दिखी। सत्ता पक्ष की तरफ से तो लगातार तालियां बज रही थीं, और वाहवाही हुई पर जो लोग बाहर इसे लाइव देख रहे थे उनकी प्रतिक्रिया इतनी उत्साजनक नहीं लगी। दरअसल, वे चुनावी भाषण टीवी पर देखने के कम ही आदी हैं। और इधर अनेक अवसरों पर प्रधानमंत्री मोदी का के भाषण और चुनाव रणनीति के तहत उनकी पार्टी की ओर से हुए आयोजनों का सम्बोधन भी सुन चुके हैं। ऐसे में यह डोज समाचार चैनल के हिसाब से कुछ ज्यादा था। पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पूरी तैयारी से बोलते सुनना उन सभी लोगों के लिए एक जरूरत है, जिनकी नजर अगले आम चुनाव पर टिकी हैं। अपने हर भाषण की तरह कुछ नये पद/जुमले उछालने वाले मोदी जी ने एक बार कथित विपक्षी महागठन्धन को ‘महामिलावट’ कहकर सबके लिए एक नया पद उपलब्ध कराया। लेकिन उनका यह भाषण उतना भर ही नहीं करता। यह मोदीजी की पूरी चुनावी रणनीति को भी साफ करता है, जो वह 55 साल बनाम 55 महीने के नाम से जब-तब जाहिर करते रहे हैं।

कांग्रेस और नेहरू गांधी परिवार पर हमला करते हुए प्रधानमंत्री ने राज्यपाल, सीबीआई, अदालतों के ‘दुरुपयोग’, सुप्रीम कोर्ट के जजों को महाभियोग से धमकाने से लेकर किसानों की दुरावस्था के लिए कांग्रेस को जिम्मेवार बताया। इसके साथ ही, औद्योगिक विकास, महंगाई, बैंकों की लूट से लेकर तमाम आर्थिक मोचरे की सफलता-असफलता गिनवाते हुए उन्होंने 55 साल तक देश पर शासन करने वालों को अक्षम और 55 महीने वाले शासन को महासक्षम बताया तो सबको समझ आया कि इस भाषण का असली उद्देश्य मतदाताओं से अपने लिए एक कार्यकाल और मांगना ही है-इसका उद्देश्य राष्ट्रपति के भाषण पर जवाब देना नहीं। बहरहाल, भले ही यह भाषण भले ही एकतरफा रहा हो पर यह ‘मन की बात’ भी नहीं थी, जिसमें मोटे तौर पर प्रधामंत्री हर महीने बाकायदा किसी एक मुद्दे पर बोलते हैं। यह कहने का आधार सिर्फ  एक की जगह कई मसलें उठाना, विपक्ष को लगातार और दमदार ढंग से धुनना, सांसदों की प्रतियां देखकर भाषण का टोन बदलना और कांग्रेसी राज की गड़बड़ियों का जिक्र करना भर नहीं है। बल्कि इस भाषण में अगले चुनाव के लिए नरेन्द्र मोदी की रणनीति का केन्द्रीय तत्व भी दिखा। मोदी ने बहुत साफ ढंग से कांग्रेसी और नेहरू-गान्धी परिवार राज के घपले-घोटालों और भ्रष्टाचार बनाम अपनी सरकार पर अब तक न उठे एक भी बडे भ्रष्टाचार के सवाल को मुद्दा बनाने की कोशिश की। वह चाहते थे कि  इस अंतर को हर कोई समझे और फिर आकलन करके संतुष्ट हो जाए कि मोदी सरकार ने आम जन के भले के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। पिछले चुनाव के असंख्य और भारी भरकम वायदों को पूरा नहीं करने की असफलता को, इस सरकार द्वारा नोटबन्दी और जीएसटी जैसे फैसलों से हुई तकलीफ और नुकसान को कालीन के नीचे दबाने की कोशिश करते हुए मोदी भ्रष्टाचार और सुशासन को मुद्दा बनाते लग रहे हैं। हाल के समय उनका भ्रष्टाचार और सुशासन को मुद्दा बनाने का प्रयास अनायास नहीं, बल्कि एक रणनीति के तहत सायास ही है। अब कोई चाहे तो इस बात से राहत की सांस ले सकता है कि वे अयोध्या जैसे किसी संवेदनशील मुद्दे या किसी अन्य भावनात्मक मुद्दे को नहीं उठाने जा रहे हैं।
जाहिर हो गया है कि वे भ्रष्टाचार को ही मुख्य मुद्दा रख सकते हैं, और  नेहरू-गान्धी परिवार को केन्द्र में रखते हुए काग्रेस को ही नहीं, बल्कि महागठबन्धन या एनडीए विरोधी दलों को भी निशाना बनाते रहेंगे। रॉबर्ट वाड्रा, सोनिया-राहुल, चिदम्बरम, अखिलेश, लालू, मायावती और ममता के खिलाफ अचानक  उनके चौतरफा हमले को भी इस रणनीति से जोड़कर देख सकते हैं। मोदी जी की राजनीति में चुनाव केन्द्रीय तत्व है, और उसके लिए वे सचमुच ऑलआउट जाते हैं। केंद्र में भाजपा के शासनकाल में जितने में चुनाव या उपचुनाव हुए हैं, उनमें मोदी की यह रणनीति साफ देखी जा सकती है। जब आम चुनाव इतने पास आ गए हों तो उनकी बेचैनी या पहलवान की तरह शरीर में  सुरसुरी स्वाभाविक है। और इस क्रम को इस भाषण के पहले के उनके कामों और फैसलों से जोडकर देखें तो साफ लगेगा कि अब वे चुनावी मोड में आ गए हैं। इस भाषण की तरह अपने फैसलों में भी कई लिहाज छोड़ चुके हैं। लेखानुदान को अंतरिम बजट, अंतरिम बजट को लगभग पूर्ण बजट और बजट भाषण में 2030 तक का सपना दिखाना, किसानों और मध्य वर्ग के लिए बड़े फैसलों की घोषणा, रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय की पूछताछ में तेजी (जबकि मामले पांच साल से ज्यादा पुराने हैं), पहले अखिलेश यादव के खिलाफ खनन घोटाला खोलना (वह भी पुराना मामला है) और फिर मायावती के खिलाफ स्मारकों के निर्माण में धांधली का केस उठाना (यह तो और भी पुराना मामला है), चिदम्बरम परिवार के खिलाफ मामले में तेजी लाना, अचानक पश्चिम बंगाल के शारदा घोटाले में राज्य पुलिस प्रमुख के खिलाफ ही मामला उठाना, सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय को अपने मतलब के मामलों में इस्तेमाल करना जैसे मामलों की पूरी सूची बनाई जा सकती है, जिसमें अपराध पकड़ना मंशा है, या फिर अपने चुनावी दुश्मन को घेरना, कमजोर करना, यह समझना किसी के लिए मुश्किल नहीं है।
अगर सात फरवरी के नरेन्द्र मोदी के भाषण को इस संदर्भ में देखेंगे, और इसके बगैर उसका मतलब भी समझ नहीं आएगा, तो साफ लगेगा कि प्रधानमंत्री मोदी हर अवसर, हर मंच और हर साधन का प्रयोग सिर्फ  चुनाव के लिए करने में लगे हैं। और मात्र उतनी ही गुंजाइश छोड़ते हैं जितने के सहारे वे अपने पक्ष को बचा सकें। कई मायने में यह अच्छा नहीं लगेगा, खासकर तब जब हम उनकी तुलना उनके पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों की गौरवशाली परम्पराओं से करेंगे। और हमारे लिए यह मानने का कोई मतलब नहीं है कि अब से पहले कुछ हुआ ही नहीं है। पर आप आज की दुनिया और हिन्दुस्तान की राजनीति और उसमें चुनावी राजनीति को देखें तो लगेगा कि मोदी 365 दिन और 24 घंटे की राजनीति करने वालों में भी अव्वल हैं। और उनका मुकाबला करना फुरसत से या बड़े ऊंचे आदर्शों और सिद्धांतों के साथ राजनीति करने वालों के लिय सम्भव नहीं है। आज की भाषा में कहें तो मोदीजी ‘स्मार्ट’ नेता हैं, हर चीज का इस्तेमाल अपने मतलब के लिए करते हुए भी पकड़ में न आने वाला। यह भाषण भी उसी का प्रमाण था, पर इससे व्यावहारिक चुनावी राजनीति के कई सूत्र भी निकलते हैं।


 
 

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