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13 Jan 2019 04:06:52 AM IST
Last Updated : 13 Jan 2019 04:09:01 AM IST

दृष्टिकोण : वर्मा अब एक यक्ष-प्रश्न का नाम है

हरिमोहन मिश्र
दृष्टिकोण : वर्मा अब एक यक्ष-प्रश्न का नाम है
दृष्टिकोण : वर्मा अब एक यक्ष-प्रश्न का नाम है

हरदौर में कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं, जो उस दौर के कथानक के सूत्र बन जाते हैं।

ये ऐसे प्रतीक होते हैं जिनसे सांस्थानिक उन्नति-अवन्नति की कहानियां खुद-ब-खुद स्पष्ट हो जाती हैं, किसी तरह की व्याख्या की दरकार नहीं रह जाती। अब आलोक वर्मा भी ऐसे ही यक्ष-प्रश्न का नाम बन गया है। यह नाम शायद उसी तरह लिया जाएगा, जैसे इमरजेंसी के दौर में न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना और फिर बाद के दौर में लेफ्टिनेंट जनरल एसके सिन्हा देश में न्यायपालिका और सेना में सत्ता की दखलअंदाजी और मनमानियों के प्रतीक के रूप में याद किए जाते हैं। तब इन मनमानियों और सांस्थानिक अवन्नति के लिए इंदिरा गांधी का राजकाज जिम्मेदार था। लेकिन इस दौर में आलोक वर्मा ऐसा नाम है, जो कई संस्थांओं पर एक साथ महा-प्रश्न खड़ा करता दिखता है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की दशा-दिशा का तो यह प्रत्यक्ष प्रतीक है ही जिसके वे निदेशक रहे हैं, यह नाम सबसे बड़ा और बहुत हद तक डरावना सवाल सुप्रीम कोर्ट और केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) जैसी हमारे लोकतंत्र की पहरु आ संस्थाओं पर खड़ा करता है।
सबसे अहम तो हमारी न्यायपालिका है, जिसके लिए शायद किसी प्रेत-बाधा की तरह इस प्रश्न से पीछा छुड़ाना आसान नहीं होगा। संयोग यह है कि 22 जनवरी को उस ‘ह्विसिल-ब्लोअर’ प्रेस कॉन्फ्रेंस की पहली बरसी है, जब  पहली बार चार न्यायाधीशों ने सर्वोच्च न्यायालय के घटनाक्रमों की ओर देश का ध्यान खींचा था। लेकिन साल भर भी नहीं बीता कि सर्वोच्च न्यायालय फिर सवालिए घेरे में है। पूरी विनम्रता और आदर के बावजूद अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि मौजूदा सवाल उससे भी भीषण हैं, जो प्रेस कॉन्फ्रेंस में उठाए गए थे। उस समय जो आशंकाएं थीं, अब हकीकत बनकर सामने खड़ी हैं। सीबीआई का पूरा ढांचा ही जब 23 अक्टूबर 2018 को ढहता नजर आया तब सुप्रीम कोर्ट से बड़ी उम्मीद थी कि वह आला पदों पर भ्रष्टाचार की निगरानी वाली इस संस्थाअ को बचाने के लिए हस्तक्षेप करेगा और उसे फिर पटरी पर ला देगा। लेकिन अफसोस वह उम्मीद नाउम्मीदी में बदलती दिखी है। 

अब जो तथ्य उभर रहे हैं, वे और भी शोचनीय स्थितियों की ओर इशारा कर रहे हैं। अलोक वर्मा को जिस सीवीसी रिपोर्ट के हवाले 23 अक्टूबर को छुट्टी पर भेज दिया गया था, उसकी जांच सुप्रीम कोर्ट के रिटायर न्यायमूर्ति ए.के. पटनायक की निगरानी में कराने का आदेश प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुआई वाली पीठ ने दिया था। आखिर सुप्रीम कोर्ट ने 9 जनवरी 2019 को सरकार के फैसले को गलत माना और आलोक वर्मा को कुछ शतरे के साथ बहाल कर दिया। सुप्रीम कोर्ट का आदेश यह भी था कि सीबीआई निदेशक की नियुक्ति समिति वर्मा के खिलाफ आरोपों पर विचार करे और फैसला ले। नियुक्ति समिति में प्रधानमंत्री के अलावा, लोक सभा में विपक्ष के नेता और प्रधान न्यायाधीश होते हैं। प्रधान न्यायाधीश ने फैसला लिखा था, इसलिए उन्होंने अपनी जगह वरिष्ठ न्यायाधीश ए.के.सीकरी को भेजा। आलोक वर्मा के पद संभालने के दिन 10 जनवरी को नियुक्ति समिति बैठी तो 2-1 के मत से सीवीसी की रिपोर्ट के आधार पर ही वर्मा का तबादला कर दिया। विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने वर्मा को सुनवाई का मौका देने की मांग की, लेकिन उनकी बात अनसुनी हुई तो उन्होंने असहमति का नोट लिखा।
इस बीच, न्यायमूर्ति पटनायक ने एक अखबार से कहा कि उन्हें वर्मा के खिलाफ आरोपों में गंभीरता नहीं नजर आई थी। यह भी कहा कि सीबीआई में विशेष निदेशक राकेश अस्थाना से जिरह भी उनके सामने नहीं हुई थी, सिर्फ  उनका बयान उन्हें मुहैया कराया गया था। लिहाजा, इस मामले में संदेह की पर्याप्त गुंजाइश बनी हुई है। यही नहीं, संदेह इससे भी पैदा होता है कि वर्मा ने दफ्तर संभालते ही उनकी गैर-मौजूदगी में किए गए तबादलों को पलट दिया था। यानी राकेश अस्थाना के खिलाफ शिकायतों की जांच को नए सिरे से खोल दिया गया था। यह भी आशंका जताई जा रही थी कि वर्मा राफेल सौदे के मामले में यशवंत सिन्हा, अरु ण शौरी, प्रशांत भूषण की अर्जी पर भी कोई फैसला कर सकते हैं। लेकिन अगले दिन उनके तबादले के बाद फिर निदेशक की कार्यवाहक जिम्मेदारी नागेर राव के तहत आई तो 11 जनवरी को ही उन सभी अधिकारियों के तबादले नए सिरे से कर दिया गया।
मामला यहीं नहीं रु कता है। सुप्रीम कोर्ट में लगाए अपने हलफनामे में वरिष्ठ सीबीआई अधिकारियों एम.के. सिन्हा और ए.के. शर्मा ने कुछ अहम मामलों में जांच को प्रभावित करने के आरोप प्रधानमंत्री कार्यालय पर भी लगा रखे हैं। उन्होंने हलफनामे में सीबीआई को ‘सेंटर फॉर बोगस इन्वेस्टिगेशन’ और ईडी को ‘एक्सटार्शन डायरेक्टरेट’ तक कहा है। इस तरह जब सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय पर शंका उठाई गई है तो नैतिकता का तकाजा तो यही था कि प्रधानमंत्री भी खुद को आलोक वर्मा के बारे में फैसला करने से अलग रखते, जैसा कि प्रधान न्यायाधीश ने किया और अपने बदले यह जिम्मेदारी न्यायाधीश सीकरी को सौंपी। यहीं यह शिद्दत से एहसास होता है कि काश! कोई स्वतंत्र लोकपाल संस्थान होती जो सीबीआई की खासकर ऐसे मामलों में निगरानी करती, जिनमें प्रधानमंत्री कार्यालय ही शक के दायरे में हो।
लेकिन लोकपाल का मामला लटका हुआ है। पांच साल में उसके बारे में बैठक करने की फुर्सत ही नहीं निकाली जा सकी। संयोग से यह मामला भी अब एक याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट के सामने है। हाल में सुप्रीम कोर्ट इसी मामले में ही नहीं, राफेल विवाद में भी उलझ-सा गया है। राफेल पर यह फैसला आया कि इसकी जांच न्यायालय के दायरे में नहीं है लेकिन फैसले में यह लिखा गया कि सौदे की कीमत के पहलुओं की नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) जांच कर चुका है और उसकी रिपोर्ट लोकलेखा समिति (पीएसी) और संसद के सामने है। लेकिन ऐसा नहीं है। इसलिए जब यह विवाद उठा तो सरकार ने एक अर्जी डाली कि उसने कहा था कि कैग जांच करेगा और रिपोर्ट पीएसी और संसद में पेश होगी। इस पर फिर समीक्षा याचिका न्यायालय में पहुंच गई है। लिहाजा, शंकाएं और चिंताएं फिर उभर आई।
निश्चित रूप से ये हालात गंभीर विचार-विमर्श को न्योता देते हैं। इसके अलावा, केंद्रीय सतर्कता आयोग, सूचना आयोग जैसी संस्थाएं हैं, जिन पर बड़े सवाल उठ रहे हैं। फिर, भारतीय रिजर्व बैंक भी सवालों के घेरे से बाहर नहीं है। इस तरह आलोक वर्मा का मामला उस गंभीर परिस्थिति के जैसे अंतिम प्रतीक के तौर पर उभर आया है, जिसकी आशंका लंबे समय से जाहिर की जा रही थी। संस्थाओं की स्वायत्तता भंग होना हमारे लोकतंत्र के लिए यकीनन खतरनाक है। अगर यही रवायत जारी रही तो इमरजेंसी जैसे हालात की याद आना गैर-मुनासिब नहीं है। ऐसे में लोकतंत्र के एक और पहरु ए मीडिया पर महती जिम्मेदारी आ जाती है, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। लेकिन, क्या मीडिया यह जिम्मेदारी निभा रहा है, इसका जवाब पूरे भरोसे से नहीं दिया जा सकता। खैर! अब चुनाव आने वाले हैं; इसलिए देश के लोगों से उम्मीद की जानी चाहिए कि इस संकट पर गंभीरता से विचार करें।


 
 

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