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09 Jan 2019 05:44:02 AM IST
Last Updated : 09 Jan 2019 05:46:49 AM IST

विश्लेषण : सच छिपाने को अंग्रेजी का दामन

अनिल चमड़िया
विश्लेषण : सच छिपाने को अंग्रेजी का दामन
विश्लेषण : सच छिपाने को अंग्रेजी का दामन

विकास का जितना शोर शराबा मचा है, उस विकास के दुष्परिणामों को छिपाने और सरकार द्वारा अपनी जिम्मेदारियों से भागने की सुविधा भाषा के जरिए मिली हुई है।

इस समय लोगों की भाषा बनाम सरकार की भाषा का प्रश्न एक महत्त्वपूर्ण विमर्श है, लेकिन भाषा के सवाल पर राजनीति उतनी ही खमोशी ओढ़े हुए है। इसे कुछ उदाहरणों से समझने की कोशिश करते हैं। 
उत्तराखंड के एक जन संगठन ने यह मांग की है कि उनके प्रदेश में बन रहे एक डैम के संबंध में पर्यावरण विशेषज्ञों की जो रिपोर्ट जारी हुई है, वह उन्हें हिंदी में उपलब्ध कराई जाए। भारत में भूमंडलीकरण की योजना के अनुसार जिन परियोजनाओं को विकास के नाम पर शुरू  किया गया उनके बारे में जन संगठनों की अपनी भाषा में ऐसी रिपोर्टे उपलब्ध कराने की मांग बढ़ी है। बिहार में देबब्रत मजूमदार की अध्यक्षता में भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया। जब सीपीआई एमएल ने अभियान चलाया तो नीतीश कुमार सरकार ने बिहार विधानसभा के सदस्यों को उस रिपोर्ट की सीडी दी लेकिन उस सीडी में आयोग की रिपोर्ट अंग्रेजी में थी, और  उसका अनुवाद कभी हिंदी में नहीं कराया गया। देश में राजनीतिक दलों और जन संगठनों को भारतीय भाषाओं में सरकार द्वारा विकास संबंधी नीतियों और कार्यक्रमों के संबंध में संवाद करने की मांग एक नई किस्म की समस्या की तरफ हमारा ध्यान खींचती है। पूरी दुनिया में लोकतंत्र की चेतना का तेजी से विस्तार हुआ है।

नई तकनीक के विस्तार ने लोगों के भीतर सूचनाओं के लिए तेजी से भूख पैदा की है।
दुनिया भर में किसी भी सरकार के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह अपने कामकाज में पारदर्शिता के सिद्धांत का अनुपालन करे जिसे अंग्रेजी में ट्रांसपैरेंसी कहा जाता है। इसका अर्थ यह है कि सरकार अपनी योजनाओं और कार्यक्रमों के बारे में लोगों को आईने की तरह साफ-साफ दिखने वाली प्रकियाओं और उनके उद्देश्यों को जाहिर करे। इस सिद्धांत के लिए जरूरी है कि सरकार लोगों को अपनी योजनाओं और कार्यक्रमों के बारे में लोगों को उनकी भाषा में ही जानकारियां उपलब्ध कराए। यही बात निजी कंपनियों के व्यापार-कारोबार के साथ भी लागू होती है कि वे अपने ग्राहकों को अपने उत्पादन और अपनी शतरे को साफ-साफ जाहिर करें। इस तरह भाषा के साथ पारदर्शिता का सिद्धांत जुड़ा हुआ है। कुछ नहीं छिपाने की शर्त पारदर्शिता के सिद्धांत की पहली और बुनियादी शर्त है। लेकिन सरकारों और कंपनियों  ने अपने कामकाज के लिए यह तरीका निकाला है कि उन्हें कोई यह नहीं कहे कि उन्होने ट्रांसपैरेंसी यानी पारदर्शिता के सिद्धांत का अनुपालन नहीं किया और वे अपने वास्तविक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए जो छिपाना चाहती हैं, उसे छिपाने में कामयाब भी हो जाएं। सूचना तकनीक का करोबार करने वाली किसी कंपनी के कामकाज के तरीकों पर नजर डालें तो हम यह पाते हैं कि वह अपनी तमाम शत्रे अंग्रेजी में उपभोक्ताओं के सामने पेश करती है, जबकि अधिकतर उपभोक्ताओं की भाषा दूसरी होती है। और वे अपनी शतरे और अनुबंधनों को इस तरह से उनके सामने पेश करती हैं कि लोग बिना पढ़े ही उस चिह्न पर अपनी अंगुली लगा दें जिन्हें मोटे अक्षरों या गहरे रंग में अक्षरों से लिखा गया है। 
हम किसी एक मसलन बिहार के उपरोक्त प्रसंग के बहाने सरकार की भाषा और ट्रांसपैरेंसी के बीच चल रहे खेल को समझने का प्रयास कर सकते हैं। बिहार के लोगों की भाषा हिंदी है। अंग्रेजी चंद नौकरशाह और अभिजात्य वर्ग के लोग ही जानते हैं। सरकार के बनने-बिगड़ने का पूरा कारोबार लोगों के बीच हिंदी में संवाद के जरिए ही होता है। लेकिन सरकार नहीं चाहती है कि भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक हो। अगर सार्वजनिक हो तो इस तरह से हो कि लोग उसे पढ़कर समझ नहीं सकें। जब किसी भी सामग्री को खुद कोई पढ़ता और उसे समझता है है, तो वह अपने स्तर प्रतिक्रिया जाहिर करता है। लेकिन किसी दूसरे के द्वारा उसी सामग्री के बारे में जब उसे जानकारी दी जाती है तो उस दूसरे व्यक्ति या संगठन की व्याख्या और विश्लेषण उसमें शामिल होते हैं। लिहाजा, बिहार की सरकार ने यह तरीका निकाला कि वह लोकतंत्र में पारदर्शिता की हिमायती होने का अपना दावा भी मजबूत कर ले और लोगों को खुद भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट पढ़ने से भी वंचित कर सके। सरकार ने तब हिंदी भाषी अपनी जनता से उस रिपोर्ट से वंचित करने में भी कामयाबी हासिल इस रूप में कर ली कि उसकी अंग्रेजी में रिपोर्ट जारी की। यहां भाषा के इस्तेमाल को समझने की जरूरत है। अंग्रेजी यहां उनके लोकतांत्रिक होने और पारदर्शिता में यकीन रखने वाले शासक के रूप में इस्तेमाल की जा रही है। एक माध्यम के रूप में नहीं। लिहाजा यह समझने की जरूरत है कि भाषा का इस्तेमाल कब. कौन, किस उद्देश्य से कर रहा है, और हिंदी भाषी प्रदेश में हिंदी के जरिए किस तरह के संवाद करने से कौन बचने की कोशिश करता है। भाषा से किसे संबोधित करना है? यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न होता है, और इसी में भाषा के राजनीतिक औजार होने का मर्म भी छुपा होता है। मान लिया जाए कि हमें देश के शासक वर्ग को संबोधित करना है, तो जाहिर-सी बात है कि वह उनकी भाषा में ही संबोधित किया जा सकता है। लेकिन यदि लोगों के बीच चेतना बढ़ाने का उद्देश्य है, तो लोगों को उस भाषा में संबोधित नहीं किया जा सकता है, जिसे सुनकर समझने की उसकी क्षमता नहीं है। इसीलिए भारत जैसे देश में हिंदी में नीतियों संबंधी दस्तावेज तैयार करने की जरूरत नहीं महसूस की जाती है, बल्कि अंग्रेजी में कामकाज की नींव मजबूत हुई है। संसद में भी हिंदी के बजाय अंग्रेजी में ही दस्तावेज तैयार होते हैं, और उनके अनुवाद पर जोर दिया जाता है।
सरकारी अनुवाद तो बेहद जटिल होते हैं,  और अबुझ भी होते हैं। अनुवाद के जरिए एक नई किस्म की भाषा गढ़ी जाती है ताकि पारदर्शी होने के सिद्धांत को पूरा करते हुए तो दिखे लेकिन अपने उद्देश्यों को छिपाने में भी सफलता हासिल की जा सके। यह पूरी लड़ाई कई स्तरों पर बिखरी है। भाषा में जाति, धर्म, वर्ग,  लिंग आदि विषमताओं की पृष्ठभूमि दिखती है, और भाषा की जमीन पर खड़े होकर सत्ता वर्ग की तैयारी का अनुभव किया जा सकता है। लेकिन अपनी इस बातचीत के दायरे को ध्यान में रखकर यहां यह उल्लेख करना है कि उस अनुवादक का ही हिंदी के बाजार पर भी कब्जा है। वह इसे अपनी नई भाषा के विकास के लिए भी इस्तेमाल कर रहा है।


 
 

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