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14 Jan 2018 03:46:36 AM IST
Last Updated : 14 Jan 2018 03:53:18 AM IST

संविधान पर न्यू इंडिया की नजर

राजकिशोर
संविधान पर न्यू इंडिया की नजर
संविधान पर न्यू इंडिया की नजर (फाइल फोटो)

'न्यू इंडिया' वर्तमान सरकार का नया एजेंडा है. लेकिन वास्तव में यह 'ओल्ड इंडिया' है, बल्कि कुछ मामलों में उससे भी ज्यादा वीभत्स और गुनहगार क्योंकि इसे सर्वसत्तावाद और टेक्नोलॉजी का सहारा मिला हुआ है.

जब टेक्नोलॉजी नहीं थी, तब समाज में उतनी आर्थिक विषमता नहीं थी, जितनी आज है. वैचारिक विचलनों की समस्या अलग है, जो पहले कभी देखे नहीं गए. हिन्दू शुरू से ही बहुसंख्यक रहे हैं, लेकिन जनसाधारण के स्तर पर कभी यह तैयारी नहीं थी कि मुसलमानों या ईसाइयों को तबाह या खत्म कर दिया जाए. भारत हिन्दू राष्ट्र हो या बना रहे, यह इच्छा जरूर थी, पर दूसरे धर्मावलंबियों को दूसरे या तीसरे दर्जे का नागरिक बना दिया जाए, इस गंदे इरादे का नामो-निशान तक न था.

जिस 'न्यू इंडिया' की तस्वीर उकेरी जा रही है, इसमें कोई नई अच्छाई नहीं है, बल्कि पुरानी बुराइयों के साथ कुछ और नई बुराइयां जोड़ दी गई हैं, जिनमें न केवल आधुनिकता के सकारात्मक पक्षों से दुराव है, बल्कि परंपरा के श्रेष्ठ तत्वों की अवमानना भी है. जाहिर है, इस भारत को कदम-कदम पर महसूस होता रहेगा कि संविधान उसके मार्ग में गंभीर बाधा है. 

दरअसल, संविधान के पीछे भी एक 'न्यू इंडिया' बनाने की आकांक्षा थी, जिसका उद्देश्य कानून का राज, सामाजिक और आर्थिक समानता, सभी प्रकार के भेदभाव से मुक्ति और भारत को ऐसा राष्ट्र बनाना था, जिसमें स्वस्थ, विचारवान और संतुष्ट नागरिक रहते हों. लेकिन आज की वर्चस्वशाली राजनीति इन सभी आदशरे को ध्वस्त कर एक क्रूर, वंचनापूर्ण और पतित व्यवस्था लाना चाहती है. इस राजनीति को भारतीय संविधान अपने रास्ते का कांटा क्यों न लगे. जब प्रतिपक्ष लगभग खत्म हो गया हो और समाज में अराजकता सफल हो रही हो, तब संविधान ही वंचित लोगों की कुछ हद तक मदद करता है. हमारी संवैधानिक बुनियाद इतनी कच्ची नहीं है कि दो-तीन धक्कों में टूट जाए. इस राजनीति की लोकतांत्रिक विफलताएं ही इसके विनाश का कारण बनेंगी. जाहिर है, तब तक भारत का बहुत कुछ नुकसान हो चुका होगा. लेकिन इतिहास ऐसे ही आगे बढ़ता है.

स्पष्ट है कि संविधान और 'न्यू इंडिया' के बीच जबरदस्त अंतर्विरोध है : यह बहुत कुछ राम-रावण जैसा मामला है. इसीलिए संविधान को बचाने का संघर्ष न केवल शुरू हो गया है, बल्कि जोर पकड़ रहा है. यह संघर्ष उन व्यक्तियों और संस्थाओं की ऊर्जा से पैदा हुआ है, जिन्होंने पतन की शक्तियों के सामने घुटने नहीं टेक दिए हैं, और शायद समाधान का सूर्य भी वहीं से उगे. इस संघर्ष से ही कोई नया राजनैतिक तंत्र उभरे, जो जनशक्ति के आधार पर न केवल हमारे संविधान की रक्षा करे, बल्कि उसे और प्रगतिशील तथा ताकतवर भी बनाए.

इस संविधान के निर्माण के पीछे कुछ नेताओं और कानूनिवद् की समझ थी, लेकिन इसके विकास में जनाकांक्षाओं की निर्णायक भूमिका होगी. कुछ लोग प्रश्न कर रहे हैं कि भारतीय संविधान वैीकरण और राष्ट्रवाद के इस युगल समय में भी कितना सार्थक है, और क्या आज के असहिष्णु वातावरण में वह मखौल का विषय नहीं बनता जा रहा है? ये सभी प्रश्न देश के बदलते मिजाज की उपज हैं. पहली बात यह है कि यह युग नाम की चीज क्या होती है. क्या यह सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग के अपरिहार्य विभाजन जैसी चीज है? कोई भी युग स्थायी होता है,  या बदलना ही उसका अनिवार्य गुण है?



सोवियत संघ, चीन और वियतनाम में समाजवादी क्रांति का वातावरण किसने बनाया था? और, वैीकरण तथा राष्ट्रवाद का वर्तमान समय कौन बना रहा है? एक समय में यहां आयरे का राज था, अब सभी हिन्दू बन गए हैं. इतिहास में प्रगति और प्रतिक्रियावाद की दोनों धाराएं हमेशा चलती हैं, जैसा कि वॉल्टर वेन्यामिन ने खूबसूरती से कहा है कि सभ्यता का इतिहास बर्बरता का भी इतिहास है. बेशक, असहिष्णुता का वातावरण है, पर यह किसकी देन है? अमेरिका इराक के प्रति असहिष्णु था, और आज की भारतीय सत्ता दलितों के शक्तिकरण के खिलाफ है. लेकिन इतिहास बताता है कि प्रतिक्रियावाद कभी-कभी बहुत मजबूत हो जाता है, लेकिन वह मानव सभ्यता का स्थायी मिजाज नहीं है. इसीलिए उनकी पराजय निश्चित है, जो हमारे संविधान को मखौल का विषय बनाना चाहते हैं; इसी संवैधानक व्यवस्था में लोकतांत्रिक पद्धति से जनता, जो 'हम भी हैं, और तुम भी हो' (फैज) द्वारा निर्वाचित हो कर आए हैं.  

यह प्रश्न जरूर है कि यदि जनता के लिए संविधान ही अब अंतिम आशा है, तो वर्तमान स्थितियों में उसे कैसे कार्यत: अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है? इस ढांचे में अस्थि-मज्जा भरने के लिए उन सभी व्यक्तियों और राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक  संगठनों को त्वरित गति से सक्रिय होना होगा जिन्हें लोकतंत्र, मानव अधिकारों, कानून का शासन, सामाजिक और आर्थिक न्याय तथा समानता और मानवीय मूल्यों में आस्था है. वस्तुत: किसी भी देश में संविधान का पहरेदार यही वर्ग होता है.

ऐसे ही लोगों ने भारतीय संविधान को बनाया था, और ऐसे ही लोग उसकी रक्षा भी करेंगे. इसके लिए वि का सद्भाव भी चाहिए, लेकिन जो रोटी खाता है, फसल भी उसे ही उगाना होगा. संस्कृत में कहा गया है, धर्म उसी की रक्षा करता है, जो धर्म की रक्षा करता है. आज कहा जा सकता है कि संविधान उन्हीं की रक्षा करता है, जो संविधान की रक्षा करते हैं.

 

 


 
 

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