कौन नहीं चाहता कि बिहार में जातिगत जनगणना ना हो?
बिहार में जातिगत जनगणना का कार्य रुक जाने से सवाल उठने लगे हैं कि आखिर ऐसा हुआ क्यों? हाई कोर्ट ने उस पर क्यों रोक लगा दी? साथ ही साथ ऐसी आशंका व्यक्त की जाने लगी है कि कहीं इस पर स्थाई तौर से रोक ना लग जाए। अगर स्थाई तौर पर रोक लग गई तो किसका नुकसान होगा और किसको फायदा मिलेगा। सही मायनों में फायदे और नुकसान का सही आंकलन कोर्ट के असली आदेश के बाद ही हो पाएगा।
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बिहार सरकार ने जातिगत जनगणना शुरू करवाकर वाहवाही लूटने की कोशिश की थी, लेकिन उनकी मंसूबों पर पानी फिर गया। बहरहाल आगामी 3 जुलाई को फिर से इसकी पटना हाई कोर्ट में सुनवाई होगी। बिहार में जातिगत जनगणना शुरू करने की जरुरत क्यों महसूस की गई। सरकार ने इसे जरुरी क्यों समझा? दरअसल बिहार सरकार चाहती थी कि बिहार की पिछड़ी, अनुसूचित और अनुसूचित जनजातियों का सही आंकड़ा इक्कठा किया जाए ताकि यह पता लगाया जा सके कि उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति कैसी है।
अभी तक मौखिक तौर से इन जातियों की संख्या बताई जाती रही है। सरकार को सही मायनों में पता ही नहीं है कि किस जाति की संख्या कितनी है। इन जातियों की संख्या पता चल जाने के बाद उनकी संख्या के हिसाब से उनके लिए योजनाएं बनाईं जाने लगेंगीं, ताकि सभी को उनके अधिकार के मुताबिक़ लाभ दिया जा सके। वैसे कहा जाता है कि बिहार में 85 प्रतिशत वह जातियां हैं जो रिजर्ब कैटेगरी में आती हैं। बिहार में स्वर्ण जातियां 15 प्रतिशत के आस पास हैं। बिहार की जो भी आरक्षित जातियां हैं, उनमें कई जातियों को उतना लाभ नहीं मिल पाता है जिसकी वो हकदार हैं।
सरकार इन्ही सब बातो को ध्यान में रखकर जातिगत जनगणना करवा रही थी। अब रही बात कि कौन नहीं चाहता है कि यह जनगणना ना हो। सरकार किसी भी पार्टी की क्यों न हो, हर सरकारें अपने द्वारा शुरू की गईं योजनाओं का राजनैतिक लाभ लेने की कोशिश करती हैं। जातिगत जनगणना के बहाने संभव है कि बिहार की सरकार भी कुछ लाभ लेने की कोशिश करती। हालांकि चर्चा अभी तक यही हो रही है कि बिहार देश का पहला ऐसा राज्य है जहां जातिगत जनगणना शुरू हुई थी, लेकिन यह सूचना गलत है, इसके पहले राजस्थान और कर्नाटक में भी जातिगत जनगणना हो चुकी है, वो अलग बात है कि उसके आंकड़े अभी तक सार्वजनिक नहीं किए गए।
हालांकि जातिगत जनगणना को लेकर जब बिहार विधानसभा में प्रस्ताव पेश किया गया था तो सभी पार्टियों ने उसका समर्थन किया था। शायद कुछ लोग सोच रहे होंगे कि भाजपा ने इसका विरोध किया होगा लेकिन यहाँ बता दें कि भाजपा ने भी जातिगत जनगणना का समर्थन किया था। बल्कि बिहार का एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री मोदी से मिलने दिल्ली भी गया था। उस प्रतिनिधिमंडल में भाजपा समेत अन्य पार्टी के नेता भी शामिल थे। अब जब हाई कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी है तो भाजपा ही कह रही है कि बिहार सरकार ने हाई कोर्ट में अपने पक्ष को सही तरीके नहीं रखा, इसलिए हाईकोर्ट ने उस पर रोक लगा दी। अब इस मामले में जो कुछ भी होगा वह आगामी 3 जुलाई के बाद ही होगा।
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