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03 Jun 2020 02:48:31 AM IST
Last Updated : 03 Jun 2020 02:56:23 AM IST

अंतर्विरोधों से गिरेगी उद्धव सरकार : फडणवीस

अंतर्विरोधों से गिरेगी उद्धव सरकार : फडणवीस
सहारा न्यूज नेटवर्क के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं एडिटर इन चीफ उपेन्द्र राय एवं महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस से सहारा न्यूज नेटवर्क के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं एडिटर इन चीफ उपेन्द्र राय की खास बातचीत।


महाराष्ट्र में कोरोना महामारी का प्रकोप सबसे ज्यादा देखा जा रहा है। इस संकट के बीच भाजपा पर उद्धव सरकार को गिराने की साजिश रचने के आरोप लग रहे हैं। इन तमाम मुद्दों पर महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस से सहारा न्यूज नेटवर्क के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं एडिटर इन चीफ उपेन्द्र राय ने खास बातचीत की। प्रस्तुत है विस्तृत बातचीत-:

इन दिनों महाराष्ट्र सुर्खियों में है। उद्धव ठाकरे और उनके सहयोगी आरोप लगा रहे हैं कि भाजपा उनकी सरकार गिराने का खेल रच रही है। आप कहते हैं कि यह सरकार अपने अंतर्विरोध से गिरेगी। आपके इस विश्वास की वजह क्या है?
महाराष्ट्र की सरकार को गिराने में हमारी कोई दिलचस्पी नहीं है और यह इसके लिए कोई ठीक समय भी नहीं है। अभी कोरोना के खिलाफ लड़ाई लड़ने का वक्त है। जहां तक इस सरकार का सवाल है तो तीनों पार्टयिां एक-दूसरे से मेल नहीं खाती हैं। कांग्रेस और एनसीपी को गाली देते-देते बाला साहब ठाकरे ने अपनी राजनीति की शुरु आत की और आज अपने स्वाथरे की सिद्धि के लिए इन तीनों ने मिलकर सरकार का गठन किया है। इस तरह की बेमेल सरकार ज्यादा दिन तक नहीं टिकती हैं। जब इनके स्वार्थ पूरे हो जाएंगे तो अपने अंतर्विरोधों से ही यह सरकार गिर जाएगी। मैंने हमेशा कहा है कि यह तीन पहिये का ऑटो रिक्शा है जिसके सारे पहिये अलग-अलग दिशा में चल रहे हैं।

महाराष्ट्र में कोरोना का संक्रमण देश में सर्वाधिक है,  आपको क्या लगता है? आखिर ठाकरे सरकार से कहां चूक हो गई?
बिल्कुल सही बात है। देश में इस वक्त सबसे ज्यादा कोरोना की मार महाराष्ट्र में ही देखने को मिल रही है। देश में 37 फीसद मामले महाराष्ट्र में आए हैं। यदि हम एक्टिव मरीजों की बात करें तो यह आंकड़ा 41 फीसद पर है। पूरे देश में हुई मौतों में 40 फीसद महाराष्ट्र में हुई हैं। यह संक्रमण महाराष्ट्र में भयानक रूप लेता जा रहा है। पूरे देश में जहां टेस्ट के बाद पॉजिटिव मरीजों की तादाद चार फीसद है तो महाराष्ट्र में यह आंकड़ा 14 फीसद है। अकेले मुंबई की बात करें तो यह 32 फीसद है। मई के महीने में यह संख्या 41 फीसद तक गई है जो कि महाराष्ट्र की खतरनाक स्थिति को बताने के लिए काफी है । इसका प्रमुख कारण यह है कि जिस तरह की कार्यवाही करनी चाहिए थी और जिस तरह के निर्देश केंद्र की तरफ से दिए गए थे उनका अनुपालन राज्य सरकार ने नहीं किया है। लॉकडाउन का सही समय पर अमल नहीं किया गया, वहीं आपूर्ति को भी नहीं रोका गया। पहले ही केंद्र सरकार ने इंस्टीट्यूशनल क्वारेंटाइन के लिए 50 लाख लोगों की व्यवस्था करने की बात कही थी लेकिन हाई रिस्क कांटेक्ट को क्वारेंटाइन करने के लिए राज्य सरकार ने माकूल इंतजाम नहीं किए।

निजी डाक्टरों को चेतावनी दी गई है कि यदि उन्होंने कोरोना टेस्ट के लिए किसी भी मरीज को निर्देशित किया और वह मरीज यदि टेस्ट में निगेटिव आया तो डाक्टर का रजिस्ट्रेशन कैंसिल कर दिया जाएगा। किस तरह के भय का माहौल डॉक्टरों में पैदा किया जा रहा है और ऐसे कैसे काम चल सकता है?
बात बिल्कुल सही है कि निजी चिकित्सक अगर कोरोना टेस्ट की सलाह भी देते हैं तो उन्हें बकायदा एक नोटिस दिया गया है कि उनका रजिस्ट्रेशन कैंसिल कर दिया जाएगा। दरअसल सरकार आंकड़े छुपाने की जद्दोजहद में लगी हुई है। राजस्थान, हरियाणा जैसे राज्यों में महाराष्ट्र से ज्यादा टेस्ट हुए हैं लेकिन वहां पर मामले कम आ रहे हैं। कुल मिलाकर ज्यादा टेस्ट से ज्यादा मामले आने की बात बेवकूफी भरी है। इस वक्त आंकड़ों को छुपाने का नहीं टेस्टिंग बढ़ाने का समय है।

यदि निजी डाक्टरों में डर का माहौल है तो उनके लिए आवाज उठानी जरूरी है। आप उनके लिए किस तरह से आवाज उठा रहे हैं?
हम सब आवाज उठा रहे हैं। डाक्टर और हम इसके खिलाफ अपनी बात कह रहे हैं। दरअसल महाराष्ट्र सरकार का हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह से चरमरा गया है। एक इंटर मिनिस्ट्रियल टीम ने दौरा करने के बाद अपने सुझाव महाराष्ट्र सरकार को दिए थे। इनमें यहां तक बताया गया था कि कितनी ऑक्सीजन की जरूरत होगी लेकिन इन सारी बातों को महाराष्ट्र सरकार ने नजरअंदाज किया है। जो व्यवस्थाएं की गई हैं वह 3500 से 4000 लोगों के लिए है। वहां भी डाक्टर और नसरे की कमी से मारामारी का माहौल है। मरीजों की तादाद बहुत ज्यादा है। यही वजह है कि रास्ते में एंबुलेंस में लोगों की मरने की तस्वीरें और घटनाएं सामने आ रही हैं। केंद्र ने राज्य सरकार को जो व्यवस्थाएं करने के सुझाव दिए थे उन्हें नहीं मानने और उन पर ध्यान नहीं देने की वजह से हालात बने हैं।

महाराष्ट्र में अपने शासन और प्रशासन के अनुभव के आधार पर आप मौजूदा सरकार को कोरोना संकट से निपटने के लिए क्या राय देंगे? आपको क्या लगता है कि आज की तारीख में सरकार को कौन-कौन से कदम उठाने चाहिए?
सरकार को अपनी सक्रियता बढ़ानी होगी क्योंकि इस पूरी लड़ाई में सरकार कहीं दिखाई नहीं देती। नेताओं को सामने आना पड़ता है। इस वक्त अधिकारी ही पूरी व्यवस्था को चला रहे हैं। समन्वय स्थापित करने का काम राजनीतिक नेतृत्व का होता है। ऐसे समय पर कठिन फैसले लेने पड़ते हैं जिसके लिए राजनीतिक नेतृत्व का पूरा समर्थन चाहिए होता है जिसकी बहुत ज्यादा कमी इस वक्त महाराष्ट्र में देखने को मिल रही है। यह ऐसा महत्वपूर्ण समय है जब हाई रिस्क लोगों की ज्यादा से ज्यादा टेस्टिंग होनी चाहिए लेकिन इस वक्त टेस्टिंग को बंद करवा दिया गया है। जितनी तेजी से हम कोरोना संक्रमण को चिह्नित करेंगे उतनी ही तेजी से इसके प्रसार को रोकने में सफलता मिलेगी। संक्रमण के खिलाफ लड़ाई के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना भी एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए भी राजनीतिक नेतृत्व का पूर्ण समर्पण जरूरी है। मैंने खुद भी मुख्यमंत्री को सलाह दी थी। इसके लिए व्यावसायियों की एक कमेटी बनाई जाए जिसमें चिकित्सा क्षेत्र के विशेषज्ञों को भी शामिल किया जाए। उनकी सलाह के आधार पर एक प्रोटोकॉल बनाया जाए और यह तय किया जाए कि किस तरह से और कितने फीसद कार्यों की शुरु आत करनी है।

आप जिन अफसरों के बूते महाराष्ट्र में सुशासन चला रहे थे, वही अफसर आज भी महत्वपूर्ण दायित्व संभाल रहे हैं। फिर महाराष्ट्र में कोरोना संकट इतना क्यों गहरा गया?
हर अफसर की अपनी एक कार्यशैली होती है। अफसरों के काम करने का अलग-अलग तरीका होता है। इन सारी विचारधाराओं को एक माला में पिरोने की जरूरत होती है। इन सबके बीच समन्वय स्थापित करने और निर्णय लेने का काम राजनीतिक नेतृत्व का होता है। आईएएस अधिकारी बहुत कठोर फैसले नहीं ले सकते हैं क्योंकि उन्हें आगे कई किस्म की जांच का भय होता है। ऐसे समय पर यह रिस्क राजनीतिक नेतृत्व को ही लेना पड़ता है। कई फैसले ऐसे होते हैं जिस पर लोग नाराज होते हैं लेकिन लोगों की नाराजगी से ज्यादा महत्वपूर्ण है लोगों की भलाई और यह काम राजनीतिक नेतृत्व को तय करना होता है।

मजदूरों की घर वापसी को लेकर मची अफरातफरी के लिए उद्धव ठाकरे केंद्र सरकार और रेलवे को जिम्मेदार बता रहे हैं जबकि रेल मंत्री कहते हैं कि जितनी ट्रेनें मांगी गई उतनी दी गई। मजदूरों की मुश्किल के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है ?
इस पूरे मसले से उद्धव ठाकरे ने खुद ही पर्दा उठा दिया है। उन्होंने कहा है कि रेल विभाग ने पूरी मदद की और उनकी बात को गलत तरीके से ले लिया गया है। यह समय एक दूसरे पर जिम्मेदारी डालने का नहीं है। महाराष्ट्र में मजदूरों की बदहाली सभी ने देखी है। मैंने उस वक्त मुख्यमंत्री जी को सलाह दी थी कि इन मजदूरों को रोकिए। इनके लिए राज्य सरकार से बस की व्यवस्था कराइए और केंद्र से ट्रेनों की व्यवस्था हो जाएगी। इन लोगों को ट्रेनों के जरिए इनके घर पहुंचाया जाए। उस वक्त राज्य सरकार की सोच थी कि उनकी बला टल रही है। इसीलिए उन्होंने मजदूरों को जाने से नहीं रोका। 25-25 हजार की तादाद में मजदूर सड़कों पर चल रहे थे। उनके खाने और पीने का कोई इंतजाम नहीं किया गया था। ऐसे में हमारे कार्यकर्ताओं ने यह सारी व्यवस्था की। ये वही मजदूर हैं जिन्होंने महाराष्ट्र के निर्माण में अपना काफी सहयोग दिया है लेकिन जिस वक्त परेशानी आई राज्य सरकार ने इनसे पल्ला झाड़ लिया।

संजय राउत ने ‘सामना’ में अपने संपादकीय में उत्तर भारतीयों को भुजंग कहकर संबोधित किया। बहुत से लोगों को यह बुरा भी लगा। शिवसेना इस तरह की घटिया राजनीति पर क्यों उतर आती है और भाजपा ने इस पर अपना आधिकारिक बयान क्यों नहीं दिया?
मैंने खुलकर इस बात का विरोध किया है। मैं स्वयं भी मराठी हूं और मुझे इस बात का अभिमान भी है लेकिन साथ ही मुझे हर नागरिक का अभिमान है। प्रवासी मजदूरों ने महाराष्ट्र का निर्माण किया है और राज्य की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अब आप इन्हें उत्तर भारतीय कैसे कह सकते हैं जबकि इनमें से 70 फीसद लोगों का जन्म महाराष्ट्र में ही हुआ है और यह तीसरी पीढ़ी के लोग हैं। यह मुंबई की संस्कृति को पूरी तरह से अपना चुके हैं। ऐसे में उत्तर भारतीय न होकर मुंबईकर ही हैं। इनके खिलाफ इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल देश हित नहीं बल्कि राष्ट्र विरोध को दिखाता है। मैं इसकी कड़ी निंदा करता हूं। मराठी महान हैं क्योंकि इन्होंने अलग-अलग संस्कृतियों को भी स्वीकार किया। इन लोगों के खिलाफ  किसी को इस तरह के शब्द बोलने का अधिकार नहीं है।

कोरोना काल में सरकार को सजग करने के अलावा आपके नेतृत्व में भाजपा कार्यकर्ताओं ने जनता की जरूरतों को पूरा करने के लिए कौन-कौन से कदम उठाए?
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा जी ने हमें निर्देशित किया था कि हमें 52 लाख लोगों तक खाना पहुंचाना है। मुझे इस बात का बहुत गर्व है कि हमारे कार्यकर्ताओं ने करीब एक करोड़ लोगों तक खाना और अन्य जरूरी चीजों को पहुंचाया है। हमने कम्युनिटी किचन चलाए, मास्क, सेनिटाइजर, डाक्टर, क्लीनिक, टेस्टिंग सेंटर जैसी कई सुविधाओं को आम लोगों तक पहुंचाया है। कोरोना वायरस संकट के समय महाराष्ट्र में सड़कों पर कोई दिखाई दिया तो वह भाजपा के कार्यकर्ता थे। जिन्होंने खतरनाक परिस्थितियों की परवाह न करते हुए आम लोगों की पूरी तरह से सेवा की। हमारे कार्यकर्ताओं को भी संक्रमण हुआ। इनमें से एक की मृत्यु भी हुई जिसका हमें बहुत खेद है। अपनी जान की परवाह न करते हुए भी भाजपा कार्यकर्ताओं ने करोड़ों लोगों की सेवा की है।

आपकी निजी राय क्या है, क्या लॉकडाउन को महाराष्ट्र में अभी उठाया जा सकता है या अभी कुछ और समय तक इसे बढ़ाए जाने की जरूरत है, क्या अब लोगों को महाराष्ट्र में कोरोना वायरस के साथ जीना सीख लेना चाहिए और लॉकडाउन उनको हटा देना चाहिए?
लॉकडाउन कोई पॉलिसी नहीं हो सकती है। इसके लिए एग्जिट प्लान बनाना जरूरी है। लॉकडाउन सिर्फ  सुरक्षा की दृष्टि से किया गया एक फैसला है। निश्चित तौर पर अब हमें नए नॉर्मल तय करने होंगे। उचित दूरी रखना, मास्क, सेनिटाइजर का इस्तेमाल करना यह सब हमारी जिंदगी का हिस्सा हो जाएगा। जहां तक हो सके हमें इकोनॉमी को पटरी पर लाने के लिए चीजों को खोलना होगा। इसमें नागरिकों की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। उन्हें समझना होगा कि जिंदगी को रोक नहीं सकते हैं। अर्थव्यवस्था को भी आगे बढ़ाना है और अपनी सुरक्षा का भी ध्यान रखना है।

राजनीतिक गलियारों में माना जाता है कि उद्धव ठाकरे आपके अलावा भाजपा के किसी अन्य नेता को मुख्यमंत्री बनाए जाने पर भाजपा सरकार को समर्थन देने के लिए तैयार थे। क्या यह सच है?
शतरे पर चर्चा की जाती है। ऐसी कोई शर्त नहीं होती कि आप कोई बात कह दें और उसके बाद चर्चा न करें और किसी का फोन भी न उठाएं। एक तरीके से हमने जो कह दिया है उसे पहले मानो फिर बात करेंगे। भाजपा एक राष्ट्रीय पार्टी है और इतनी लाचार नहीं है कि किसी की जबरदस्ती में आकर बात करे। आज भी महाराष्ट्र में हम सबसे बड़ी पार्टी है। हमारे 105 के मुकाबले महाराष्ट्र की किसी पार्टी के पास आधे भी विधायक नहीं हैं। कोई शर्त रखे और उस पर चर्चा करें तो बात आगे बढ़ाई जा सकती है। अब ऐसा लगता है कि पहले ही दिन से शिवसेना ने तय कर लिया था कि उन्हें भाजपा के साथ नहीं बल्कि कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनानी है। जब हमें राजनीति में अछूत करार दे दिया गया तो हमने विकल्पों की तलाश की और इसीलिए हम अजित पवार के साथ गए। हम राजनीति में बाउंस बैक करना चाहते थे। सामने से अजित पवार चलकर आए तो हमने भी उस समय वह निर्णय लिया। यह निर्णय ठीक था या नहीं इस पर बात की जा सकती है। आज ऐसा लगता है कि शायद ऐसा नहीं किया होता तो ठीक होता लेकिन उस समय पर यह निर्णय जरूरी दिखाई पड़ रहा था। हम हर विकल्प का इस्तेमाल करना चाहते थे। यदि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय पक्ष में आता तो यह सरकार चल भी जाती।

शिवसेना अब कमजोर होती दिखाई दे रही है। उसकी ताकत कम होने की क्या वजह है? अपने सहयोगियों के साथ उसकी बारगेनिंग पावर भी अब कम होती जा रही है।
शिवसेना और भाजपा का कोर वोटर एक ही है और अब उसे लगता है कि उसके साथ धोखा हुआ है। शिवसेना की छवि भी हिंदुत्ववादी रही थी लेकिन अब यह पार्टी कांग्रेस और एनसीपी के दबाव में दिखाई देती है। बाला साहेब ठाकरे को मानने वाले तमाम लोगों में शिवसेना के खिलाफ अब नाराजगी साफ दिखाई देती है। कांग्रेस और एनसीपी भी अब सारा ठीकरा उद्धव ठाकरे पर फोड़ने पर तुले हुए हैं। कोरोना संकटकाल में राहुल गांधी का बयान इस बात को दिखाता है। वह कह रहे हैं कि हम एक बहुत छोटी पार्टी है और सरकार के निर्णय में हमारी कोई भूमिका नहीं। वहीं अपने इकोसिस्टम के पत्रकारों के माध्यम से शरद पवार साहब भी इस तरह की खबरें छपवा रहे हैं कि उनकी बात को सुना नहीं जा रहा है। कुल मिलाकर दोनों पार्टयिां मिलकर अब महाराष्ट्र की बदहाली का ठीकरा उद्धव ठाकरे और शिवसेना के सिर पर फोड़ने जा रही हैं।

वर्ष 2014 से 2019 तक पूरे पांच वर्ष तक महाराष्ट्र में कभी मराठा आंदोलन तो कभी धनगर आंदोलन, तो कभी किसान आंदोलन चले। आपके सत्ता से हटते ही ये आंदोलन क्यों खत्म हो गए?
आंदोलन इसलिए होते थे क्योंकि लोगों की बात सुनी जाती थी। मंत्री आंदोलनकारियों से जाकर बात करते थे। उन पर बिना वजह लाठियां नहीं चलाई जाती थीं। अब यह भी साफ हो गया है कि इन लोगों के कंधे पर बंदूक रखकर गोली चलाने वाले लोग कौन थे। जब वह ही सत्ता में आ गए हैं तो आंदोलन कैसे होंगे। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि आंदोलनकारियों को इस सरकार से कोई उम्मीद भी नहीं है।


 
 

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