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26 Jan 2020 12:06:29 AM IST
Last Updated : 26 Jan 2020 12:11:52 AM IST

जम्हूरियत में अराजकता की इजाजत नहीं

उपेन्द्र राय
सीईओ एवं एडिटर इन चीफ
जम्हूरियत में अराजकता की इजाजत नहीं
जम्हूरियत में अराजकता की इजाजत नहीं

लोकतंत्र ऐसी शासन प्रणाली है जिसमें जनता को सबसे ऊपर रखा गया है। इसी तरह तमाम शासन प्रणालियों की तुलना में लोकतंत्र के आकषर्ण को सर्वोपरि माना गया है।

आजादी के सात दशक से भी ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद तमाम चुनौतियों से गुजरते हुए न केवल लोकतंत्र का आकर्षण बरकरार है, बल्कि यह पहले से कहीं ज्यादा समृद्ध भी हुआ है। लोकतंत्र जहां लोगों को अभिव्यक्ति की आजादी देता है, वहीं इस पर असहमति या विरोध का अधिकार उसे और खूबसूरत बना देता है। देश के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी हाल ही में आम राय को लोकतंत्र की जीवन रेखा बताया है। लोकतंत्र में सभी की बात सुनने, विचार व्यक्त करने, विमर्श करने, तर्क-वितर्क करने और यहां तक कि असहमति का महत्त्वपूर्ण स्थान है। लेकिन असहमति का यह अधिकार जब जिम्मेदारी से विमुख होकर अराजक बन जाए, तो लोकतंत्र की खूबसूरती के लिए यह खतरा भी बन जाता है। 

देश की राजधानी दिल्ली के शाहीन बाग इलाके से उठ रहे असहमति के स्वर में खतरे की यह आहट सुनाई देने लगी है। शाहीन बाग की मुस्लिम महिलाओं का यह आंदोलन इस आशंका में अपनी जमीन तलाश रहा है कि नागरिकता कानून में बदलाव और एनआरसी, दोनों मुसलमानों को इस देश से बेदखल करने के लिए लाए जा रहे हैं। करीब सात हफ्ते पहले शुरू हुआ यह विरोध हठधर्मिंता की हद पार कर अब ‘बगावत’ की ओर बढ़ चला है। देश के किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं होने देने के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आश्वासन और देश की सबसे बड़ी अदालत में सुनवाई शुरू हो जाने के बावजूद अगर अविश्वास का भाव बरकरार रहता है, तो इसे बगावत नहीं तो फिर क्या कहा जाए?    

सवाल सिर्फ अविश्वास का ही नहीं, बल्कि इस विरोध-प्रदर्शन से फैल रही अराजकता का भी है। समाज के एक तबके की ‘आशंका’ से आजादी की चाहत ने इलाके के दूसरे हजारों रहवासियों को भी बंधक बना कर रख दिया है। अगर शाहीन बाग की महिलाओं को आजादी से जीने का अधिकार है, तो देश के उन नागरिकों ने ऐसा कौन-सा कसूर किया है कि उनकी आजादी के अधिकार या फिर उनकी सहूलियतों पर ग्रहण लगा दिया जाए। नोएडा और दिल्ली को जोड़ने वाली सड़क पर प्रदर्शनकारी इस तरह से धरने पर बैठे हैं कि स्थानीय लोगों के लिए वहां से पैदल निकलना भी मुश्किल हो गया है। परीक्षा के मौसम में लोग अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज पा रहे हैं, तो दूसरी ओर स्थानीय लोगों का व्यापार ठप हो गया है। रास्ता बंद हो जाने से आधे घंटे की दूरी तीन से चार घंटों में तय हो रही है, जिससे नौकरी-पेशा लोगों को भी अपने कार्यस्थलों तक पहुंचने में दिक्कतें हो रही हैं। धरना स्थल के एक तरफ कतार से फैक्ट्री आउटलेट्स हैं, जो 15 दिसम्बर से बंद पड़े हैं। एक अनुमान के मुताबिक इनका नुकसान 1000 करोड़ रु . के पार पहुंच गया है।

अराजकता का आलम यह है कि एक तरफ हाईकोर्ट के निर्देश पर दिल्ली पुलिस प्रदर्शनकारियों से धरना खत्म करने की गुहार लगा रही है, तो दूसरी तरफ प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री के धरना स्थल पर आने या फिर सीएए खत्म करने की मांग पर अड़े हुए हैं। वह तो गनीमत है कि स्थानीय लोगों और पुलिस की मिन्नतों के बाद प्रदर्शनकारी स्कूल बस और एंबुलेंस को रास्ता देने के लिए तैयार हुए हैं। लेकिन रोजाना अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए भाग-दौड़ कर रहे लोगों की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं, जिनका समाधान होता नहीं दिख रहा है। हालात को देखते हुए बीते शुक्रवार पुलिस ने कार्रवाई करते हुए कुछ प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया और लंगर चला रहे समूहों को धरना स्थल से हटा दिया। लेकिन इससे भी समस्या हल होती नहीं दिख रही है।

चिंता की बात यह भी है कि दिल्ली में दो हफ्ते बाद विधानसभा का चुनाव है, और शहर का एक बड़ा हिस्सा भीड़तंत्र के हवाले है। सियासी नफे-नुकसान की तलाश ने इस अफरा-तफरी को चुनाव का मुद्दा भी बना दिया है। दिल्ली की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी (आप) खुलेआम प्रदर्शनकारियों के साथ खड़े होने का एलान कर रही है, तो कांग्रेस और वाम दलों के कई नेता भी धरना स्थल के चक्कर लगा चुके हैं। दूसरी ओर, प्रदर्शन के कारण लोगों को हो रही परेशानी को मुद्दा बनाकर बीजेपी अपने विरोधियों से सवाल पूछ रही है। नौबत तो यहां तक तक आ पहुंची है कि दिल्ली के चुनावी मौसम में प्रदर्शन पर सवालों की बौछार के बीच पाकिस्तान की भी एंट्री हो गई है। तो क्या इंतजार इस बात का होना चाहिए कि चुनाव में किसका तीर निशाने पर लगता है? बिल्कुल नहीं। चिंतन का विषय तो यह होना चाहिए कि विरोध की आग में जगह-जगह शाहीन बाग खड़े करने की जिद के पीछे कौन-सी मानसिकता काम कर रही है। ऐसे लोगों की पहचान किया जाना जरूरी है। गौरतलब है कि शाहीन बाग की तर्ज पर देश के करीब नौ राज्यों-महाराष्ट्र, बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, पश्चिम बंगाल और झारखंड-में ऐसे विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। झारखंड के लोहरदगा में तो सीएए के समर्थकों का रैली निकालने का हक भी इसके विरोधियों को गंवारा नहीं हुआ। उन्होंने उन पर धावा बोल दिया जिसके चलते वहां हिंसा हुई और सीएए समर्थकों पर हिंसा के बाद वहां धारा 144 लगानी पड़ी।

लोकतंत्र अगर विरोध का अवसर देता है, तो विरोध के ‘विरोध’ में खड़े होने का अधिकार भी देता है। लेकिन अभिव्यक्ति के लिए अराजक होने की सहूलियत कभी नहीं देता, हिंसा की कीमत पर तो बिल्कुल नहीं। यह सवाल इसलिए भी उठता है कि जो राजनीतिक दल ऐसी अराजकता को खुलकर समर्थन दे रहे हैं, और बारी-बारी से अपनी मौजूदगी दर्ज करवा कर प्रदशर्नकारियों का जोश ‘हाई’ रख रहे हैं, वह जाने-अनजाने कहीं लोकतंत्र को हाईजैक करने की कोशिश का हिस्सा तो नहीं बन रहे हैं? बताया जा रहा है कि पूरे प्रकरण में विपक्ष इस वजह से भी खास तौर पर निशाने पर है क्योंकि मौजूदा सरकार की लोकप्रियता को बांधने की उसकी कोशिशें अब तक मन-मुताबिक नतीजे नहीं दे पाई है। इसलिए आरोप लग रहे हैं कि अपनी राजनीति चमकाने के लिए विपक्ष छात्रों के बाद अब महिलाओं को मोहरा बना रहा है क्योंकि शाहीन बाग का मोर्चा महिलाओं के हाथ में ही है। बेशक, यह आरोप राजनीतिक हो सकता है, लेकिन विपक्ष को इस बात का जवाब तो देना ही होगा कि उस पर ऐसे अविश्वास की नौबत आखिर आई क्यों? वैसे भी रातों-रात व्यवस्था में सुधार की उसकी मांग तार्किक भी नहीं दिखती। और व्यावहारिक तो कतई नहीं दिखलाई पड़ती। देश भर के ‘शाहीन बाग’ जिस मांग को लेकर अड़े हैं, उस पर तो देश की सबसे बड़ी अदालत भी सरकार के जवाब का इंतजार करने के लिए तैयार है। सीएए के खिलाफ आई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने कोई एकतरफा फैसला न देते हुए सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए चार हफ्ते की मोहलत देकर विरोधियों को भी असहमति में फिलहाल सब्र रखने का साफ तौर पर संदेश दिया है। उन पर है कि शीर्ष अदालत के संकेत को कितने अच्छे से समझते हैं।


 
 

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