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04 Aug 2020 12:40:30 AM IST
Last Updated : 04 Aug 2020 12:42:32 AM IST

नई शिक्षा नीति : नक्सल और अलगाववाद को मिलेगी मात

प्रो. सतीश कुमार
नई शिक्षा नीति : नक्सल और अलगाववाद को मिलेगी मात
नई शिक्षा नीति : नक्सल और अलगाववाद को मिलेगी मात

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नई शिक्षा नीति को समाज और देश को बदलने वाला बताया है, जबकि विपक्षी दलों ने इसकी आलोचना की है।

खैर लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसा होना स्वाभाविक और भी है, लेकिन इसके विभिन्न पहलुओं को देखने पर लगता है कि पहली बार कोई ऐसी शिक्षा नीति को लाया गया है, जो देशज ज्ञान की बात करता है। विशेषकर जनजातीय इलाकों में जहां पर पढ़ाई दम तोड़ चुका होता  है।
भाषायी अड़चन एक बीमारी बन चुकी होती है। नक्सलवाद और अलगाववाद लोगों के बीच अपनी पहचान और आत्मीयता बना चुका होता है। ऐसे हालात में सबसे पहला शिकार स्कूल और उसमे पढ़ने वाले बच्चे बनते हैं। झारखंड और बिहार में अनेकों ऐसे स्कूल हैं, जो दो दशकों से बंद पड़े हैं, क्योंकि वहां या तो स्कूल नक्सलियों के कब्जे में है या वह विद्यालय पुलिस छावनी बन चुका है। बिहार में पिछले एक दशक में काफी बदलाव दिखा है, लेकिन झारखंड के कुछ जिले आज भी पूरी तरह से प्रभावित हैं। 2020 की शिक्षा नीति कैसे नक्सलवाद से लड़ने में सक्षम है, इस बात की चर्चा जरूरी है। इसमें कई नई बातें जोड़ी गई है, जो पहले कभी शिक्षा व्यवस्था की अंग बनी ही नहीं। मसलन क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई की व्यवस्था। ट्राइबल राज्यों में स्कूल नहीं चलने का सबसे अहम कारण भाषायी मुसीबत थी। बच्चे न तो इंग्लिश समझते और न ही हिंदी बोल पाते हैं। उनके बीच उन्हीं की भाषा में शिक्षा की व्यवस्था से बहुत कुछ बदल जाएगा। दूसरी विशेषता समाज को मजबूत और महत्त्वपूर्ण इकाई बनाने की भी है। बालभवन की स्थापना और उसकी देखरेख में गांव वालों की भूमिका।

गांव में नक्सलवाद ने अपना पैर कैसे जमाया? जब गांव कमजोर बन गया, स्कूल गांव के लोगों के प्रभाव में काम करता था, वह भी टूट गया। बच्चे दूरदराज ब्लॉक के स्कूल जाने लगे, साधन सम्पन्न शहरों की ओर चले गए। गांव के भीतर एक सामाजिक ढांचा टूटता चला गया और इसका फायदा नक्सलियों को मिलने लगा। वही स्थिति भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में अलगाववाद को लेकर बनी। इन समस्याओं के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक कारण और भी है लेकिन शिक्षा की कमी ने हिंसा को फैलने का रास्ता दिया। 2020 की शिक्षा व्यवस्था में जनजातीय ज्ञान को भी अहमियत दी गई है। देशज ज्ञान को बढ़ाने के लिए विशेष महत्त्व दिया गया है। जनजातीय समुदाय के बीच संचित ज्ञान को भी बटोरने और संग्रहित करने की बात इस नीति में कही गई है। पर्यावरण की सुरक्षा और सतत विकास की अवधारणा को भी मजबूत बनाने की योजना है। रोजगारजनित व्यवस्था इसका सबसे मजबूत अंग है। रोजगार स्कूल के आधार पर मिलता है। गांव और देश की समझ बड़े बड़े अनुष्ठान से उत्तीर्ण होने वाले आईआईटी के विधार्थी को भी नहीं बन पाती है, क्योंकि गांव के संदर्भ में उनकी समझ शिक्षा तंत्र के जरिये पनप ही नहीं पाई, लेकिन नई शिक्षा नीति में लोकल से ग्लोबल के बीच एक मजबूत सेतु बनाने की कवायद की गई है। ट्राइबल बच्चो के लिए बोर्डिंग और मुफ्त शिक्षा का प्रबंध भी इसकी विशेषता है। अगर गांव और शहर के बीच स्कूली दरार खत्म हो गया तो शहरों की ओर पलायन भी बहुत हद तक थम जाएगा। इसलिए प्रमुख समाजसेवी और चिंतक सुनील अम्बेकर जो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में राष्ट्रीय-सह प्रचारक प्रमुख हैं, इस शिक्षा व्यवस्था को राष्ट्र निर्माण के लिए एक मुख्य करक मानते हैं। आजादी के बाद शिक्षा के क्षेत्र में कई चुनौतियां देश के सामने आई, उसमें एक बेहद गंभीर समस्या भाषा की समस्या थी। भाषाई  विषमता ने देश को खंडो में बांट दिया। एक वर्ग अंग्रेजी स्कूलों से निकलने वाला इलीट वर्ग बनता गया, और शेष सरकारी स्कूलों में पढ़कर बेतरतीब व्यवस्था के शिकार बनते गए।
प्रतियोगिता परीक्षाओं में उच्च कोटि की नौकरियां भी अंग्रेजी में पढ़ने वालों की मिलती गई। 70 वर्षो में मातृभाषा की स्थति अछूत जैसी हो गई। यह परिवर्तन समाज के लिए काफी पीड़ादायक रहा। गांधीजी ने इस समस्या के सन्दर्भ आगाज किया था। उनकी दिव्य दृष्टि ने भविष्य का लेखा-जोखा कर लिया था। ट्राइबल क्षेत्र ज्ञान से भरपूर है। केंद्र और राज्य की राजनीतिक व्यवस्था ने उनके सामाजिक, आर्थिक तंत्र को कभी स्वीकृति नहीं दी। उनके साथ प्रगतिशील नहीं होने का एक धब्बा लग गया। फिर उनका अनादर और तिरस्कार किया गया, जो नक्सलवाद और अलगाववाद में दिखाई देने लगा, मगर जिस तरीके से शिक्षा नीति में जनजातीय और अनुसूचित जाति के लिए विशेष व्यवस्था की गई है, उससे-भारत की आत्मा जो आज भी गांव में बसती है-पुन: निखरेगी और नक्सलवाद और अलगाववाद को पनपने को कोई रास्ता नहीं मिल पाएगा।


 
 

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