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30 Jul 2020 12:09:28 AM IST
Last Updated : 30 Jul 2020 12:11:15 AM IST

कूटनीति : रॉ की मजबूती जरूरी

डॉ. ब्रह्मदीप अलूने
कूटनीति : रॉ की मजबूती जरूरी
कूटनीति : रॉ की मजबूती जरूरी

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में जहां कूटनीति राष्ट्रीय शक्ति का प्रमुख तत्व है, वहीं खुफिया तंत्र को कूटनीति का मस्तिष्क माना जाता है।

1968 में स्थापित भारत की खुफिया एजेंसी रॉ के तेजतर्रार कार्यों से देश को सामरिक और राजनीतिक सफलताओं में बड़ी मदद मिली है, वर्तमान में पड़ोसियों की चुनौतियों के बीच रॉ के और मजबूत होने की जरूरत महसूस की जा रही है।
राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए भारत ने 1968 में रॉ के गठन के साथ आक्रामक रणनीतिक कार्यों को अंजाम देना शुरू किया था। पाकिस्तान में आंतरिक अशांति के बाद बांग्लादेश का उदय भारत की आक्रामक कूटनीति का परिणाम था। रॉ का खुफिया तंत्र इतना मजबूत था कि रॉ के एक पूर्व अतिरिक्त सचिव बी. रमन ने अपनी किताब ‘द काऊ बॉयज ऑफ रॉ’ में लिखा है कि 1971 में रॉ को इस बात की पूरी जानकारी थी कि पाकिस्तान किस दिन भारत के ऊपर हमला करने जा रहा है। 1975 में चीन और वैश्विक दबाव के बाद भी सिक्किम का भारत में विलय भारत की एक और बड़ी कूटनीतिक सफलता थी और इसमें रॉ की अहम भूमिका थी।

इन सबके बीच रॉ के लिए भारतीय राजनीति में परिवर्तन से मुश्किलें भी आई। पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का सबसे पहले रॉ ने ही पता लगाया था। रॉ एजेंट ने कहूटा में नाई की दुकान के फर्श से पाकिस्तानी परमाणु वैज्ञानिकों के बालों के सैंपल जमा किए। उनको भारत लाकर जब उनका परीक्षण किया गया तो पता चला कि उसमें रेडिएशन के कुछ अंश मौजूद हैं, जिससे पाक की परमाणु तैयारी का पता चला। रॉ के एक एजेंट को 1977 में पाकिस्तान के कहूटा परमाणु संयंत्र का डिजाइन प्राप्त हो गया था लेकिन तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने न सिर्फ इसे दस हजार डॉलर में खरीदने की पेशकश ठुकरा दी, बल्कि यह बात पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल जिया-उल-हक को भी बता दी। इस घटना का जिक्र मेजर जनरल वीके सिंह ने अपनी किताब ‘सीक्रेट्स ऑफ रिसर्च एंड एनालिसिस विंग’ में भी किया है।  बाद  में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी इंटर सर्विस इंटेलीजेंस की सक्रियता ज्यादा बढ़ गई और रॉ को नये सिरे से अपनी रणनीति पर विचार करना पड़ा। इसके नतीजे घातक रहे, पंजाब में खालिस्तान की मांग का हिंसक रूप देश ने देखा और 1984 में भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई। पाकिस्तान में रॉ के कमजोर होने का फायदा पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी को हुआ जिसने बिना युद्ध लड़े भारत में जातीय और धार्मिंक अशांति भड़काने की व्यापक योजना को अंजाम देते हुए ऑपरेशन जिब्रॉल्टर शुरू कर भारत में आतंकवाद बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई। 1984 में भारत के प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी ने भारत की खुफिया एजेंसी रॉ के साथ एक महत्त्वपूर्ण बैठक कर यह सुनिश्चित किया कि पाकिस्तान की आतंकी नीतियों का जवाब उसके अंदाज में ही दिया जाना चाहिए। इस प्रकार भारत के नये सीक्रेट प्लान सीआईटी एक्स का आगाज हुआ और उसने पड़ोसी देशों को ध्यान में रखकर अपनी आक्रामक रणनीति को अंजाम देना शुरू कर दिया। यह वही दौर था जब चीन, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका से हमारे संबंध बेहद असामान्य थे। बांग्लादेश में बढ़ती भारत विरोधी गतिविधियों को रोकने के लिए 1985 में फरक्का को लेकर आपसी सहमति, नेपाल में भारत विरोध को खत्म कर मजबूत संबंध रखने के लिए नवम्बर, 1986 में बंगलौर में सार्क सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सार्क का मुख्यालय काठमांडू में स्थापित करने का कूटनीतिक दांव और 1988 में मालदीव में भारतीय वायुसेना के ‘ऑपरेशन कैक्टस’ के अभियान के बाद भारत विरोधी ताकतों को करारा जवाब देने की कूटनीति के पीछे रॉ की ही अहम भूमिका थी।
1999 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच करगिल में जंग चल रही थी, उस समय भारत की खुफिया एजेंसी रॉ ने जनरल परवेज मुशर्रफ की एक बातचीत टेप की थी और बाद में इसी से पाकिस्तान के बीजिंग से रणनीतिक संबंधों का खुलासा भी हुआ था। यह रॉ की सफलता तो थी जिससे भारत को दुनिया में यह साबित करने में बड़ी मदद मिली कि करगिल की घुसपैठ में पाकिस्तान की सेना का सीधा हाथ था लेकिन मलाल यह था कि आखिर पाकिस्तान के भारतीय सीमा में इतनी बड़ी घुसपैठ का सुराग रॉ को पहले क्यों नहीं मिला। इसके पीछे एक प्रमुख कारण 90 के दशक में भारत के विदेश मंत्री और बाद में भारत के प्रधानमंत्री बने इंद्रकुमार गुजराल का वह गुजराल सिद्धांत माना जाता है, जिसके अंतर्गत पड़ोसी देशों का विास जीतने के लिए अप्रत्याशित कदम भी उठाए गए थे और उनमें से एक था पाकिस्तान में रॉ की गतिविधियों को विराम दे देना। गुजराल के पिता अवतार नारायण गुजराल पाकिस्तान की संविधान सभा के सदस्य थे और वे अपने पिता के सहायक के तौर पर काम कर चुके थे, अत: उन्होंने दुश्मन देश के प्रति बेहद सदाशयता दिखाई और इसके दूरगामी परिणाम भारत की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए आत्मघाती साबित हुए।
शक्ति संतुलन की नीति को विवेकपूर्ण ढंग से संचालित करने के लिए यह आवश्यक है कि नीति निर्धारक शत्रु राज्यों की भविष्य में होने वाली क्षमता और नीयत के बारे में भविष्यवाणी कर सकें और यह काम अत्यंत कठिन है। ऐसे में कूटनीतिक सफलता के लिए खुफिया एजेंसी निर्णायक भूमिका अदा कर सकती है। वर्तमान में नेपाल में भारत विरोधी गतिविधियां चरम पर हैं, बांग्लादेश और पाकिस्तान के संबंध अप्रत्याशित रूप से मजबूत हो रहे हैं, श्रीलंका, मालदीव और ईरान में चीन मजबूत हुआ है, वहीं गलवान घाटी में चीन द्वारा पक्का निर्माण कार्य कर लेने की खबर भी भारत को बहुत देर से मिली। कूटनीतिक और सामरिक दृष्टिकोण से यह चुनौतीपूर्ण है। बहरहाल, खुफिया एजेंसी रॉ की मजबूती से भारत की पड़ोसियों पर श्रेष्ठता, महत्ता और कूटनीतिक सफलता सुनिश्चित हो सकती है, इस पर ध्यान देने की जरूरत है।


 
 

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