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29 Jul 2020 12:46:06 AM IST
Last Updated : 29 Jul 2020 12:48:31 AM IST

विश्लेषण : आपदाकाल में बच्चों की दुनिया

ऋषम कुमार मिश्रा
विश्लेषण : आपदाकाल में बच्चों की दुनिया
विश्लेषण : आपदाकाल में बच्चों की दुनिया

कोरोनाकाल में बच्चों के बारे में चर्चा केवल ऑनलाइन शिक्षण तक सीमित है।

यह बहस कुछ बुनियादी और व्यवस्थागत सवालों को उठाए बिना अधूरी है: पहला, ऑनलाइन शिक्षा हस्तक्षेप के केंद्र में कौन से बच्चे हैं? दूसरा, क्या विषयों और किताबी ज्ञान को जानना ही शिक्षा और सीखना है? तीसरा, विद्यालयी तंत्र की अर्थव्यवस्था इस संकट के प्रति क्या प्रतिक्रिया व्यक्त कर रही है? और चौथा, शिक्षा की नौकरशाही का हस्तक्षेप कैसे कार्य कर रहा है? चर्चा की शुरु आत पहले सवाल से करते हैं।
ऑनलाइन शिक्षण के मॉडल में हमने बच्चों की जिस आबादी के सापेक्ष परिकल्पित किया है, वह नगर में रहने वाले, नौकरीपेशा परिवारों, शिक्षित अभिभावकों और मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि वाले परिवारों के बच्चों की है। इनके लिए दिनचर्या का विभाजन ऐसा है, जहां बच्चों का स्कूल न जाना अस्वाभाविक लगता है। इनके परिवार में पढ़ने, पूछने, लिखने और बताने में साक्षरता के तौरतरीके इस्तेमाल होते हैं। वे इन तौर-तरीकों को ऑनलाइन माध्यम से ग्रहण करने के लिए समर्थ और तत्पर हैं। यहां सवाल उठता है कि उन बच्चों का क्या जो उक्त सरलीकृत परिभाषा में नहीं आते? वे अनुभव संपन्न हैं, लेकिन स्कूली शिक्षा के लिए घर में माहौल और सहयोग नहीं है। आबादी के आधार पर देखें तो उनकी जनसंख्या भी अधिक है। गांव में रहने वाले, नगरीय गरीब परिवारों से संबंधित, दूरदराज के इलाकों में रहने वाले, बाल मजदूर, स्ट्रीट चिल्ड्रेन आदि की समस्याओं और संकटों पर न के बराबर चर्चा है।

बच्चों के इस वर्ग के लिए स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और पोषण के बाद शिक्षा की बारी आती है। जमलो मकदम नामक आदिवासी बाल मजदूर तेलंगाना से अपने घर लौटते हुए रास्ते में गुजर जाती है। अभी हाल में खबर आई है कि बुंदेलखंड में खदानों पर काम करने वाली लड़कियों का यौन शोषण हो रहा है। चाय बागानों और महानगरों के असंगठित क्षेत्रों में काम कर रहे बच्चों से जुड़ी भी अनेक ऐसी खबरें हैं। समस्या यह है कि इन बच्चों को पहचानने और इनका सहयोग करने की कोई आधिकारिक व्यवस्था नहीं है। इसी के समांतर कोरोना काल में हुए पलायन के कारण प्रवासी बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा की समस्या भी खड़ी हो रही है। प्रवासी परिवार जिन गांवों में लौटे हैं, वहां के स्कूलों में उनके बच्चों का नामांकन नहीं है। उनके ड्रॉपआउट होने का खतरा भी अधिक है। क्या स्कूल के विषयों और किताबी ज्ञान को जानना ही शिक्षा और सीखना है? यह उस एजेंडे का छुपा हुआ रूप है, जहां हर बच्चा भविष्य का उत्पादक है और जिसके जीवन को स्कूल में बांध दिया गया है। इसी कारण वर्तमान में हम बच्चों की दुनिया को सच्चाइयों और स्वाभाविकताओं से परे यंत्रीकृत और आभासी स्कूलों की ओर ढकेलने की सहमति बना चुके हैं। मान चुके हैं कि शिक्षण ही सीखना है। प्रत्यक्षत: न मिल पाने लेकिन पाठयक्रम और परीक्षा द्वारा बच्चों में विकास को सिद्ध करने और मापने की मजबूरी में स्कूल सीखने का भौंडा संस्करण तैयार कर रहे हैं, जबकि बच्चे तो अपनी सक्रियता और परिवेश में भागीदारी द्वारा लगातार सीखते रहते हैं।
हमें ध्यान रखना होगा कि सीखने के लिए विद्यार्थी-शिक्षक-पाठयसामग्री का जाल ही अंतिम सत्य नहीं है। इस आपदाकाल में बच्चे  परिवार और आसपास के परिवेश में अपनी सक्रियता से जो सीख रहे हैं, उसे स्कूल के विषयों से जोड़ने की जरूरत है, जबकि अभी हम समय और पाठयचर्या के बीच संतुलन बैठाना चाह रहे हैं। हम केवल बच्चे के बुद्धि पक्ष पर केंद्रित हैं जबकि कोरोनाकाल में बच्चों से जुड़ी सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियां सीमित हुई हैं। वे माता-पिता के तनाव और चिंताओं का अवलोकन कर रहे हैं। गरीब और वंचित परिवारों के बच्चों की एक बड़ी आबादी दो जून की रोटी के संकट को झेल रही है। बाल मजदूर और स्ट्रीट चिल्ड्रेन बिना घोंसले के पक्षी की तरह आपदाकाल में गायब हैं। इस दौरान ही उजागर हो रहा है कि हमारी व्यवस्था में स्कूल के अलावा बच्चों के लिए कोई अन्य संलग्नता और सहयोग तंत्र नहीं है। आइए, स्कूल रूपी बाजार और अर्थव्यवस्था पर विचार करते हैं। हमारी शिक्षा व्यवस्था में कम या अधिक फीस वाले निजी स्कूलों की स्वीकार्यता किसी से छुपी नहीं है। अखबारों से लेकर टीवी चैनलों तक खबर आ रही है कि अभिभावक स्कूल की फीस देने की स्थिति में नहीं हैं। इस तर्क का सहारा लेकर प्राइवेट स्कूल शिक्षकों की तनख्वाह नहीं देना चाह रहे। या तो शिक्षकों को आधी तनख्वाह दे रहे हैं, या अनिश्चितकाल के लिए अवकाश पर भेज रहे हैं। शिक्षकों के काम के घंटे बढ़ा दिए गए हैं। ऐसे शिक्षक जो खुद आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं, वे किस भरोसे ऑनलाइन शिक्षण में योगदान करेंगे?
वर्तमान में अधिकांश अभिभावक सूचना प्रौद्योगिकी के संसाधनों की व्यवस्था का कोई अतिरिक्त खर्च उठाने की स्थिति में नहीं हैं। इसका जीता-जागता उदाहरण हिमाचल प्रदेश के कुलदीप हैं, जिन्होंने स्मार्टफोन के लिए अपने दुधारू पशु को बेच दिया। स्कूलों की ओर से अभिभावकों को पाठयपुस्तकें, ड्रेस से जैसी सामग्रियों को खरीदने का भी निवेदन आ रहा है। सरकारी स्कूलों की अलग तरह की समस्याएं हैं। वहां शिक्षकों को विद्यालय उपस्थित होने के लिए आदेश दिया जा रहा है। विद्यार्थी विद्यालय नहीं आ रहे। संसाधनों के अभाव में शिक्षक विद्यालय से ऑनलाइन शिक्षण नहीं कर पा रहे। इस संकट के समय में भी वे वृक्षारोपण या अन्य स्थानीय कार्यों में सहयोग दे रहे हैं। शिक्षा में नौकरशाही की केंद्रीकृत व्यवस्था का ‘सकरुलर संस्कृति‘ के माध्यम से चलना शिक्षा के संकटों को बढ़ा रहा है। यह संकट शिक्षा के अधिकार कानून के लिटमस टेस्ट का समय है।
लड़कियों, आदिवासियों, दिव्यांगों और अन्य वंचित वर्ग शिक्षा के अवसर के अभाव में पीछे न हो, यह राज्य का दायित्व होगा। इस परिस्थिति में स्कूल की भूमिका को नये सिरे से परिभाषित करने की जरूरत है। चाहे वह प्रवासी श्रमिकों के बच्चों को प्रवेश देने का मुद्दा हो, स्कूल के बहाने स्वास्थ्य और पोषण की क्षतिपूर्ति करना हो, बच्चों को सुरक्षा का परिवेश उपलब्ध कराना हो, इसके लिए नौकरशाही को व्यवस्था के स्तर पर पहल करनी होगी। हमें ध्यान रखना होगा कि शिक्षण सुनिश्चित करने से पहले बच्चों, शिक्षकों और अभिभावकों की दुनिया में आए सामाजिक-आर्थिक बदलावों पर भी विचार किया जाए। केंद्रीकृत नौकरशाही और बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप के साथ स्थानीय, सामुदायिक और किफायती विकल्पों को भी बढ़ावा दिया जाए।


 
 

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