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27 Feb 2020 05:53:11 AM IST
Last Updated : 27 Feb 2020 05:55:20 AM IST

दिल्ली में दंगा : पुलिस पर सवाल?

आमोद कंठ
दिल्ली में दंगा : पुलिस पर सवाल?
दिल्ली में दंगा : पुलिस पर सवाल?

दिल्ली में आज जो कुछ हो रहा है, उसका 84 के दंगों से मुकाबला करना ठीक नहीं होगा जैसा कि कुछ लोग कर रहे हैं।

दोनों के हालात में बहुत अंतर है। दिल्ली में तब की पुलिस और आज की पुलिस में बहुत अंतर है। आप जानते हैं कि आज दिल्ली पुलिस विश्व के बड़े शहरों में सबसे बड़ी फोर्स है, जिसमें एक लाख के करीब लोग कार्यरत हैं, जिनके पास आधुनिकतम सुविधाएं उपलब्ध हैं। कमी पुलिस की नीयत पर भी नहीं, बल्कि पुलिस के नेतृत्व में रही है।
पिछले दो दिनों की घटनाएं अचानक नहीं हुई हैं।  इनका माहौल बहुत दिनों से बन रहा था। जब सीएए का विरोध करने के लिए शाहीन बाग पर धरना बैठा तभी पुलिस को उन्हें उठाने की कोशिश करनी चाहिए थी। क्या हुआ अगर महिलाएं धरने पर थीं? क्या दिल्ली पुलिस में महिला पुलिस नहीं है? किसी शहर में एक सड़क को इतने दिनों तक कैसे रोका सकता है? अगर यह धरना पहले ही उठ जाता तो उसके विरोध में धरने की जरूरत ही नहीं पड़ती। लोगों का पुलिस व्यवस्था और कानून में विश्वास दोबारा स्थापित करने के लिए इस सारे फसाद की न्यायिक जांच होनी चाहिए नहीं तो आगे आने वाले लोगों को भी कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं पड़ेगी। इस बार मुझे और बहुत लोगों को ऐसा लगा कि हमारे पुलिस कमिशनर को जब-जब जहां-जहां होना चाहिए था वो वहां नहीं दिखे। दिल्ली का पुलिस कमिश्नर कोई मामूली हस्ती नहीं है। उन्हें  हमेशा दिखना चाहिए। उनकी बातों से लगना चाहिए कि उनका विजन क्या है। इस पूरे विवाद में अमूल्य पटनायक कभी भी मौके पर नहीं दिखे। जब पुलिस और वकीलों का झगड़ा हुआ तब भी वो खुद कोर्ट नहीं गए, बल्कि एक ऑफिसर को भेजा जो खुद ही वहां से मुश्किल से जान बचा कर भागी।

इससे पुलिस फोर्स के विश्वास, हिम्मत और ताकत पर बहुत असर पड़ता है। शायद यही कारण है कि आज ऐसा माहौल बन गया है, जहां कोई भी आदमी खुली जगह पर पिस्टल लेकर आता है और गोलियां चलाकर निकल जाता है। पुलिस खड़ी देखती रह जाती है। सब जानते हैं कि 1984 में पुलिस ने दंगे कैसे संभाले। उसके बाद ट्रांजिस्टर बम विस्फोट हुए जिनको भी हमने पकड़ा सजा दिलाई। इसमें दिन रात का नहीं रहता है, घर बार नहीं रहता। लेकिन इस तरह की घटना तो कभी 1984 में भी नहीं हुई थी। लग रहा था कि पुलिस कोई एक्शन लेना ही नहीं चाहती। लोगों ने देखा कैसे एसएन श्रीवास्तव ने आते ही शूट एट साइट का आदेश दे कर स्थिति को संभाला ना। जो लोग 9984 की बात करते हैं, वो जानते होंगे कि पुलिस ने जब जब पूछ कर काम किए हैं, वहां हमेशा गड़बड़ होती है। मेरा मानना है कि पुलिस को अपनी प्लानिंग खुद करनी चाहिए। किसी से पूछने का इंतजार नहीं करना चाहिए क्योंकि पुलिस को अपनी ड्यूटी मालूम होती है। पहले ही बता देना चाहिए कि हिंसा के लिए जीरो टॉलरेंस है, नहीं हो हालात काबू से बाहर हो जाएंगे। कई लोग सोच रहे होंगे कि शायद कल अजित दोभाल के आ जाने से हालात संभल गए पर यह गलत है।
इस सब मामले में एनएसए का क्या रोल है। दिल्ली के मामले तो मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल को स्थिति संभालनी होती है। सारे फैसले लेने पड़ते हैं। अब आगे क्या होगा कहना मुश्किल है क्योंकि जो कुछ देश में हो रहा है उसकी कुछ तो वजह होगी। सब जानते हैं कि पूरे देश में सीएए के खिलाफ धरना-प्रदशर्न हो रहे हैं। मेरा सवाल है कि इस बिल को लाने की जरूरत ही क्या थी? जहां तक दूसरे देशों के नागरिकों को पकड़ने की बात है वो तो हम कर ही रहे थे। हमारे पास सिटिजनशिप एक्ट और फॉरेनर एक्ट तो पहले ही थे। जिस तरह यह बिल लाया गया उसका नतीजा हुआ कि पूरे देश में इसके खिलाफ आंदोलन होने लगे। शाहीन बाग जैसे आंदोलन अब देश में 109 जगहों पर हो रहे हैं और इनमें हर धर्म-जाति के लोग भाग ले रहे हैं। जहां तक मेरी व्यक्तिगत राय और समझ है तो यह बिल संविधान के खिलाफ है क्योंकि यह तीन देशों के लोगों को नागरिकता देने में धर्म के आधार पर भेदभाव करता है। मुझे नहीं पता कि न्यायपालिका इस पर क्या फैसला करेगी। कहना मुश्किल है कि दिल्ली के दंगों के बाद अब शाहीन बाग जैसे धरने होंगे या नहीं पर जब तक हम समस्या के मूल में नहीं जाएंगे तब तक हम आगे नहीं बढ़ पाएंगे।
कुछ अखबार दिल्ली के दंगों की तुलना गुजरात के दंगों से करने की बात करते हैं पर मेरे हिसाब से इनका कोई सीधा संबंध नहीं है। ये राजनीतिक बातें हैं जैसे ही दिल्ली की स्थिति सामान्य हो जाएगी लोग इन्हें भूल जाएंगे क्योंकि दिल्ली के हालात और दिल्ली की पुलिस की व्यवस्था एकदम अलग है। यहां पुलिस को हर दबाव को झेलकर भी ड्यूटी निभानी पड़ेगी क्योंकि पूरी दुनिया की नजर दिल्ली पर रहती है। कल के विदेशी अखबारों की मुख्य खबरें ही देखने से पता चलता है कि उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की भारत यात्रा की जगह दिल्ली में दंगों को ज्यादा प्राथमिकता दी। लेकिन कहना कि दंगे ट्रंप को शर्मिदा करने के लिए करवाए गए, बड़ी दूर की सोच है क्योंकि सब जानते हैं कि इन दंगों की भूमिका बहुत दिनों से बन रही थी। देखा जाए तो यह उसी दिन शुरू गई थी जिस दिन सीएए संसद से पास हो गया था। जैसा कि मैं कई बार कह चुका हूं, जब तक मैं पुलिस में था, मैं कम्युनिटी पुलिसिंग में विश्वास करता था। आज भी करता हूं। मेरे इलाके में जब भी दो ग्रुप में लड़ाई की नौबत आती थी तो हो ही नहीं सकता कि दोनों दलों में कम-से-कम दो या तीन लोग मुझे जानते ना हों। मैं तो अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि कितनी भी विपरीत स्थिति क्यों ना हो अगर आप किसी को नाम से जानते हो तो आधी समस्या वहीं हल हो जाती है। मैं नहीं जानता कि आज दिल्ली पुलिस में कितने ऑफिसर अपने इलाके में इतनी पकड़ रखते हैं? और मेरे इस सर्किल में नेता भी थे जो आज तक मुझे मानते हैं। दूसरी बात, जो पुलिसवालों को सीख लेनी चाहिए कि कानून की नजर में आप सच की राह पर हैं तो किसी से डरने की जरूरत नहीं है। जब मैं सीबीआई में हवाला कांड की जांच कर रहा था तो उसमें हर पार्टी के नेताओं के नाम आए। मैंने सबके घर जाकर पूछताछ की। चाहे आडवाणी हों या सीताराम केसरी। यह अलग बात है कि जब उस पैसे को ट्रेल करते करते हुए प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव तक पहुंच गया तो मेरा ट्रांसफर कर दिया गया। ऐसा मेरे साथ कई बार हुआ लेकिन पुलिस ट्रांसफर के डर से ड्यूटी करनी छोड़ देगी तो समाज कहां पहुंच जाएगा?
(लेखक दिल्ली में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी रहे हैं)


 
 

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