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05 Dec 2018 06:37:18 AM IST
Last Updated : 05 Dec 2018 06:40:14 AM IST

सामयिक : प्राथमिक वफादारियों के खतरे

कुमार नरेन्द्र सिंह
सामयिक : प्राथमिक वफादारियों के खतरे
सामयिक : प्राथमिक वफादारियों के खतरे

स्वतंत्रता आंदोलन और उसके बाद के दिनों में धर्म, जाति, क्षेत्रीयता, परंपराएं, आस्थाएं, धारणाएं आदि जैसी जिन प्राथमिक वफादारियों को जिस तरह हमने राष्ट्रीय चेतना में विलय होते देखा था, उससे मान लिया था कि वे इतिहास बन चुकी हैं।

राष्ट्रीय चेतना के प्रबल उभार ने इन वफादारियों पर इस कदर अंकुश लगा रखा था कि हम आस्त हो चले कि उनका पुनरोत्थान नहीं होगा। लेकिन हम गलत साबित हुए। आज वे वफादारियां न केवल दोबारा सर उठा रही हैं, बल्कि भयावह भी हो चली हैं। सच तो यह है कि इन वफादारियों को जगाने का काम पिछले कुछ वर्षो से लगातार जारी है। उनके पुनरोत्थान के लिए सत्ताधारी दल और सत्ता तंत्र तो जिम्मेदार हैं ही, अन्य राजनीतिक दल भी जाने-अनजाने उन्हें हवा देने में लगे रहे।  
आज राजनीतिक लामबंदी राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर नहीं हो रही, बल्कि उसका आधार हमारी प्राथमिक वफादारियां बन गई हैं। राजनीतिक दलों और राजनेताओं के लिए समर्थन जुटाने का औजार बन गई हैं। अन्यथा नहीं कि रोजी-रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों को पीछे धकेल कर जाति, धर्म और आस्था आगे आ खड़े हुए हैं। गोत्र राष्ट्रीय विमर्श बन गया है, जबकि भ्रष्टाचार, कुपोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि मसलों पर बात करने को कोई तैयार नहीं है। क्या हमने कभी सोचा है कि देश में लोकतंत्र के वजूद के लिए ये कितने खतरनाक हैं? राजनीतिक दलों और  राजनेताओं को इनसे भले कोई फर्क नहीं पड़े क्योंकि उनका उद्देश्य केवल चुनावी जीत हासिल करना है। लेकिन देश की वृहत्तर जनता के साथ-साथ स्वयं भारतीय-राष्ट्र राज्य के लिए ये मौत का पैगाम हैं। राजकाज और सामाजिक सौहार्द के दुश्मन हैं वे।

जब लोगों को प्राथमिक वफादारियों का हवाला देकर भड़काया जाता है, और वे अपनी इन वफादारियों के इर्द-गिर्द हठी भाव से लामबंद होने लगते हैं, तो अपने वास्तविक हितों से लापरवाह हो जाते हैं। इसका  बुरा परिणाम होता है कि एक समूह दूसरे समूह के प्रति असहिष्णु हो जाता है। उनमें एक दूसरे के लिए घृणा, विद्वेष और क्रोध बढ़ जाता है, जो अंतत:  उन्हें अंधभक्त बनाते हैं। यह अंधभक्ति जातीय, धार्मिंक और यहां तक कि राष्ट्रवादी भी हो सकती है। आज हम इन सभी प्रवृत्तियों को नंगा नाच करते खुली आंखों से देख सकते हैं। प्राथमिक वफादारियां हमें कानून के शासन के प्रति उदासीन और लापरवाह बना देती हैं।  सुशासन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, वैयक्तिक अधिकार आदि नेपथ्य में चले जाते हैं, और हम प्राथमिक वफादारियों के गुलाम बन रह जाते हैं। जातीय और धार्मिंक चेतना का अतिरेक हमारे मन में दूसरों से श्रेष्ठ होने का दंभ पैदा करता है, और उन्हें नीच समझने का भाव भी। यह हमारी प्राथमिक वफादारियों के प्रवल होने का ही परिणाम है कि ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ जैसा नारा लगाते समय हम भूल जाते हैं कि किसी देश, जाति या घर्म में पैदा होना न तो गर्व की बात है, और न शर्म की। हमारा जन्म कहां होगा और किसके घर में होगा, इसका निर्धारण हम स्वयं नहीं करते। ऐसे में किसी जाति, धर्म या परिवार में पैदा होना वास्तव में एक जीवविज्ञानी दुर्घटना मात्र है। लेकिन हम जानते हैं कि जब प्राथमिक वफादारियां हमारे सर पर चढ़कर बोलने लगती हैं, तो हमारी पहचान मनुष्यता से इतर किसी विशेष जाति या धर्म में समाहित हो जाती है, और हम अपने से अलग लोगों को घृणा और आक्रोश से देखने के लिए अभिशप्त हो जाते हैं।
दरअसल, प्राथमिक वफादारियां हमारे मन में अपनी गलतियों को भी सही समझने का गुमान पैदा करती हैं। हम अपने अनुभव से जानते हैं कि दंगे के दौरान हत्या करने वाला अपने समाज का हीरो बन जाता है, जबकि वास्तव में वह हत्यारा होता है। कहने का अर्थ कि जाति-धर्म के आंचल में जहां अपराध छुप जाते हैं, वहीं अपराध को ही न्याय समझने का हम मुगालता भी पाल लेते हैं। ऐसी स्थिति में सहिष्णुता, समझदारी और दसरे समूहों के लिए इज्जत का भाव तिरोहित हो जाता है। हम दूसरों के दुख और पीड़ा के प्रति उपेक्षा भाव रखने लगते हैं। भारत में जातिवाद और विश्व स्तर पर नस्ली भेदभाव इन्हीं प्राथमिक वफादारियों के दुष्परिणाम हैं। इसी तरह धार्मिंक हठ हमें झगड़ा और हिंसा के लिए प्रेरित करते हैं।
अपनी संस्कृति को श्रेष्ठ समझना वास्तव में नासमझी है। मानव शास्त्र के अनुसार कोई भी संस्कृति न महान होती है, और न निम्न क्योंकि संस्कृति केवल संस्कृति होती है। अपनी संस्कृति को सर्वश्रेष्ठ समझने के चलते ही हमारे मन में दूसरी संस्कृति को गर्हित समझने का भाव पैदा होता है। कभी हमें उसकी पोशाक से परेशानी होती है, तो कभी खानपान से। कोई क्या खाएगा या क्या पहनेगा, इसका निर्धारण संस्कृति ही करती है। जब एक समूह दूसरे समूह की संस्कृति को गर्हित बताता है, तो इसके साथ ही वह समूह दूसरे समूह को यह अधिकार भी सौंप देता है कि वह भी उसे गर्हित समझे। कहने की जरूरत नहीं कि इससे सामाजिक भेदभाव, वैमनस्य और परस्पर अविश्वास को खतरा पहुंचता है, और सहभागिता, सहयोग और सामंजस्य बिला जाता है। प्राथमिक वफादारियों ने दुनिया के अनेक देशों में कहर मचाया है।
युगोस्वालिया का विघटन हो या सोवियत यूनियन का, इसके लिए मूल रूप से प्राथमिक वफादारियां ही जिम्मेदार रही हैं। क्रोशिया, सिल्वेनिया और सर्बिया की आपसी जंग और नरसंहार के पीछे  प्राथमिक वफादारियां ही कारक रहीं। बुरुंडी और रवांडा का जनसंहार, अंगोला का जनजातीय युद्ध, श्रीलंका में तमिल टाइगर्स और सिंहली सेना के बीच लंबी जंग, अरब-इस्रइल युद्ध, यमन का संकट, कश्मीर से हिन्दुओं का पलायन, म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमानों का पलायन, चीन-तिब्बत संकट आदि मूल रूप से प्राथमिक वफादारियों के प्रति अतिरेकी भाव के ही दुष्परिणाम दिखाई देते हैं।
जहां तक भारत की बात है, तो यहां स्थिति इन देशों से भी बदतर हो सकती है क्योंकि हमारा देश विविधतापूर्ण देश है। यहां हजारों, जातियां-जनजातियां रहती हैं, जिनकी अपनी अलग परंपरा, संस्कृति, भाषा व जीवनशैली है। दुनिया के सभी धर्मो के लोग यहां रहते हैं। ऐसे में सभी अपने ही धर्म, जाति, जनजाति, परंपरा और संस्कृति को श्रेष्ठ समझने की हठ करेंगे तो समझना मुश्किल नहीं कि परिणाम कितना घातक होगा? आज हमारे सामने प्राथमिक वफादारियों से निजात पाने और एक सामूहिक राष्ट्रीय चेतना को विकसित करने का महती कार्य आन पड़ा है। आस्था के स्थान पर विवेक और तर्क की प्रतिष्ठा अनिवार्य हो चली है। अगर ऐसा न हुआ तो हमारे देश का वजूद भी खतरे में पड़ सकता है।


 
 

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