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04 Dec 2017 05:25:51 AM IST
Last Updated : 04 Dec 2017 05:33:50 AM IST

हिंदुत्व सियासत की नई किस्म

अवधेश कुमार
हिंदुत्व सियासत की नई किस्म
हिंदुत्व सियासत की नई किस्म

भारतीय राजनीति में जिस ढंग से हिन्दुत्व बनाम हिन्दुत्व का नया स्वर गूंज रहा है, वह एक नई प्रवृत्ति है.

जब राहुल गांधी को सच्चा हिन्दू ही नहीं, एक धर्मपरायण हिन्दू साबित करने के लिए कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने उनकी जनेऊ पहने और पिता की अस्थियां चुनती तस्वीर देश के सामने रखी तो ज्यादातर लोगों ने उसे आश्चर्य से देखा. कांग्रेस की राजनीति में इसके बिल्कुल विपरीत छवि थी. कांग्रेस की छवि एक ऐसी सेक्यूलर पार्टी की थी जो अपनी सोच में अल्पसंख्यकों यानी मुसलमानों को प्राथमिकता देती है. कांग्रेस ने जानबूझकर ऐसी छवि बनाई थी. आपातकाल के दौरान संविधान की प्रस्तावना में यह शब्द जोड़ा गया तो उसके पीछे कांग्रेस की एक निश्चित राजनीतिक सोच थी. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का एक वक्तव्य आज भी लोग उद्धृत करते हैं, जिसमें उन्होंने कहा कि देश के संसाधन पर मुसलमानों का पहला अधिकार है. उन्होंने कांग्रेस की सोच को ही अभिव्यक्त किया था.

इन दिनों कांग्रेस के कई नेता अपने को भाजपा से ज्यादा हिन्दू धर्म का निष्ठावान साबित करने पर तुले हैं. कपिल सिब्बल ने तो यहां कि कह दिया कि भाजपा तो हिन्दुत्व की बात करती है, असली हिन्दू तो हम लोग ही हैं. स्वयं राहुल गांधी ने कहा कि वे शिवभक्त परिवार से आते हैं. यह लेख लिखे जाने तक वे गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान 22 मंदिरों की यात्रा कर चुके हैं, जिसमें सोमनाथ मंदिर भी शामिल है. यहीं के मंदिर के उस रजिस्टर में उनका नाम दर्ज हो गया जो गैर हिन्दुओं के लिए है. भाजपा ने तुरंत इसे बड़ा मुद्दा बना दिया और उसके जवाब में कांग्रेस ने उनको जनेऊधारी हिन्दू का प्रमाण देने की कोशिश की. हालांकि राहुल स्थायी रूप से जनेऊ नहीं पहनते यह सच है, क्योंकि उनका कभी जनेऊ संस्कार हुआ ही नहीं. हिन्दुओं का बड़ा वर्ग जनेऊ नहीं पहनता, इसलिए जो जनेउ पहने वही केवल हिन्दू है, इससे सहमत होना भी कठिन है.
 
लेकिन कांग्रेस ऐसा बताने और दिखाने तक आई है तो यह भारतीय राजनीति में बहुत बड़ा बदलाव है. यह बदलाव यों ही नहीं हुआ है. 2014 लोक सभा चुनाव में अपनी सबसे बुरी पराजय के बाद कांग्रेस ने ए.के.एंटनी की अध्यक्षता में पराजय के कारणों पर जांच के लिए एक समिति गठित की थी. लेकिन स्वयं कांग्रेस के अंदर से यह बात सामने आई है कि उसमें कांग्रेस की मुस्लिमपरस्त छवि होने को हार का एक प्रमुख कारण माना गया है. इसके अनुसार हिन्दुओं में यह संदेश गया कि कांग्रेस मुस्लिमों का पक्ष लेती है. इसलिए उनका मत जहां भी भाजपा शक्तिशाली थी, उसके पक्ष में चला गया.
 
इससे साफ है कि कांग्रेस अब अपनी छवि बदलना चाहती है. यह सच है कि हिन्दू अनेक जगहों में कांग्रेस से अलग होकर भाजपा की ओर गए और भाजपा ने उसके जनाधार को कमजोर करके ही अपनी जमीन खड़ी की. किंतु एक समय कांग्रेस का सुनिश्चित वोट माने जाने वाले मुसलमान भी उससे अलग हो गए हैं. यह प्रक्रिया पिछले अनेक वर्षो से जारी है. अलग-अलग राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों ने मुसलमान मतों में कांग्रेस को पीछे छोड़ दिया. बिहार और उत्तर प्रदेश से कांग्रेस का सफाया इसका साफ उदाहरण है. तो कांग्रेस को यह लग गया है सेक्यूलर की उसकी सोच जो व्यवहार में मुस्लिमपरस्त राजनीति हो गई थी, उसमें ‘माया मिली न राम’ वाली स्थिति उसकी हो गई है. अनके राज्यों में बहुमत हिन्दुओं का मत तो उसके हाथ से खिसका ही मुसलमान भी खिसक गए. दूसरी ओर, भाजपा हिन्दुओं का मत नए सिरे से अपने पक्ष में सुदृढ़ कर रही है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव परिणाम ने कांग्रेस को अपना चोगा उतार फेंकने की मानसिकता तैयार की जो गुजरात चुनाव में प्रचंड रूप में दिख रहा है.



गुजरात को भाजपा एवं संघ परिवार की हिंदुत्व की प्रयोगशाला के तौर पर देखा जाता रहा है. तो उसमें कांग्रेस ने भी अपना प्रयोग आरंभ कर दिया है. राहुल इसके लिखे जाने तक एक भी मस्जिद में नहीं गए हैं. यह कांग्रेस के चरित्र को देखते हुए असाधारण स्थिति है.  इस तरह, भारतीय राजनीति एक ऐसे दौर में पहुंच रही है जहां हिन्दू बनाम हिन्दू की प्रतिस्पर्धा और सघन होगी. गुजरात में कांग्रेस जीते या हारे यह स्थिति कायम रहने वाली है और 2019 के आम चुनाव में इसका पूरा जोर दिखेगा. किंतु जो लोग इसे नकारात्मक मान रहे हैं, उनसे सहमत होना कठिन है. लोकतंत्र में राजनीति न मुस्लिमपरस्त होनी चाहिए न हिन्दूपरस्त. लेकिन सेक्यूलरवाद के नाम पर मुस्लिमपरस्त राजनीति के कारण हिन्दुओं में विद्रोह की भावना पैदा हुई जिसका लाभ भाजपा को मिला.

इससे दूसरी पार्टियों को अब समझ में आने लगा है कि अगर चुनाव की राजनीति में टिके रहना है तो फिर ऐसे सेक्यूलरवाद से अलग होकर यह साबित करना होगा कि हम हिन्दू विरोधी नहीं है. यह भारतीय राजनीति में युगांतकारी परिवर्तन है जिसकी अभी शुरु आत हुई है. इसके पूर्ण परिणाम आने में समय लगेगा. लेकिन एक युग का अंत हो रहा है. कुछ समय के लिए इसके थोड़े नकारात्मक परिणाम भी दिख सकते हैं लेकिन इससे संतुलन कायम हो जाएगा. हिन्दुत्व की राजनीति करने का मतलब मुस्लिम विरोधी या किसी संप्रदाय का विरोधी होना नहीं हो सकता. यह गलत तब होगा जब इसके पीछे मुस्लिम विरोधी की सांप्रदायिक सोच हो.

हिन्दुत्व की राजनीति का अर्थ सभी मजहबों को समान महत्त्व देना है. यह नहीं हो सकता कि मुसलमानों या किसी विशेष मजहब के लिए विशेष व्यवस्था या प्रावधान किए जाएं. यह देश की एकता अखंडता के लिए भी उचित नहीं है. यह मानना होगा कि पार्टियों की इस नीति से देश में सांप्रदायिक विद्वेष बढ़ा है. भारत की राजनीति और इस पर आधारित लोकतंत्र के भविष्य के लिए इस स्थिति में बदलाव आवश्यक है. इस नाते हिन्दुत्व की प्रतियोगिता से एक नए और बेहतर इतिहास की नींव पड़ रही है. यह मुसलमानों के लिए भी अच्छा है.

 

 


 
 

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