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23 Nov 2013 12:29:06 AM IST
Last Updated : 23 Nov 2013 12:30:54 AM IST

मुक्त व्यापार की लहरों में बहना ही होगा

जयंतीलाल भंडारी
लेखक
मुक्त व्यापार की लहरों में बहना ही होगा

यकीनन इस समय बहुपक्षीय व्यापार वार्ता का दोहा दौर मृतप्राय हो चुका है और इसे नए सिरे से शुरू कर पाना खासा कठिन है.

ऐसे में दुनिया के विकसित और प्रभावी देश विभिन्न द्विपक्षीय और मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) करने में व्यस्त हैं. इन तमाम समझौतों में अमेरिका सबसे आगे है. अमेरिका प्रशांत क्षेत्र के 11 देशों और यूरोपीय संघ के साथ एफटीए के लिए तेजी से प्रयासरत है. अमेरिका की प्रशांत पार मुक्त व्यापार साझेदारी अंतिम चरण में है. इसी तरह अमेरिका की आसियान देशों के साथ कारोबार और निवेश साझेदारी भी तेजी से आकार ग्रहण कर रही है. लेकिन भारत अमेरिका के साथ किसी एफटीए में शामिल नहीं है.

ऐसे में भारत अमेरिका द्वारा किए जाने वाले किसी भी एफटीए के असर से बच नहीं पाएगा. कारण कुछ समझौतों से संबंधित बातचीत मूलत: कारोबार और शुल्क दरों पर निर्भर है, लेकिन अमेरिका के एफटीए की कुछ बातें भारत को प्रभावित कर सकती हैं. मसलन दवा के पेटेंट, पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य, सुरक्षा मानक, कृषि संरक्षण, इंटरनेट, वित्तीय क्षेत्र, बैंकिंग और  बीमा जैसे अन्य मसलों से भारत प्रभावित हो सकता है.

इसमें कोई दो मत नहीं है कि यदि अमेरिका के साथ प्रशांत क्षेत्र और आसियान देशों की साझेदारियां हकीकत में बदल जाती हैं तो इन समझौतों में शामिल देश दुनिया के कारोबार के एक बड़े हिस्से को प्रभावित करते हुए दिखाई देंगे. इतना ही नहीं, ये देश इन समझौतों में शामिल होने के इच्छुक नए देशों के लिए ऐसे नए और कठोर प्रावधान शामिल करना चाहेंगे जो विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों की सीमा से परे होंगे.

इस परिप्रेक्ष्य में इसी महीने विकीलीक्स की वेबसाइट ने अमेरिका और प्रशांत क्षेत्र विकासशील समझौते के बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) संबंधी अध्याय का जो पूरा मसौदा प्रस्तुत किया है, उससे उन चिंताओं की पुष्टि होती है जो कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और इस मसले से जुड़े व्यावसायिक हित रखने वाले विकासशील देशों ने उठाई हैं. यह भी उल्लेखनीय है कि प्रभावी एफटीए के माध्यम से अमेरिका की कोशिश होगी कि दोहा दौर में नकारात्मक रुख रखने वाले भारत जैसे विकासशील देशों को किनारे लगाया जाए.

चूंकि अब भारत मुक्त व्यापार के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से बाहर रहने का जोखिम नहीं उठा सकता. अतएव भारत के लिए मुक्त व्यापार की डगर पर आगे बढ़ना जरूरी है. यदि हमने ऐसा नहीं किया तो इससे यही जाहिर होगा कि हमने वर्ष 1991 के वैिक आर्थिक परिदृश्य से कोई सबक नहीं लिया. भारत द्वारा किए जा रहे मुक्त व्यापार समझौते की राह में प्रमुख समस्या यह है कि भारत अब भी अपने बीमा क्षेत्र को विदेशी निवेश के लिए नहीं खोल सका है. भारत में कई क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश संबंधी बाधाएं भी बनी हुई हैं.

वस्तुत: भारत धीमी गति से एफटीए की डगर पर आगे बढ़ रहा है. आसियान और यूरोपीय संघ के साथ बातचीत जारी है. भारत ने अब तक दक्षिण कोरिया, जापान और कुछ आसियान देशों के साथ एफटीए लागू किए हैं. ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड और यूरोपीय संघ जैसे तमाम देशों के साथ इसी प्रकार के समझौते की कोशिश की जा रही है. वर्ष 2007 से ही भारत और यूरोपीय संघ सैद्धांतिक रूप से एफटीए पर सहमत हैं. लेकिन एफटीए पर कोई अंतिम निर्णय नहीं हो पाया है. इसी तरह अक्टूबर, 2013 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ब्रुनेई में आयोजित 11वें आसियान-भारत शिखर सम्मेलन में द्विपक्षीय व्यापार को तेजी से बढ़ाने के लिए आसियान के साथ एफटीए पर दस्तखत करने की बात कही है.

भारत और आसियान के बीच एफटीए का बेसब्री से इंतजार कर रहे कारोबारियों एवं प्रोफेशनल्श के लिए यह अच्छी खबर है कि सेवाओं एवं निवेश पर भारत-आसियान एफटीए शीघ्र पूर्ण हो जाने की संभावना है. नि:संदेह विश्व व्यापार में आसियान समूह के सबसे ज्यादा गतिशील होने के कारण आसियान देशों के साथ भारत का व्यापार लगातार तेजी से बढ़ रहा है. भारत-आसियान का जो व्यापार 1990 में मात्र 2.4 अरब डॉलर का था, वहीं वह वर्ष 2012-13 में करीब 76 अरब डॉलर रहा है. उम्मीद है कि आसियान के साथ भारत का व्यापार वर्ष 2015 तक बढ़कर 100 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच जाएगा. भारतीय प्रोफेशनलों के लिए आसियान देशों में उजली संभावनाएं हैं.

जहां उपयुक्त कारोबारी देशों के साथ मुक्त व्यापार की डगर पर आगे बढ़ना जरूरी है, वहीं निर्यात के नए बाजार और व्यापारिक रिश्तों वाले देशों के साथ करेंसी स्वैपिंग की दिशा में भी आगे बढ़ा जाना जरूरी है. यह सर्वविदित है कि भारत का निर्यात घटने के पीछे अमेरिका और यूरोपीय देशों की आर्थिक सुस्ती सबसे प्रमुख कारण है. जहां हमारे निर्यात के परंपरागत बाजारों में कठिनाइयां हैं, वहीं हमें विश्व निर्यात बाजार में विभिन्न देशों से मिल रही चुनौतियों का सामना भी करना पड़ रहा है.

भारत को सबसे बड़ी निर्यात चुनौती चीन से मिल रही है. जहां विश्व निर्यात में भारत का हिस्सा एक फीसद है, वहीं चीन का हिस्सा दस फीसद है. जिन देशों के साथ भारत के मुक्त व्यापार समझौते हुए हैं, उनमें से अधिसंख्य देशों के साथ चीन का भी एफटीए है. इतना ही नहीं, भारत के मुकाबले कई छोटे-छोटे देशों मसलन बांग्लादेश, वियतनाम, थाईलैंड ने अपने निर्यातकों को सुविधाओं का ढेर देकर भारतीय निर्यातकों के सामने कड़ी प्रतिस्पर्धा खड़ी कर दी है.

ऐसे में हमें परंपरागत देशों के अलावा अन्य देशों के निर्यात बाजारों के लिए भी रणनीतिक प्रयास करने होंगे. अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों में भारत के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए और कारगर कदम उठाने होंगे. पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, भूटान, थाईलैंड और नेपाल के साथ निर्यात बढ़ाने की नई कोशिशें जरूरी होंगी. ब्रिक्स देशों के साथ-साथ खाड़ी देशों में भारत की निर्यात कोशिशें बढ़ानी होंगी. लैटिन अमेरिकी देशों खासकर चिली, कोलंबिया, कोस्टारिका, डोमिनिक रिपब्लिक, पनामा, पेरू और त्रिनिदाद व टोबैगो में निर्यात बढ़ाने की नई रणनीति पर भी ध्यान देना होगा.

हमें देश के चालू खाते के घाटे को कम करने और विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत बनाए रखने के लिए दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, चीन, ईरान, इराक और जापान जैसे देशों के साथ करेंसी स्वैपिंग के जरिए कारोबार की डगर पर आगे बढ़ना चाहिए. करेंसी स्वैपिंग की व्यवस्था में एक-दूसरे देशों के साथ लोकल करेंसी में व्यापार करने के तहत दोनों देश अपनी-अपनी करेंसी एक-दूसरे के यहां बैंक में रखते हैं और कारोबार का भुगतान एक-दूसरे को अपनी-अपनी करेंसी में ही करते हैं. लेकिन अगर किसी देश के साथ उस अनुपात में कारोबार नहीं हो पाया, जिस अनुपात में उसकी करेंसी रखी गई है तो उस देश को डॉलर में उनकी करेंसी लौटाते हैं. भारत के लिए उन्हीं देशों के साथ करेंसी स्वैपिंग करना लाभदायक है  जो भारत में निवेश करने के इच्छुक हैं. ताकि कारोबार के बाद करेंसी बचने पर उस देश को डॉलर में करेंसी नहीं लौटानी पड़े और उनकी करेंसी भारत में निवेश में लग जाए.

निसंदेह अब भारत को एफटीए की डगर पर तेजी से आगे बढ़ना होगा. भारत को चीन की तरह प्रतिस्पर्धी देश के रूप में एफटीए की ओर कदम बढ़ाने होंगे. लेकिन चूंकि एफटीए पेचीदा होते हैं, अतएव सीमा शुल्क अधिकारियों और इसे लागू करने वाले दूसरे अधिकारियों को अच्छी तरह प्रशिक्षित करना होगा. एफटीए का लाभ लेने के लिए देश में विशेषज्ञ अधिकारियों, उद्यगपतियों और पेशेवरों का एक ऐसा   समर्पित संगठन खड़ा करना होगा जिससे मुक्त व्यापार में भारत को कोई हानि न उठानी पड़े. यदि हम यह सब कुछ कर पाए तो देश से निर्यात बढ़ेंगे और वैिक व्यापार में भारत की नई पहचान भी बनेगी.


 
 

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