यमुना को साफ करो

Last Updated 03 Jan 2011 12:11:55 AM IST

हिमालय की कोख से प्रवाहमान यमुना को 'आक्सीजन' के लिए संघर्ष करना पड़े... यह कम शर्म की बात नहीं है.


यमुना को आक्सीजन के लिए देश की राजधानी दिल्ली में सर्वाधिक संघर्ष करना पड़ रहा है. उत्तराचंल के शिखरखंड हिमालय से उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद तक करीब 1,370 किलो मीटर की यात्रा तय करने वाली यमुना को ज्यादा संकट दिल्ली के करीब 22 किलोमीटर क्षेत्र में है, लेकिन बेदर्द दिल्ली को यमुना के आंसुओं पर कोई तरस नहीं आया. यही कारण है कि अभी तक यमुना की निर्मलता वापस नहीं लौट सकी. केन्द्र सरकार व राज्यों ने भले ही यमुना की निर्मलता के लिए डेढ़ दशक के दौरान 1,800 करोड़ से अधिक की धनराशि खर्च कर दी हो लेकिन यमुना के पानी की निर्मलता वापस लौटना तो दूर, वह साफ तक नहीं हो सका. जाहिर है कि अरबों की धनराशि पानी में बह गयी. विशेषज्ञों की मानें तो विश्व की सर्वाधिक प्रदूषित नदियों में यमुना का शीर्ष स्थान है.
 
यमुना नदी के किनारे दिल्ली, मथुरा व आगरा सहित कई बड़े शहर बसे हैं. 'ब्लैक वॉटर' में तब्दील यमुना में करीब 33 करोड़ लीटर सीवरेज गिरता है. ये हालात तब हैं, जब दिल्ली खुद यमुना के पानी से प्यास बुझाती है. पानी को साफ सुथरा व पीने योग्य बनाने के लिए दिल्ली सरकार को भी कम नहीं जूझना पड़ता क्योंकि पीने के लिए यमुना के पानी को ट्रीट करने के लिए उसे काफी बड़ी धनराशि खर्च करनी पड़ती है. कानपुर, इलाहाबाद व वाराणसी के जल कल विभाग को पानी को पीने योग्य बनाने के लिए एक हजार लीटर पर औसत चार रुपये खर्च करने पड़ते हैं, लेकिन दिल्ली जल बोर्ड को आठ से नौ रुपये की धनराशि एक हजार लीटर पानी को साफ करने में खर्च करने पड़ते हैं. इससे साफ जाहिर है कि गंगा की तुलना में यमुना अधिक प्रदूषित व मैली है. 

हालांकि दिल्ली की आबादी के मल-मूत्र व अन्य गंदगी को साफ सुथरा करने के लिए करीब डेढ़ दर्जन ट्रीटमेंट प्लांट संचालित हैं फिर भी यमुना का मैलापन रोकने में कामयाबी नहीं मिल रही है. इसका गंदापन रोकने के लिए जापान बैंक फार इंटरनेशनल कारपोरेशन ने भी कार्य किया लेकिन उसे भी सफलता नहीं मिली. यमुना में कोई डेढ़ सौ अवैध आवासीय कॉलोनियों की गंदगी व कचरा गिरता है. इसके अलावा करीब 1,080 गांव व मलिन बस्तियां भी अपना कचरा व गंदगी यमुना की गोद में डालती हैं. इन हालातों में यमुना जल का आक्सीजन शून्य होने का खतरा हमेशा बना रहता है.

मानकों के अनुसार कोलीफार्म कंटामिनेशन लेबल 500 से अधिक नहीं होना चाहिए लेकिन यमुना में इसका स्तर खतरनाक सीमा से भी आगे बढ़ गया है. यों, यमुना को गंदा करने में केवल आबादी का मलमूत्र का प्रवाह ही जिम्मेदार नहीं है बल्कि इसके लिए देश के औद्योगिक घराने कम जिम्मेदार नहीं हैं. दिल्ली, आगरा व मथुरा सहित कई शहरों का औद्योगिक कचरा भी यमुना की निर्मलता को बदरंग करता है.

अब केवल 'यमुना क्लीन, आगरा ग्रीन...' या 'यमुना क्लीन, मथुरा ग्रीन...' अथवा 'यमुना क्लीन, दिल्ली ग्रीन...' का नारा देने से काम नहीं चलेगा. यमुना को यथार्थ में निर्मलता लौटानी है तो इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति को स्ट्रांग करना होगा. देश के नौकरशाहों को नदी सफाई की योजना बनाकर उसको क्रियान्वित करने पर ध्यान देना होगा. केवल योजना बनाने से ही कुछ नहीं होगा क्योंकि किसी भी योजना पर अपेक्षित अमल न होने से अरबों की धनराशि तो खर्च हो जाती है पर उसका लाभ नहीं मिलता है. सम्बंधित नौकरशाहों पर इसकी जिम्मेदारी का निर्धारण होना चाहिए जिससे कार्ययोजना की विफलता पर बचकर निकल न सकें क्योंकि आरोप-प्रत्यारोप व दोषारोपण योजनाओं को विफल कर देतीं हैं. इसके साथ ही यमुना किनारे बसी आबादी को भी निर्मलता के लिए जागरुक होना पड़ेगा क्योंकि आबादी की जागरुकता यमुना की निर्मलता में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकेगी. आम आदमी को भी इस मुहिम से जुड़ना होगा क्योंकि तभी यमुना में गंदगी गिरने से रोका जा सकेगा.

रामेन्द्र सिंह चौहान
लेखक


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