काशी, मथुरा और संघ
आरएसएस प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने स्पष्ट कहा है कि राम मंदिर एकमात्र ऐसा आंदोलन था, जिसका संघ ने समर्थन किया था और अब काशी और मथुरा सहित ऐसे किसी अन्य अभियान का समर्थन नहीं करेगा।
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नई दिल्ली के विज्ञान भवन में अपनी तीन दिवसीय व्याख्यान श्रृंखला के अंतिम दिन सवालों के जवाब में भागवत ने यह भी स्पष्ट किया कि आरएसएस के स्वयंसेवक ऐसे आंदोलनों में शामिल होने के लिए स्वतंत्र हैं।
हिन्दू समाज आग्रह करेगा तो संघ के स्वयंसेवक संस्कृति और समाज के हिसाब से इस प्रकार के किसी अभियान में शिरकत कर सकते हैं। यह व्याख्यान श्रृंखला आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित की गई थी।
देश में रोजगार परिदृश्य, संस्कृत की विषय के रूप में अनिवार्यता, भारत की अखंडता, हिन्दू-मुस्लिम एकता, जाति-वर्ण व्यवस्था, जातिगत आरक्षण, भाषा विवाद, भाजपा अध्यक्ष के चयन में विलंब, एक तय आयु में संन्यास जैसे तमाम मुद्दों पर भी संघ प्रमुख ने अपनी बात कही।
जहां तक काशी-मथुरा में धर्म स्थल का मसला है, तो यह मामला कोई नया नहीं है, लेकिन राम मंदिर आंदोलन के चलते इसे हिन्दुत्ववादियों ने थोड़े समय के लिए विराम दे रखा था। राममंदिर का निर्माण पूरा होते ही वे हरकत में आ गए। न केवल काशी-मथुरा, बल्कि सम्भल में शाही जामा मस्जिद के सव्रे के मुद्दे के साथ ही अन्य अनेक धर्मस्थलों को लेकर मामलों ने भी जोर पकड़ लिया। बीते साल 24 नवम्बर को शाही जामा मस्जिद के सव्रे के दौरान हिंसा भड़क उठी थी।
हिंसा मामले की जांच के लिए बने आयोग ने बृहस्पतिवार को ही अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंपी है। सूत्रों के मुताबिक, रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे दंगों के बाद तुष्टीकरण की राजनीति के चलते बड़े पैमाने पर आबादी में बदलाव, धर्म परिवर्तन और समुदाय विशेष के परिवारों का पलायन हुआ।
बेशक, संघ प्रमुख पहले भी कह बार स्पष्ट कर चुके हैं कि हर जगह मंदिर नहीं ढूंढ़ा जाना चाहिए। लेकिन लगता नहीं कि धर्मस्थलों में मंदिर ढूंढे जाने की कवायद थम पाएगी। दरअसल, यह मसला बहुत पहले से धार्मिक से ज्यादा राजनीतिक हो चुका है।
मंदिर-मस्जिद-चर्च जैसे धर्मस्थलों के मुद्दे गरमाने लगते हैं, तो अलग माहौल बना देते हैं, जिसके बल पर पक्ष-विपक्ष को अपनी राजनीति को धार देने में सहूलियत होती है। इसलिए ऐसे मुद्दे गरमाए रहने हैं।
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